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जन्मदिन पर विशेष: भूख और गरीबी ने दिखाया था चे को क्रांति का रास्ता

14 जून 1928 को अर्जेंटीना में जन्मे चे ग्वेरा की बोलिविया में, उनकी गिरफ्तारी के एक दिन बाद, 9 अक्टूबर, 1967 को, हिरासत में हत्या कर दी गई थी। जब उनकी हत्या हुयी तो वे केवल 39 साल के थे। चे ग्वेरा ने मरते समय हमलावर और हत्यारे बोलिवियाई सार्जेंट टेरान से कहा था,

” तुम एक इंसान को मार रहे हो, पर उसके विचार को नहीं मार सकते ।”

चे की बात बिल्कुल सच है। वे सशरीर तो उसी दिन रुखसत हो गए, पर उनके विचार आज भी करोड़ों दबे कुचले मज़लूमों और महकूमो को मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।

अर्नेस्तो चे ग्वेवेरा एक ऐसा नाम और चरित्र है जिसका प्रभाव दुनिया भर के पीड़ित और शोषित जन मानस को, उनके शोषण पंक से निकलने के लिये  हौसला देता है, और उम्मीद की एक राह दिखाता है। चे ग्वेरा आज भी, युवाओं, छात्रों और क्रांतिकारियों के लिए एक अजस्र प्रेरणास्रोत की तरह हैं। एक क्रांति दर्शी और शोषण विहीन समाज के सपनों की पीठिका लिए, हमारे महान, क्रांतिकारी भगत सिंह का जो स्थान, भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में है, वही स्थान चे ग्वेवेरा का लैटिन अमेरिका सहित कई महा देशों में है।

चे एक चिकित्सक थे। उन्होंने भूख और गरीबी को बेहद करीब से देखा था। भूख , गरीबी और कुपोषण के कारणों को उन्होंने समझा था। उन्होंने पूरे लैटिन अमेरिकी देशों की अपनी बाइक से, यात्रा की थी और इन अविकसित देशों में अंधकार की तरह पसरे गरीबी और शोषण को, चे के संवेदनशील मन ने बड़ी शिद्दत से महसूस किया था।

उन्होंने, इन देशों की जनता को इस घोर सामाजिक और आर्थिक असमानता जन्य बीमारी से मुक्त करने के लिये संगठित भी किया। चे ने अपनी इस मोटरसाइकिल यात्रा पर एक डायरी भी लिखी थी। उसी यात्रा वृतांत के आधार पर, उनके देहांत के बाद, द मोटरसाइकिल डायरी के नाम से एक किताब भी छपी और 2004 में द मोटरसाइकिल डायरीज नाम से एक फिल्म भी बनी।

चे ग्वेरा क्यूबा की क्रांति के नायक फिदेल कास्त्रो के सबसे भरोसेमंद साथियों में से एक थे। फिदेल और चे ने सिर्फ 100 गुरिल्ला लड़ाकों के साथ मिलकर, क्यूबा में, अमेरिका समर्थित तानाशाह बतिस्ता के शासन को 1959 में उखाड़ फेंका था। अमेरिका आज तक बतिस्ता की तानाशाही को उखाड़ फेंकने की घटना भुला नहीं पाया है। उसने क्यूबा पर तरह-तरह के राजनीतिक, अर्थिक और सामाजिक प्रतिबंध लगाए और क्यूबा को तोड़ने और फिदेल कास्त्रो की हत्या तक करने के कई षड्यंत्र अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने किये लेकिन सीआईए को, फिदेल के संबंध में सफलता नहीं मिल पायी। क्यूबा अब भी अमेरिका के लिये असहज होने का एक आधार बना हुआ है।

अक्सर चे के विरोधियों द्वारा उनकी छवि एक हिंसक हत्यारे के रूप में गढ़ी जाती है । लेकिन चे ग्वेरा एक गुरिल्ला योद्धा थे, जिन्हें दुनिया के शोषितों से प्यार था और जिन्होंने शोषितों के पक्ष में, उनको शोषण से मुक्त कराने के लिये हथियार उठाया। उनकी बात कही और उनके पक्ष में खड़े रहे। चे की एक खूबसूरत प्रेम कथा भी है, पर उसका उल्लेख फिर कभी। उनका कहना था कि एक सच्चा क्रांतिकारी प्यार की गहरी भावना से संचालित होता है।

