Tuesday, April 16, 2024

स्कूली शिक्षा में गुणात्मक सुधार को कैसे संभव बनाया जा सकता है?

वर्ष 2023 में, स्कूल अथवा कॉलेज में नामांकित 14-18 वर्ष की उम्र के मात्र 78.1% बच्चे ही ऐसे थे, जो कक्षा 2 की पुस्तक को पढ़ सकने के काबिल पाए गये थे। इस आयु वर्ग के 21.9% छात्र ऐसे थे, जो कक्षा 2 का पाठ तक पढ़ने में असमर्थ थे।

इतना ही नहीं, 2023 में स्कूल या कॉलेज में दाखिला लिए हुए 14 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के केवल 47.5% युवा ही कक्षा 2 से 4 की साधारण गणित का गुना-भाग समस्या को हल कर पाने में समर्थ पाए गये थे। इसका अर्थ यह हुआ कि स्कूलों या कॉलेजों में नामांकित 14-18 आयु वर्ग के 52.5% छात्र कक्षा 2 से 4 की गणित को हल कर पाने में सक्षम नहीं हैं।

भारत में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर इन चौंकाने वाले निष्कर्षों का खुलासा एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (ग्रामीण) 2023 (संक्षेप में ASER 2023) की रिपोर्ट से सामने आया है। असल में  भारत में स्कूली शिक्षा की स्थिति के बारे में ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े अब एएसईआर की रिपोर्टों में एक नियमित सालाना विशेषांक बनकर रह गए हैं। अगले दिन देश के समाचारों की सुर्खियाँ बनने के अलावा इन रिपोर्टों और निष्कर्षों को नीति निर्माताओं द्वारा हर बार करीब-करीब बिसरा दिया जाता है।

देश में स्कूली शिक्षा के हालात को लेकर इसे एक दुखद टिप्पणी के तौर पर देखा जा सकता है, जो भारत की स्कूली शिक्षा में लगभग विकट संकट की स्थिति को बयां करती है।

इसके अध्ययन से हमें समग्र रूप से भारत में शिक्षा के भविष्य पर इन कमियों के प्रभाव के बारे में एक समझ हासिल करने में मदद मिल सकती है। शिक्षा में सर्वप्रथम बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक (जोड़-घटाव) कौशल को देखना होगा। उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय स्तर पर यदि छात्र किताबें पढ़ने में असमर्थ रहते हैं तो आगे चलकर अगली कक्षाओं में भाषा की समझ की कमी उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा बनकर सामने आ जाती है। छात्र किसी भी विषय को नहीं समझ पाते हैं, क्योंकि असल में वे किसी भी भाषा को समझने की कूव्वत ही नहीं रखते हैं। चाहे वे किसी भी कक्षा में पहुंच चुके हों, उन्हें अशिक्षित मानकर चलना चाहिए। 14-18 आयु-समूह में हर पांचवें से ज्यादा छात्र किसी भी भाषा में पारंगत न हों, और आधे से ज्यादा को सिंपल गुणा-भाग न आता हो तो यह आंकड़ा हैरत में डालने वाला है। इसका मतलब यह हुआ कि उभरते डिजिटल/एआई युग से तो यह बीस फीसदी आबादी बिना कुछ किये ही छूट जाने वाली है।

खैर, इसके बारे में अब किया ही क्या जा सकता है?

राजीव गांधी की 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा था। इसके अलावा बच्चों के लिए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई अधिनियम) 2009 में लाया गया था, जिसका उद्देश्य माध्यमिक स्तर पर सभी के लिए शिक्षा (जिसमें 12-18 आयु-समूह वर्ग को कवर करना) था, जो कि संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 4 के अनुरूप 2030 तक हासिल करने का था।

इस लिहाज से देखें तो आज देश सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के अपने लक्ष्य को हासिल करने के बेहद करीब आ चुका है। 14-18 आयु वर्ग के 86.8% युवाओं का स्कूलों में दाखिला दर्ज है, जबकि प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों के दाखिले की 90% को पार कर गई है। यह प्रगति बेहद उल्लेखनीय कही जा सकती है, लेकिन स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता बेहद शोचनीय बनी हुई है।

देश को अब एएसईआर के आंकड़ों को लेकर सनसनी से आगे बढ़ने की जरूरत है और स्कूली शिक्षा में अब शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को अपनी प्राथमिकता में लेना चाहिए।

हमें देखना होगा कि शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली वे कौन सी समस्याएं हैं, जिनसे निपटने की जरूरत है?

