Monday, April 15, 2024

जातीय मान-अपमान का इलीट विमर्श

इलीट शब्द का हिंदी अनुवाद अभिजात या सभ्रांत है। उर्दू में इसे अशराफिया कहते हैं। डिक्शनरी ब्रिटैनिका के मुताबिक इसका अर्थ ऐसे लोगों से होता है, जिनके पास किसी समाज में सबसे अधिक धन हो और जिनकी सबसे ऊंची हैसियत हो। कुछ अन्य शब्दकोशों के मुताबिक सबसे अधिक सफल और शक्तिशाली व्यक्तियों को इस शब्द के दायरे में माना जाता है। एक अन्य परिभाषा के मुताबिक शक्ति, धन और बुद्धि के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति अभिजात वर्ग में आते हैं। 

समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि भारतीय समाज में इलीट श्रेणी में शामिल होने के तीन आधार हैं- धन, अंग्रेजी शिक्षा, और सवर्ण जाति। उन्होंने कहा था कि जिन लोगों के साथ इन तीन में कोई दो पहलू हों, तो वे इलीट का हिस्सा बन जाते हैं। 

डॉ. लोहिया की इस परिभाषा को सहज स्वीकार किया जा सकता है।

तो इसके मुताबिक अगर तीनों पहलू- धन, अंग्रेजी शिक्षा और सवर्ण जाति की पृष्ठभूमि किसी व्यक्ति के साथ हो, तब तो निश्चित रूप से वह भारतीय इलीट का हिस्सा होता है। 

लेकिन अगर किसी व्यक्ति के साथ सिर्फ एक पहलू ही जुड़ा हो, तो वह इलीट श्रेणी में शामिल नहीं हो सकता।

चर्चा का संदर्भ इस हफ्ते संसद में हुई घटनाएं हैं। मुद्दा संसद की सुरक्षा में चूक का था, जिस पर पूरा विपक्ष गृहमंत्री अमित शाह का बयान चाहता था। चूंकि शाह बयान और संसदीय बहस से बचना चाहते थे, इसलिए विपक्ष ने हंगामे का रास्ता चुना। तब 146 विपक्षी सांसदों को सदन से निलंबित कर दिया गया। इसी दौरान सदन के बाहर जुटे सांसदों के बीच तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी ने सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसका वीडियो बनाते देखे गए। 

तो संभवतः सत्ता पक्ष ने इसके जरिए असल मसले से ध्यान हटाने की रणनीति बनाई। सत्ता पक्ष ने मिमिक्री को ही मुद्दा बना दिया। इसके तहत तीन बातें कही गईं-

  • विपक्ष ने उप-राष्ट्रपति/ राज्यसभा सभापति पद पर बैठे व्यक्ति की मिमिक्री कर इस संवैधानिक पद का अपमान किया है।
  • चूंकि धनखड़ जाट समुदाय से आते हैं, तो विपक्ष के इस आचरण से जाट जाति का अपमान हुआ है। कहा गया कि इस रूप में विपक्ष ने ओबीसी-दलित-पिछड़े समुदाय के प्रति अपने अपमान भाव को जाहिर किया है।
  • और यह कहा गया कि चूंकि जाट समुदाय का मुख्य पेशा खेती रही है, इसलिए इससे किसानों का अपमान हुआ है।

चूंकि आज मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया के बहुत बड़े हिस्से पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का नियंत्रण है, इसलिए उसके लिए ऐसी हर बात पर अपने अनुकूल नैरेटिव बना देना आसान बना हुआ है। और जहां बात जाति या मजहब से जुड़े मुद्दे की हो- जिन पर जज्बाती माहौल बनाना हमेशा आसान रहता है- तो उसके लिए चर्चा को अपने अनुकूल ढाल लेना और भी अधिक आसान हो जाता है।

इस बार भी आंशिक रूप से सत्ता पक्ष ऐसा करने में सफल रहा। इसे इसीलिए आंशिक सफलता कहा जाएगा, क्योंकि इसके जरिए विपक्ष को पूरे दबाव या बचाव की मुद्रा में ला देने में वह कामयाब नहीं हुआ। लेकिन उसे इतनी सफलता जरूर मिली कि विपक्षी- खासकर कांग्रेस के नेता सफाई देते सुने गए।

मसलन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा की पूर्व स्पीकर मीरा कुमार ने कहा कि हर बात को जाति से जोड़ना उचित नहीं है। खड़गे ने सवाल उठाया कि उन्हें राज्यसभा में बोलने नहीं दिया जाता, तो क्या उन्हें यह कहना चाहिए कि ऐसा उनके दलित होने की वजह से होता है? 

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने एक एक्स में इस बात पर मायूसी जताई कि एक महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर बहस के बीच जाति का पहलू ले आया गया। उन्होंने जोड़ा- यह निराशाजनक है कि किसी व्यक्ति की आलोचना के लिए उसके जन्म-स्थान का इस्तेमाल किया जा रहा है। फिर लिखा- ‘मुझे यह याद नहीं है कि किसी ने महात्मा गांधी या सरदार वल्लभ भाई पटेल की जाति पूछी हो या सीएफ एंड्र्यूज या एनी बेसेंट के जन्म-स्थान के बारे में पूछा हो? क्या हम इस 21वीं सदी में संकीर्ण अस्मिताओं से आगे जाकर मानवता के कायदों और उसूलों को अपनाने की स्थिति में हैं?’