अमेरिका ने क्यूबा पर कई तरह के, कूटनीतिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे, जैसा कि अब भी वह ऐसे ही प्रतिबंध, एशिया और अफ्रीका के उन देशों के खिलाफ लगता रहता है, जो उसकी दबंगई के खिलाफ सर उठाते हैं। ऐसे प्रतिबंध, वह, कुछ तो अपने कूटनीतिक कारणों से और कुछ तो अपनी अहंकारी और दबंगई से लगाता रहता है। क्यूबा ने तीसरी दुनिया और विकासशील देशों के साथ, विशेषकर जो गुट निरपेक्ष आंदोलन से जुड़े देश थे, से अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने की रणनीति अपनाई थी। ऐसे में अमेरिकी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ वैश्विक एकता की बात करने वाला चे ग्वेरा से बेहतर व्यक्ति, क्यूबा के पास कोई और नहीं था। इसी अभियान में, चे भारत के भी दौरे पर 1959 में आए थे। फिदेल ने उन्हें कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार सौंपा था और चे, फिदेल के सबसे विश्वसनीय कॉमरेड तो थे ही ।

अपनी भारत यात्रा के दौरान, चे ने आल इंडिया रेडियो के लिए केपी भानुमति को एक इंटरव्यू दिया था। भारत पूरी दुनिया में गांधी के देश के नाम से मशहूर है और अहिंसा गांधीवाद की विचारधारा का मूल सिद्धांत है। पर दूसरी ओर चे, मार्क्सवाद से प्रभावित एक ‘गुरिल्ला लड़ाके’ के रूप में प्रसिद्ध थे। मेहमान और मेज़बान, दोनों ही, एक दूसरे के विपरीत, सैद्धांतिक ध्रुवों पर स्थित थे । लेकिन, चे केवल एक, रूमानी, ट्रिगर हैप्पी गुरिल्ला लड़ाके ही नहीं थे, बल्कि वे अपनी विचारधारा के गम्भीर अध्येता भी थे।

वे किसी भी विचारधारा की कमी और मजबूती को अच्छी तरह से समझते थे। वे यह भी समझते थे कि, हर देश की भौतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार शोषण के खिलाफ संघर्ष के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। एक ही विचारधारा हूबहू उसी रूप में किसी दूसरे देश मे सफल नहीं हो सकती है। पर उनका उद्देश्य स्पष्ट था। उद्देश्य था, शोषण विहीन और समता पर आधारित समाजवादी राज्य की स्थापना करना।

चे का साफ-साफ मानना था कि, आजादी की लड़ाई भूख से जन्म लेती है। केपी भानुमति को दिए इंटरव्यू में चे के एक रोचक जवाब को पढ़ें। विचारधारा की बात करते हुए भानुमती ने एक सवाल पूछा कि

” आप कम्‍युनिस्‍ट माने जाते हैं, कम्‍युनिस्‍ट (साम्‍यवादी) मताग्रह एक बहु-धर्मी समाज में कैसे स्‍वीकार किए जा सकते हैं ?”

इस पर चे का जवाब था

” मैं अपने को कम्‍युनिस्‍ट नहीं कहूंगा। मैं एक कैथलिक होकर जन्‍मा, एक सोशलिस्‍ट (समाजवादी) हूं और बराबरी में और शोषक देशों से मुक्ति में भरोसा रखता हूं। मैंने लड़कपन के दिनों से भूख को देखा है, कष्‍ट, भयंकर गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी को भी। क्‍यूबा, वियतनाम और अफ्रीका में ऐसे हालात रहे हैं, आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्‍म लेती है। मार्क्‍स-लेनिन के सिद्धांतों में उपयोगी पाठ (संदेश) हैं। जमीनी क्रांतिकारी मार्क्‍स के दिशा-निर्देशों को मानते हुए अपने संघर्षों का रास्‍ता खुद बनाते हैं। भारत में गांधी जी के सिद्धांतों की अपनी जरूरत है, जिन (सिद्धांतों) की बदौलत भारत को आजादी हासिल हुई। ‘’

चे अपनी इसी भावना के तहत क्यूबा को छोड़ अफ्रीका के कांगो में गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देने चले गए। इसके बाद वे बोलिविया में हो रहे जन संघर्ष में शामिल होने के लिये गए। जहां अमेरिका समर्थित बोलिविया सरकार की सेना ने हिरासत में उनकी हत्या कर दी। बोलिविया की सरकार ने मौत के बाद पहचान के लिए चे के हाथ काट लिए थे और उनके शव को अनजान जगह पर दफना दिया था। चे के शरीर के अवशेष का पता उनकी मृत्यु 9 अक्टूबर 1967 के 30 साल बाद 1997 में चला।

चे ने जिस वक्त क्यूबा छोड़ा था तब वे क्यूबा के लोकप्रिय नेताओं में से एक थे और संयुक्त राष्ट्रसंघ में क्यूबा का प्रतिनिधित्व भी कर चुके थे। वे चाहते तो बड़े आराम से क्यूबा सरकार में बड़े पद पर रहते हुए शेष जीवन सुख पूर्वक व्यतीत कर सकते थे। लेकिन चे जिसका स्पेनिश भाषा में अर्थ दोस्त या भाई होता है, सच्चे अर्थों में दुनिया के गरीबों के दोस्त थे। उन्होंने राजनैतिक पद की जगह जनता से दोस्ती और भाईचारे को चुना।