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मुख्य रूप से अच्छे शिक्षकों एवं शिक्षण की जरूरत है। इसके अलावा, इसमें यथोचित बुनियादी शैक्षिक ढांचे को खड़ा करने एवं शैक्षिक मदद कितना उपलब्ध कराया जाता है, पर भी काफी कुछ निर्भर करता है।

उच्च गुणवत्ता वाली स्कूली शिक्षा को तभी उपलब्ध कराया जा सकता है, यदि इसे डिजिटल शिक्षा जैसे नवीनतम रुझानों के अनुरूप रखा जाये। अगर इसे सिर्फ परीक्षा-केन्द्रित बनाकर सीमित रखा जाता है, और छात्रों पर अच्छे अंक हासिल कर अच्छा प्रदर्शन करने का अतिशय दबाव डाला जाता है, तो इसका दुष्परिणाम मानसिक टूटन, और यहां तक ​​कि आत्महत्याओं में भी हो सकता है। इसके बजाय, यदि पाठ्यक्रम छात्रों को रट्टा मारने पर केंद्रित न किया जाये; अगर छात्रों का एक बड़ा हिस्सा स्कूल से इतर कोचिंग केंद्रों पर निर्भर न रहे; यदि स्कूल ड्रापआउट की दर पर अंकुश लगाया जाता है; यदि शिक्षा को आदिवासियों, मुसलमानों, दलितों, सड़कों पर रहने वाले बच्चों, झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों, विकलांग बच्चों सहित प्रवासी मजदूरों के बच्चों के लिए भी समावेशी एवं सुनिश्चित किया जाता है, यदि सभी स्तर पर लड़कियों और लड़कों के बीच में साम्यता रखी जाती है; और, सबसे बड़ी बात यदि शिक्षा को सबके लिए सुलभ और फीस को कम रखा जाता है, तो बड़ा बदलाव संभव है।

शिक्षकों की गुणवत्ता का प्रश्न 

यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक, 2021 में देश में आरटीई कानून होने के बावजूद 10 लाख स्कूली शिक्षकों की कमी थी। वर्ष 2013 में भारत के स्कूलों में लगभग आठ लाख अप्रशिक्षित शिक्षक कार्यरत थे, जिनकी संख्या 2017 बढ़कर 11 लाख हो चुकी थी।

भारत में, शिक्षकों के लिए रिफ्रेशर पाठ्यक्रम सिर्फ कॉलेज शिक्षकों के लिए उपलब्ध है और उसके लिए भी यूजीसी ने दो सप्ताह का प्रतीकात्मक पाठ्यक्रम चालू किया हुआ है। लेकिन प्राथमिक विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों के पास कोई भी आधिकारिक रिफ्रेशर कोर्स उपलब्ध नहीं है। सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए व्यापक स्तर पर कौशल विकास कार्यक्रम चलाती है, लेकिन उसके पास नियोजित शिक्षकों के लिए शिक्षण कौशल उन्नयन हेतु कोई कार्यक्रम नहीं है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि एएसईआर रिपोर्ट शिक्षकों की कमी या अयोग्य शिक्षकों की कुल संख्या के बारे में कोई सर्वेक्षण नहीं करती है, जबकि हर बार शैक्षिक परिणामों की निम्न गुणवत्ता को लेकर सनसनीखेज आंकड़े पेश करती रहती है।

स्कूल वापसी कार्यक्रम को हासिल सीमित सफलता 

एनएसओ डेटा पर आधारित शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021-22 में राष्ट्रीय स्तर पर ड्रॉपआउट दर 12।6% पाई गई थी। ड्राप-आउट छात्रों को फिर से दाखिला दिलवाने के लिए गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) एवं निजी फर्मों को अनुबंधित किया गया। ऐसी ही एक निजी एजेंसी के रिकॉर्ड के मुताबिक, एनईपी के अनुसार सितंबर 2022 तक उसके द्वारा शुरू किए गए बैक-टू-स्कूल कार्यक्रम के पहले चरण के पूरा होने तक, ऐसे छात्रों में से सिर्फ 26% को फिर से दाखिला दिलाने में एजेंसी सफल हो पाई थी। इनमें से ही सिर्फ 48% छात्रों को आगे बरकरार रखने में कामयाबी हासिल हो पाती है। हालाँकि यह संख्या भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन इसमें 100% (सार्वभौमिक) शिक्षा का लक्ष्य काफी दूर की कौड़ी साबित होने लगती है।