लेकिन ये सभी उसी पार्टी के नेता हैं, जिसने हाल में जातीय ध्रुवीकरण को अपनी सियासत का मुख्य आधार बना लिया है। ये उस पार्टी के नेता हैं, जो जातीय अपमान का मुद्दा अपने प्रतिकूल जाने और पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के जन्म-स्थान का मुद्दा उठाए जाने से व्यथित हैं- मगर प्रश्न है कि हालात अगर यहां तक पहुंचे हैं, तो क्या इसके लिए अकेले किसी एक पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? 

जब राजनीति में गरीबी और आय एवं धन की गैर-बराबरी प्रमुख मुद्दा ना रह जाए, तो यह बहुत स्वाभाविक है कि पहचान के मुद्दे सर्व-प्रमुख हो जाते हैं। ऐसे मुद्दों पर विवेकहीनता की कोई हद नहीं रह जाती। यही विवेकहीनता इस ताजा कथानक में भी झलकती है कि धनखड़ की मिमिक्री पूरे जाट समुदाय का अपमान है।

भारतीय समाज में जाति एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। जो जाति शोषण और पिछड़ेपन का आधार रही है और काफी हद तक आज भी है। जाति को तोड़ना आज भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर का जाति के विनाश का सपना और एजेंडा आज भी संभवतः उतना ही दूर और दुरूह बना हुआ है, जितना उनके जीवनकाल में रहा था। डॉ. अंबेडकर ने हिंदू धर्म का परित्याग कर जाति के विनाश का रास्ता तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी। तो विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर कमी कहां रह गई और आज क्या एजेंडा होना चाहिए? 

लेकिन इस प्रश्न का उत्तर तलाशना वर्तमान राजनीति में जाति का प्रश्न उठाने वाले किसी दल या नेता के एजेंडे में नहीं है। उनका विमर्श पहचान और प्रतिनिधित्व से आगे नहीं बढ़ पाता। पहचान का सीधा संबंध मान-अपमान से जुड़ जाता है। प्रतिनिधित्व की बात पिछड़ी और शोषित रही जातियों के ‘क्रीमी लेयर’ तक सिमटी रह जाती है। यानी उन जातियों से आए उन लोगों तक, जो इलीट वर्ग में शामिल हो चुके हैं। अनुभव यह है कि इस तबके ने अपनी ही जाति और समुदाय के उन लोगों की चिंता छोड़ दी है, जो आज भी गरीबी और सामाजिक बहिष्कार की परिस्थितियों में जीने को मजबूर हैं। 

इसीलिए पहचान और प्रतिनिधित्व तक सीमित कथित सामाजिक न्याय की राजनीति के कर्ताधर्ताओं की चिंता में कभी अर्थ नीति, विकास नीति, और वर्गीय शोषण का सवाल नहीं आता। उनकी और इस विमर्श के पैरोकार बुद्धिजीवियों की सारी जद्दोजहद शोषण और गैर-बराबरी पर टिकी मौजूद व्यवस्था के भीतर अपने लिए सबसे बेहतर सौदेबाजी कर लेने तक सिमटी रहती है। 

गुजरते वक्त के साथ मान-अपमान, पहचान, और प्रतिनिधित्व की सियासत में भाजपा ने इतनी महारत हासिल कर ली है कि ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकार दलों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया दिखता है। कांग्रेस ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति अपनाने वाली नई पार्टी बनी है। हालांकि हाल में तीन हिंदी भाषी राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी का यह मुद्दा मुंह के बल गिरा, लेकिन चूंकि कोई और एजेंडा उसके पास नहीं है, तो वह किसी गंभीर पुनर्विचार की अवस्था में नहीं है। इसी बीच धनखड़ के मामले में उसे शायद अहसास हुआ है कि इस खेल में उसका मुकाबला कहीं बड़े उस्ताद खिलाड़ी से है। तभी पार्टी नेता दुख और निराशा जताते नजर आए हैं। 

बहरहाल, इस संदर्भ में रेखांकित करने का पहलू यह है कि मान-अपमान, पहचान और प्रतिनिधित्व की सारी चर्चा में उन लोगों की चिंता कहीं नहीं शामिल होती है, जिनका अपनी जातीय पहचान के कारण सचमुच रोजमर्रा के स्तर पर अपमान होता है और जो आर्थिक, राजनीतिक, या प्रशासनिक व्यवस्था में किसी प्रकार का प्रतिनिधित्व पाने की स्थिति में नहीं है। वे इसलिए इस स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति करने वाली पार्टियों ने अपने शासन काल के दौरान उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के कोई विशिष्ट प्रयास नहीं किए, जिससे वे लोग भी प्रतिनिधित्व की होड़ तक पहुंच पाते। 

ये पार्टियां पहचान और प्रतिनिधित्व के सवाल लेकर सिर्फ चुनावों में उनके पास जाती हैं और इस आधार पर वोट लेकर उनके नेता फिर अपनी इलीट जीवन शैली में लौट जाते हैं। इनमें भाजपा से लेकर कांग्रेस और ‘सामाजिक न्याय’ एवं ‘बहुजन’ एजेंडे वाली सभी पार्टियां और उनके नेता शामिल हैं।

आज की हकीकत यह है कि जाति का विनाश हो या पिछड़े-दलित-आदिवासी समुदायों के वंचित समूहों का प्रतिनिधित्व- मान-अपमान के मौजूदा इलीट विमर्श के साथ इन मकसदों का तीखा अंतर्विरोध खड़ा हो गया है। इलीट राजनीति इन मकसदों को पूरा करने की राह में हमेशा की तरह आज भी बाधक बनी हुई है। लेकिन हालिया घटनाक्रम यह है कि वंचित समूहों से उभर कर आए लेकिन अब इलीट श्रेणी में शामिल हो चुके नेता और बुद्धिजीवी भी इसी बाधक राजनीति का हिस्सा बन गए हैं।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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