लैटिन अमेरिकी देशों में अगर समाजवाद आज भी एक बड़ी ताकत है तो चे का इसमें अहम योगदान है। अब चे के एक लेख का यह उद्धरण पढ़ें,

” लगभग सभी को पता है कि सालों पहले मैंने अपना करियर एक डॉक्टर के तौर पर शुरू किया था। और जब मैंने डॉक्टरी पढ़ना शुरू किया तो अधिकतर सिद्धांत, जो मैं आज एक क्रांतिकारी के रूप में जानता हूँ, मेरी विचार सारणी में मौजूद नहीं थे।

सबकी ही तरह मैं भी सफल होना चाहता था। मेरा सपना था कि मैं एक प्रसिद्ध मेडिकल रिसर्च वैज्ञानिक बनूँ, अथक परिश्रम करके कुछ ऐसा खोज निकालूं जो मानवता के काम आ सकता, और यह मेरे लिए एक निजी उपलब्धि भी होती। मैं भी, सबकी ही तरह, अपनी परिस्थितियों की उपज था। ग्रेजुएशन के बाद, कुछ विशेष परिस्थितियों और शायद मेरे स्वभाव के कारण भी, मैंने पूरे अमेरिका महाद्वीप की यात्रा आरंभ की और मैं इस सबसे परिचित होता चला गया। हैती और सांतो डोमिंगो को छोड़ कर, मैं कुछ हद तक, लैटिन अमेरिका के सभी देशों की यात्रा कर चुका हूँ।

उन परिस्थितयों की वजह से, जिनमें मैंने यह यात्रा की है, पहले तो एक विद्यार्थी की हैसियत से और बाद में एक डॉक्टर की हैसियत से, मैंने गरीबी, भूख और बीमारी को बहुत करीब से देखा; पैसे की कमी की वजह से एक बच्चे का इलाज न कर पाने की असमर्थता को देखा और मैंने देखा कि किस तरह, जैसा कि हमारी मातृभूमि अमेरिका महाद्वीप के शोषित वर्गों में अक्सर होता है, लगातार भूख और सजा से ऐसी हालत हो गई है कि एक पिता अपने बेटे की मौत को भी एक महत्वहीन एक्सीडेंट मान कर संतोष कर लेता है। और इस समय तक मुझे अहसास होने लगा था कि कुछ ऐसी भी चीजें हैं जो उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि मेरा प्रसिद्ध होना या चिकित्सा विज्ञान में कोई सार्थक योगदान देना; मैं इन लोगों की मदद करना चाहता था।

लेकिन मैं, सबकी ही तरह, अपनी परिस्थितियों की उपज बना रहा, और मैं इन लोगों की मदद अपने निजी प्रयासों से करना चाहता था। मैं पहले ही काफी यात्रा कर चुका था- मैं जिस समय ग्वाटेमाला में था- मैंने क्रांतिकारी डॉक्टर के आचरण पर कुछ नोट्स बनाने शुरू कर दिए थे। मैंने क्रांतिकारी डॉक्टर बनने के लिए जरूरी चीजों के बारे में अनुसन्धान करना शुरू कर दिया था।

और इस समय पर मुझे एक आधारभूत चीज पता चली। एक क्रांतिकारी डॉक्टर बनने के लिए, या फिर कहें कि एक क्रांतिकारी ही बनने के लिए, एक क्रांति की जरूरत होती है। अलग थलग रह कर किये गए निजी प्रयास, अपने तमाम आदर्शों की पवित्रता के बावजूद, किसी काम के नहीं होते, और अगर कोई आदमी अकेले ही काम करते हुए, अमेरिका के किसी कोने में किसी बुरी सरकार और प्रगतिरोधी सामाजिक परिस्थितियों के खिलाफ लड़ते हुए, किसी महान आदर्श के लिए पूरी जिंदगी का बलिदान भी कर देता है तो भी उससे कोई फायदा नहीं होता। एक क्रांति को पैदा करने के लिए हमारे पास वह होना चाहिए, जो आज क्यूबा में है, यानि पूरी जनता की लामबंदी।

और अंततः आज आपके सामने, अन्य सभी बातों से ऊपर, एक क्रांतिकारी डॉक्टर, यानि कहें तो वह डॉक्टर जो अपने पेशे से सम्बंधित तकनीकी ज्ञान को लोगों और क्रांति की सेवा में लगाता हो, बनने का अधिकार भी है और कर्तव्य भी।

( डॉ. अर्नेस्तो चे ग्वेवेरा के प्रसिद्ध लेख “क्रांतिकारी चिकित्सा” से एक अंश )

महान क्रांतिकारी, चे ग्वेवेरा के जन्मदिन पर, विनम्र स्मरण !!

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on June 14, 2020 4:04 pm

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