परीक्षा केंद्रित रटंत शिक्षा एक प्रमुख समस्या 

इस बारे में कई आलोचक पहले ही बता चुके हैं कि भारत में शिक्षा प्रणाली मुख्यतया परीक्षा में अंक लाने तक घूमती रहती है। यह छात्रों को रटंत विद्या में बने रहने के लिए मजबूर करता है। यह बात दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ हाई-प्रोफाइल कॉलेजों में दाखिले के प्रति दीवानगी में सबसे अच्छे ढंग से नमूदार होती है, जहां पर दाखिले के लिए कट-ऑफ हमेशा ही 98% से ऊपर रहती है! सैकड़ों प्रश्नों एवं उत्तर पुस्तिका वाली गाइडबुकें बेची जाती हैं और विद्यार्थियों को उन्हें सिर्फ रटना होता है।

यहां तक ​​कि गणित और भौतिकी के प्रश्नों को भी रटा जाता है। इससे विश्लेषणात्मक शिक्षा का बड़ा नुकसान होता है। इसीलिए कोई आश्चर्य नहीं की बात नहीं जब आईटी क्षेत्र के प्रमुख हस्ती नारायण मूर्ति इस बात को कहते हैं कि कर्नाटक के इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकले 75% आईटी स्नातक रोजगार के लायक ही नहीं हैं! यही हाल तमिलनाडु का भी है, जहां 500 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों से बड़े पैमाने पर निकलने वाले इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में से 60% युवा बेरोजगार बने हुए हैं!

खुद को साबित करने का अत्यधिक दबाव 

छात्रों पर काम का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ा है। वे सुबह जल्दी उठ जाते हैं। अक्सर वे सुबह 8 बजे से पहले ही तैयार हो जाते हैं। शाम को 4 बजे घर आकर फिर से शाम 5 बजे ट्यूशन के लिए भागते हैं। 8 बजे रात वापस घर आकर होमवर्क करने में और एक घंटा लगाते हैं। छात्रों के लिए शिक्षा एक नीरस दिनचर्या बनकर रह गई है। इसमें अब कोई रचनात्मक जुड़ाव नहीं रह गया है। यह एकरसता पूंजीवाद के लिए यांत्रिक कार्यबल के हिस्से के तौर पर बेहद उपयुक्त साबित होती है, जहां अनेक क्षेत्रों में किसी प्रकार की रचनात्मकता की आवश्यकता नहीं होती। जैसा कि चैप्लिन की फिल्मों देखने को मिलता है, मनुष्य को मशीनों की तरह बन जाने के लिए अनुकूलित किया जा रहा है। इसलिए केवल कार्यस्थल पर काम ही नहीं, बल्कि उसके लिए तैयार होने के लिए जिस पढ़ाई की जरूरत होती है, उसे भी अमानवीय बना दिया गया है।

इतनी कड़ी दिनचर्या की वजह से कई विद्यार्थियों के पास खेलने का भी समय नहीं रहता। उनके पास न कोई मनोरंजन का साधन है और न ही आराम करने का समय। यही वजह है, कि शाम को बाहर खेलने वाले बच्चों का अनुपात भी अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। ऐसे में उन्हें जो भी खाली समय मिलता है, उसमें अधिकांश समय वे स्मार्टफोन में व्यस्त रहते हैं। उन्हें वास्तविक दुनिया से इतनी अधिक नफरत होने लगती है कि वे एक अलग साइबर दुनिया में पलायन की सोचने लगते हैं, जो कि आभासी दुनिया है और आसानी से उपलब्ध है।

वे कहानी की किताबों को हाथ तक नहीं लगाते और यहां तक ​​कि पहले टीवी देखने का क्रेज उनमें देखने को मिलता था, वह भी जबसे उनके हाथों में स्मार्ट फोन आ गया है, अब काफी कम हो गया है। माता-पिता भी उन्हें स्मार्ट फोन की कृपा पर छोड़ देते हैं ताकि वे उन्हें परेशान न करें, क्योंकि वे स्वयं अपने कार्यालय के समय के अतिरिक्त काम में उलझे होते हैं। कई बच्चों का जीवन अब जंक फूड और स्मार्ट फोन के इर्द-गिर्द घूमता है, जो उन्हें कहीं अधिक आकर्षक विकल्प मुहैया कराते हैं। दुर्भाग्यवश एएसईआर सर्वेक्षण, छात्रों के जीवन में हो रहे ऐसे बदलावों को अपने अध्ययन में शामिल नहीं करता है, जो भारतीय स्कूली शिक्षा के संकट के पीछे की मूलभूत वजहों एवं अभिव्यक्तियों दोनों को उजागर करता है।

