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Categories: बीच बहस

बहुसंख्यक सनातनी भारतीय लोकतंत्र के लिए बन गए हैं गंभीर खतरा

हाथरस गैंगरेप, हत्या और बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर आया अदालत का फैसला क्या आपस में कहीं जुड़ता है? दोनों घटनाओं को अगर तथाकथित महान भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में देखें तो जुड़ता है और इन दोनों ही घटनाक्रमों ने इस कथित लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर दी हैं। हाथरस गैंगरेप में न सिर्फ ‘बहुसंख्यक सनातनी’ लोगों की नैतिकता का शीराजा बिखर गया है बल्कि सत्ताधारियों के जरिए इसे मिल रहे संरक्षण का पर्दाफाश भी हुआ है।

‘बहुत हुआ नारी पर वार अबकी बार भाजपा सरकार’ जैसे पोस्टर लगाकर सत्ता हथियाने वाली पार्टी ने रेप के अपराधियों को संरक्षण देने का उद्योग तो सत्ता में आते ही शुरू कर दिया था। उन्नाव रेप कांड हम लोग बहुत जल्दी भूल गए। कुलदीप सिंह सेंगर नामक उन्नाव का नेता कांग्रेस में मामूली पद से होता हुआ पहले बसपा, फिर सपा और अंत में भाजपा से भी विधायक बना। इस शख्स की राजनीतिक यात्रा के दौरान सभी राजनीतिक दल इसकी कारगुजारियों को संरक्षण देते रहे, लेकिन भाजपा विधायक बनने के बाद इसकी कारगुजारियां चरम पर पहुंचीं।

बसपा और सपा ने इसे टिकट देते समय कभी इस शख्स की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश नहीं की। 2017 में यही सेंगर जब भाजपा में आया और चुनाव जीता तो ‘बहुसंख्यक सनातनी सरकार’ में इसके अरमान चरम पर पहुंचे। विधायक बनने के बाद इसका रसूख देखते हुए एक लड़की इस शख्स के पास नौकरी मांगने पहुंची। विधायक ने नौकरी देने के नाम पर उससे रेप किया। मामले का खुलासा हुआ।

उन्नाव रेप कांड को दबाने के लिए पीड़ित लड़की के पिता के साथ दो परिवारजनों की सड़क हादसे में जान ले ली गई। ये सड़क हादसे सेंगर ने प्रायोजित कराए! भाजपा की थू-थू हुई और भाजपा ने उसे पार्टी से निष्कासित करके पीछा छुड़ाया, लेकिन असलियत में नैतिकता, शुचिता का दम भरने वाली यह पार्टी सेंगर परिवार से कभी पीछा नहीं छुड़ा सकी। हाल ही में एक फोटो सामने आई, जिसमें सेंगर की पत्नी किसी कार्यक्रम में यूपी के मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा कर रही थीं। सेंगर की पत्नी आज भी भाजपा में हैं। यह ठीक है कि सेंगर के कुकृत्यों के लिए उनकी पत्नी का कोई दोष नहीं है, लेकिन शक तो भाजपा की नीयत पर है। उन्नाव के लोग तो यही समझते हैं न कि सेंगर परिवार आज भी भाजपा के करीब है।

चलिए ये तो भाजपा का नैतिक पक्ष हो गया। इस पार्टी के आईटी सेल ने जब महात्मा गांधी के हत्यारे और साजिशकर्ताओं के लिए 2 अक्टूबर को गोडसे जिंदाबाद का ट्रेंड सोशल मीडिया पर चलाया तो रेपिस्ट खानदान से संबंध रखना मामूली बात है। इस मौके पर मैं यहां ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय को लेकर यूपी में चल रही बहस पर चर्चा नहीं करना चाहता, लेकिन हाथरस गैंगरेप के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक प्रदर्शनों को जिस तरह यूपी में रोका गया, जिस तरह प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेता और सांसद राहुल गांधी को हाथरस नहीं जाने दिया गया, उन्हें धक्का देकर गिराया गया, लखनऊ में तमाम प्रदर्शनकारी गिरफ्तार कर लिए गए, वह भाजपा राज में इस कथित महान लोकतंत्र की खूबियां बताने के लिए काफी हैं।