शिक्षा को गैर-समावेशी बनाती महंगी शिक्षा प्रणाली

महंगी फीस न सिर्फ अभिभावकों के ऊपर बोझ है, बल्कि यह अमीरों और गरीबों के बीच में विभाजन पैदा करती है, और निर्धन को शिक्षा से बाहर कर देता है।

दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) या इसकी तरह के अन्य शहरों में चल रहे स्कूलों में हर साल की फीस के तौर पर 60,000 रुपये वसूले जाते हैं। ऐसे स्कूलों को उच्च मध्यम वर्ग के संभ्रांत लोगों के लिए एक स्कूल के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है। 

उत्तर प्रदेश में क्राइस्ट चर्च स्कूल नामक कॉन्वेंट स्कूल, जहां मध्य वर्ग के छात्र पढ़ते हैं, में प्रति वर्ष 30,000 रुपये शुल्क के रूप में लिया जाता है।

वहीं प्रयागराज में रुद्र प्रयाग स्कूल, जो कि 20 किलोमीटर दूर शहर की परिधि में स्थित है, जिसमें इलाके के संपन्न किसान परिवारों के बच्चे पढ़ने के लिए जाते हैं। यहां पर एलकेजी छात्रों के लिए 22,000 रुपये प्रति वर्ष का शुल्क लिया जाता है।

बड़े शहरों में ऐसा स्कूल ढूंढना बेहद मुश्किल काम है, जो प्रति वर्ष 25,000 रुपये से कम फीस पर बच्चों को प्रवेश देता हो।

प्राइवेट स्कूलों में इतने बड़े पैमाने पर यह सब कई दशकों से जारी है, लेकिन राज्य सरकारों ने निजी स्कूलों पर स्कूली फीस की सीमा को लेकर कोई नियम लागू नहीं किया है।

महंगी निजी शिक्षा होने के बावजूद, शहरी मलिन बस्तियों में रह रहे असंगठित क्षेत्र के श्रमिक एवं ग्रामीण खेतिहर मजदूर भी अपने बच्चों को ऐसे ‘इंग्लिश मीडियम’ या “कॉन्वेंट” का ठप्पा लगे स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए होड़ में देखे जा सकते हैं।यह सब वे इस उम्मीद की बिना पर करते हैं कि सिर्फ इन्हीं स्कूलों में पढ़कर उनके बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त संभव हो सकेगा।

लेकिन इन सभी स्कूलों में ऊंची फीस वसूलने का संबंध शिक्षा की गुणवत्ता से नहीं जुड़ा है। न ही यह शिक्षकों को दिए जाने वाले वेतन में प्रतिबिंबित होता है। “इंग्लिश-मीडियम” या “कॉन्वेंट” लेबल के सिवाय इनमें से अधिकांश स्कूलों में कोई खास उन्नत शिक्षण कार्य नहीं होता, विशेषकर गणित और विज्ञान विषय में।

जहां तक स्कूलों में दाखिले का प्रश्न है, निजी स्कूलों ने भी अब सरकारी स्कूलों की बराबरी शुरू कर दी है, कम से कम शहरी क्षेत्रों में इस तथ्य की तस्दीक की जा सकती है। जिला शिक्षा सूचना प्रणाली (डीआईएसई) 2019-20 के अनुसार, भारत में प्रारंभिक शिक्षा में निजी स्कूलों में नामांकित छात्रों का अनुपात 31.4% था, जो 2014-15 में मात्र 28.7% था। ग्रामीण क्षेत्रों (25.2%) की तुलना में शहरी क्षेत्रों (43.5%) में निजी स्कूलों में नामांकन की दर कहीं अधिक है।

लेकिन सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूल बेहतर प्रदर्शन करते नहीं दिखते। यदि हम कक्षा 10 की सार्वजनिक परीक्षाओं का उदाहरण लें, तो उत्तर प्रदेश राज्य बोर्ड परीक्षा 2022 में सरकारी स्कूलों का उत्तीर्ण प्रतिशत 85.85% था, जबकि निजी सहायता प्राप्त स्कूलों का उत्तीर्ण प्रतिशत 85.44% था। लेकिन ASER 2019 सर्वेक्षण के मुताबिक, निजी स्कूलों में औसत मासिक फीस सरकारी स्कूलों की तुलना में 6 गुना अधिक थी।

अब व्यापक जनसमुदाय में यह धारणा आकार ले चुकी है कि शिक्षा ही प्रगति का एकमात्र साधन है। यहां तक कि एक मजदूर भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए पैसे उधार ले रहा है। भोजन और स्वास्थ्य के बाद हर किसी के लिए यह सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुकी है। वर्ष 2022-23 में प्रति व्यक्ति सालाना 98,000 रूपये की आय वाले इंसान के लिए भोजन, आवास एवं स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च को ध्यान में रखते हुए, अपेक्षाकृत बेहतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ एक यथोचित मध्य वर्ग के स्कूल में अपनी आय का 20% या 20,000 रुपये प्रति वर्ष आवंटित करना कई परिवारों के लिए बेहद दुष्कर बना हुआ है।

गौरतबल बात यह है कि अधिकांश घरों में कमाने वाला एक ही सदस्य मौजूद है। 2019 एएसईआर सर्वेक्षण के अनुसार, निजी स्कूलों में भुगतान की जाने वाली औसत मासिक फीस लगभग 7000 रुपये थी, जबकि सरकारी स्कूलों में यह 1500 रुपये से भी कम पाई गई। इसके अलावा, अधिकांश निजी स्कूलों में भी शिक्षा की गुणवत्ता निम्न पाई गई है। निजी स्कूलों में उच्च शुल्क संरचना ही वह प्रमुख कारक है जो एलकेजी में लरों 90% या इससे भी अधिक नामांकन होने के बावजूद कक्षा 10 में 30% छात्रों के पिछड़ जाने को व्याख्यायित करती है।

भारत में स्कूली छात्रों को छात्रवृत्ति के रूप में कुछ खास नहीं मिलता। हाल के दिनों में, प्रधान मंत्री छात्रवृत्ति योजना (पीएमएसएस) की घोषणा की गई है, जो 2024 से लागू होने जा रही है। इसके तहत लड़कियों को 3,000 और लड़कों को 2500 रुपये की छात्रवृत्ति मिलेगी। लेकिन इन छात्रवृत्तियों की कुल संख्या मात्र 5,500 होगी। 

भारत में 20 करोड़ स्कूली छात्रों की संख्या को देखते हुए यह संख्या नगण्य है। कुछ राज्य सरकारें एवं निजी एजेंसियां ​​भी छात्रवृत्ति देने का काम कर रही हैं। लेकिन कुल मिलाकर ये सभी छात्रवृत्तियां 1% हिस्से को भी कवर नहीं कर पा रही हैं।

भारत में स्कूली शिक्षा के अर्थशास्त्र की पड़ताल से बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने आते हैं, जो बताते हैं कि क्यों करीब 20 करोड़ छात्र प्राथमिक शिक्षा के लिए भारत में दाखिला लेते हैं, लेकिन मात्र 2.85 करोड़ ही उच्च माध्यमिक स्तर में प्रवेश कर पाते हैं।

भारत में स्कूली शिक्षा की खराब गुणवत्ता की कई वजहें हैं, और इससे कई स्तरों पर निपटने की चुनौती बनी हुई है। स्कूली शिक्षा के लिए शिक्षा का व्यावसायीकरण एवं फ्री-मार्केट दृष्टिकोण, छात्रों के एक बड़े वर्ग को ही बाहर का रास्ता दिखाने वाला साबित होगा, जैसा कि उपरोक्त आंकड़े इसे स्पष्ट करते हैं।

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को लेकर कुछ सर्वोत्तम उपाय 

इसमें से एक है, आंध्र प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत ग्राम एवं स्कूल स्तर पर ग्राम शिक्षा समितियों (वीईसी) का गठन किया गया है। इसमें माता-पिता और गांव के बुजुर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है, जिनकी देखरेख में ग्रामीण स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में काफी सुधार देखने को मिला है। स्कूली शिक्षा पर सामुदायिक निगरानी का यह एक अच्छा मॉडल साबित हुआ है।