यही भाजपा जब विपक्ष में थी और अन्ना आंदोलन में घुसपैठ कर किस तरह मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का काम हुआ, वो ज्यादा पुरानी बात नहीं है। अगर कांग्रेस भी उस समय यही हथकंडा अपनाती जो आज भाजपा आजमा रही है तो क्या भाजपा कोई आंदोलन, विरोध प्रदर्शन कर पाती। भाजपा यह भूल रही है कि वह सत्ता में हमेशा के लिए नहीं आई है।

इस लंगड़ाते लोकतंत्र में एक कील बाबरी मस्जिद पर आए अदालती फैसले ने भी ठोंक दी है। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में हुई जिस घटना को सैकड़ों पत्रकारों ने अपनी नंगी आंखों से देखा हो, उसमें अदालत को कोई साजिश नहीं दिखी। अदालत ने यह भी नहीं देखा कि उस समय आडवाणी की रथयात्रा में क्या-क्या भाषण दिए जा रहे थे, अदालत ने यह भी नहीं देखा कि 5 दिसंबर 1992 को अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ में कारसेवकों की बैठक में क्या कहा था और जिसके वीडियो क्लिप आज भी मौजूद हैं।

6 दिसंबर को मैं लखनऊ में एक बड़े अखबार में काम कर रहा था, हमारे संवाददाता वीएन दास हर दस मिनट बाद लाइव सूचना दे रहे थे कि वहां क्या हो रहा है। कौन सा गुंबद कितने बजे गिरा। सुबह से शाम तक गुंबद गिरते रहे और सामने एक मंच पर आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, नृत्य गोपालदास, अशोक सिंघल समेत तमाम लोग स्थिति का आकलन करते रहे। फोटो जर्नलिस्ट प्रवीण जैन, बीबीसी के संवाददाता मार्क टुल्ली सब झूठे पड़ गए और विशेष सीबीआई अदालत सच्ची साबित हो गई। इत्तेफाक से प्रवीण जैन समेत सारे पत्रकार जिंदा हैं। इन लोगों ने कई सारी रिपोर्ट लिखी हैं, कम से कम जज साहब को अपनी जानकारी के लिए ही उसे पढ़ लेना चाहिए।

देखा जाए तो हाथरस गैंगरेप कांड से भी गंभीर मसला बाबरी पर आया अदालती फैसला है, लेकिन बहुसंख्यक सनातनियों ने जिस हाथ की सफाई से सारा ताना-बाना बुना है, उसमें अब कोई राजनीतिक पार्टी बाबरी पर आए अदालती फैसले को मुद्दा नहीं बना पाएगी, लेकिन वह दिन जरूर आएगा जब तमाम जज और अदालतें अपने गिरेबान में झांककर इस फैसले को विवादास्पद बताकर खारिज कर देंगी। इस फैसले से भारतीय लोकतंत्र की नैतिक पराजय हुई है। वह लंगड़ा तो था ही, लेकिन इस फैसले ने भारतीय लोकतंत्र को अब लाचार भी बना दिया है।

वैसे भारत की तुलना में पाकिस्तान का लोकतंत्र लचर माना जाता है, लेकिन उस लचर देश में भी वहां का मीडिया और अदालतें अपने संवैधानिक ढांचे को बचाने का काम जब-तब करती रहती हैं। अभी शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जन्मदिन पर लाहौर हाई कोर्ट में उनका जन्मदिन बहुत शान-ओ-शौकत से मनाया गया, लेकिन भारत में कोई जिन्ना की फोटो लगाना भी पाप समझेगा, जिसकी तारीफ कभी आडवाणी ने करने की हिम्मत दिखाई थी।

पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट और वहां के तमाम हाई कोर्ट ने जिस तरह पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ और पूर्व पीएम नवाज शरीफ़ की मुश्कें कसीं, वो फैसले आज भी मील का पत्थर हैं। किसी सैन्य तानाशाह से टकराना हंसी खेल नहीं है, लेकिन वहां के सुप्रीम कोर्ट ने वह भी कर दिखाया।

सिर्फ महान कह देने भर से कोई देश या नेता महान नहीं हो जाता। आपका हर एक्शन लोकतंत्र की कसौटी पर कसा जाएगा। वह चाहे भारत हो या चीन हो। अब आप एक लंगड़ाते हुए लचर लोकतंत्र हैं। जहां सिर्फ बहुसंख्यक सनातनियों का बोलबाला है और बाकी सारी नैतिकता, संविधान, मर्यादा सब कुछ कूड़ेदान में डाला जा चुका है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

This post was last modified on October 2, 2020 2:14 pm

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