वहीं केरल में, कुडुम्ब श्री समूहों के साथ-साथ महिलाओं के सामुदायिक समूहों को स्कूलों की देखरेख के अलावा स्कूल-वापसी कार्यक्रम की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसकी वजह से स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में काफी सुधार देखने को मिला है। कुदुम्ब श्री समूहों को “बीयूडीएस” स्कूल, प्री-नर्सरी और नर्सरी छात्रों के लिए स्कूलों को स्थापित करने का भी अधिकार दिया गया है। केरल में कुदुम्ब श्री का अनुभव, आंध्र प्रदेश के पंचायत पदानुक्रम मॉडल की तुलना में कुछ हद तक स्वायत्त और बेहतर कहा जा सकता है।

भारत में जब कभी भी प्राथमिक विद्यालयों को नागरिक समाज संगठनों को सुपुर्द करने का प्रस्ताव किया गया, तो इसका शिक्षक संगठनों के द्वारा विरोध किया गया। लेकिन अमेरिका में एक ऐसा ही प्रयोग इसके सुखद परिणाम को दर्शाता है, जिसमें सामाजिक आंदोलनों ने स्थानीय शैक्षिक नौकरशाही एवं शिक्षकों के उपर अपने आधिपत्य को स्थापित कर अच्छा परिणाम लाने का काम किया।

कुछ राज्यों एवं हाल के दिनों में जिस तरह कर्नाटक राज्य में शिक्षा विभागों द्वारा स्कूल बैग के वजन पर सरकारी नियम लागू किया गया, उसी की तर्ज पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने भी हाल ही में निजी कोचिंग को लेकर दिशानिर्देश जारी किए हैं। ये दिशानिर्देश कक्षा 8 तक के छात्रों के लिए कोचिंग पर प्रतिबंध लगाते हैं, जो कि सही है, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ये नियम फीस या कोचिंग घंटों को नियंत्रित कर पाने में विफल साबित होते हैं। इसके अलावा कुछ अन्य सुझाव इस प्रकार से हैं: 

  • निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक सभी छात्रों को प्रति माह 3000 रुपये की शिक्षा सब्सिडी का भुगतान किया जाना चाहिए।
  • छोटे बच्चों के लिए छुट्टियां मायने रखती हैं। इन छुट्टियों का उपयोग प्रत्येक सेमेस्टर में शिक्षकों के लिए अनिवार्य रिफ्रेशर कोर्स के तौर पर किया जाना चाहिए।
  • स्कूलों में जातिवाद पर अंकुश लगाने के लिए, विशेषकर भर्ती के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए शहर स्तर पर निगरानी समितियों का गठन किया जाना चाहिए।
  • फीस देने में असमर्थता की वजह से किसी भी छात्र को स्कूल से नहीं निकाला जाना चाहिए।
  • विकलांग बच्चों एवं मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए प्रत्येक ब्लॉक में विशेष विद्यालय की स्थापना की जानी चाहिए और फुटपाथ पर रह रहे बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल स्थापित किए जाने चाहिए।
  • मध्याह्न भोजन के अलावा, तमिलनाडु में शुरू की गई योजना की तरह ही स्कूलों में बच्चों के लिए नाश्ते की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • छात्रों के प्रदर्शन के लिए शिक्षकों को व्यक्तिगत तौर पर जवाबदेह बनाने की जरूरत है।
  • सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति को मंत्रीस्तरीय नौकरशाही से मुक्त कर एक स्वायत्त लोक सेवा आयोग को सुपुर्द किया जाना चाहिए और पदों में रिक्तियों को खत्म करने के लिए इसे स्वचालित बनाया जाना चाहिए। छात्र-शिक्षक अनुपात को कानून के तहत गारंटी करना होगा।
  • एनसीईआरटी के द्वारा वार्षिक स्कूली शिक्षा सर्वेक्षण का आयोजन किया जाता है, लेकिन यह सर्वेक्षण आधा-अधूरा होता है। सर्वेक्षण प्रश्नावली को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि इसमें ऊपर चिन्हित किये गये सभी मुद्दों को शामिल किया जा सके।
  • स्कूलों में पाठ्य पुस्तकों के भगवाकरण के खिलाफ देशव्यापी अभियान चलना चाहिए।

इन सभी उपायों को यदि अपनाया जाता है तो यह स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए अपनाए गए उपायों को मजबूती प्रदान करने में मददगार साबित होगी।

(बी सिवरामन लेखक हैं।)

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