Friday, April 19, 2024

रेवड़ियां और उनकी राजनीतिक महत्ता

क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति में बहस का यह एक पुराना विषय रहा है कि जब किसी विश्व परिस्थिति में क्रांति का पुराना रूप संभव न दिखाई देता हो, जिसमें वर्गीय शोषण के सभी रूपों का अंत करके सर्वहारा की तानाशाही क़ायम की कल्पना की जाती है, तब राजनीति का लक्ष्य क्या हो सकता है? यह सवाल ख़ास तौर पर भारत के अलग-अलग राज्यों में वामपंथी सरकारों की भूमिका के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक विषय बन कर सामने आया था।

तभी, केरल में 1957 की पहली कम्युनिस्ट नेतृत्व की सरकार के समय से ही यह एक समझ बन चुकी थी कि पतनशील पूंजीवाद के काल में भारत की तरह के एक विकासशील संघीय पूंजीवादी देश में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में राज्यों में वाममोर्चा सरकारों की भूमिका जनता को राहत पहुंचाते हुए उसमें क्रमशः क्रांतिकारी चेतना के विकास की ही हो सकती है ।

अर्थात् तभी से भारत में जनता की जनवादी क्रांति के दौर में जनता को राहत देने वाले कदम कृषि क्रांति आदि की तरह के कथित रणनीतिक महत्व के कदमों के समान महत्व के कदमों के रूप में मान्यता पाने लगे थे। आम जनता को जीवन में राहत देना क्रांतिकारी सामाजिक रूपांतरण की राजनीति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ गए थे।

इस परकार, ‘राहत’ और ‘समाज के वर्गीय संतुलन में परिवर्तन’- इन दोनों से वामपंथी राजनीति के अस्तित्व का वह दोहरा (two fold) रूप सामने आया जो उस राजनीति के अपने मूल सत्य और उसके मौजूदा स्वरूप के बीच की अविच्छिन्न एकता को दर्शाता है और वही परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रूपों में अपने को प्रकट करता है।

कहना न होगा, प्रमाता (subject) के अस्तित्व के इस दोहरे रूप, हम जो हैं और हम जैसे हैं, की अविच्छिन्न एकता की यही शर्त जितनी वामपंथी राजनीति को परिभाषित करती है, उतनी ही किसी भी अन्य, उदारवादी या धुर दक्षिणपंथी राजनीति के सत्य को भी परिभाषित करने पर लागू होती है।

इस विषय में यह देखने लायक़ बात है कि इतिहास में कभी जिन समाज कल्याणकारी नीतियों से सिर्फ समाजवाद को परिभाषित किया जाता था, उनसे ही कालक्रम में समग्र रूप से एक पूंजीवादी समाज में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा विकसित हुई है। हमारे भारतीय संविधान में तो राज्य की पूरी परिकल्पना ही एक कल्याणकारी राज्य के रूप में की गई है।

भारत के संविधान की ही यह विशेषता रही है जिसके चलते भारत में वामपंथी राजनीति का अब तक का पूरा सिलसिला हमारे संविधान से टकराने के बजाय उसकी रक्षा का सिलसिला ज्यादा रहा है। संविधान में राज्य की कल्याणकारी भूमिका वामपंथी राजनीति के कार्यनीतिगत अर्थात् उसके तात्कालिक कार्यक्रमों के तमाम पहलुओं के लिए यथेष्ट अवसर पैदा करती रही है। इसीलिए भारत में जनतंत्र और संविधान की रक्षा के सवाल पर होने वाले संघर्षों में वामपंथ को हमेशा इस संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में पाया जाता रहा है।

इसी संदर्भ में यहां हमारे लिए विचार का मौजू विषय है जनता को राहत या रेवड़ियों का विषय।

प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दिनों राज्य सरकारों के द्वारा जनता को दी जाने वाली राहतों को रेवड़ियां कहा था, क्योंकि अपनी फ़ासिस्ट विचारधारा के नाते वे जनता को राहत दिये जाने का अधिकारी नहीं मानते हैं। किसी के भी जीवन की परिस्थितियों में राहत पहुंचाने का अर्थ होता है उसके जीवन को सहज अर्थात् स्वतंत्र बनाना। इसीलिए जनता को गुलाम बना कर रखने वाले एक चरम दमनकारी राज्य के समर्थकों को ऐसी राहतें कभी मान्य नहीं हो सकती हैं।

वे ‘राहत’ की अवधारणा से मूलतः नफ़रत करते हैं, इसीलिए उसे ‘रेवड़ी’ कहते हैं। फिर भी, उनकी राजनीति की भी यह मजबूरी है कि जब तक राज्य का जनतांत्रिक ढांचा बना हुआ है, सत्ता की लड़ाई में वे ऐसी ‘रेवड़ियों’ के प्रयोग से परहेज़ नहीं कर सकते हैं। यही वजह है कि उनकी हरचंद कोशिश संविधान के इसी मूलभूत जनतांत्रिक ढांचे को तोड़ने की रहती है।

बहरहाल, जहां तक जनता को ‘राहत’ का सवाल है, इसका कोई एक निश्चित आकार नहीं हो सकता है। हम अपने इधर के छोटे से काल के अनुभवों को ही देखें तो पायेंगे कि यूपीए के काल में इन राहतों की बात मनरेगा से लेकर खाद्य और रोज़गार के अधिकार और किसानों के क़र्ज़ की माफ़ी तक चली गई थी।

दिल्ली में ‘आप’ सरकार ने इसे बेहतर और मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़ा। विभिन्न राज्य सरकारों ने इसमें महिला सशक्तिकरण और लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने वाले कई नए प्रकल्प शामिल किए। वाम मोर्चा सरकारों ने भूमि सुधार और मुफ़्त बीज और खाद के वितरण से कृषि सुधार का जो कार्यक्रम अपनाया था उसे पंचायती राज्य की व्यवस्थाओं ने एक ठोस राजनीतिक ज़मीन दी।

मोदी सरकार ने इसमें उज्जवला और किसान सम्मान निधि की तरह की नगद राहत के साथ ही पांच किलो मुफ़्त अनाज की योजना शामिल की। और, अब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य को पूरी तरह से मुफ़्त करने के साथ ही समाज के अलग-अलग मेहनतकश तबकों के लिए अलग-अलग राहत योजनाओं को शामिल करके इसे क्रमशः सामाजिक न्याय के सवाल से जोड़ने और पिछड़े हुए तबकों की सत्ता में भागीदारी से जोड़ने की दिशा में बढ़ रही है।

इस प्रकार, समग्र रूप से देखें तो हम पायेंगे कि वामपंथ जहां अपनी समतापूर्ण समाज की राजनीति के हित में राहत की दैनंदिन राजनीति को अपना रही थी, वहीं उदार पूंजीवाद कल्याणकारी राजनीति के ज़रिए सामाजिक न्याय की दिशा में बढ़ रहा है। और एक फ़ासिस्ट राजनीति राहत पैकेज देने पर भी इनके प्रति तिरस्कार के भाव को बढ़ावा दे रही है।

एक जनतांत्रिक व्यवस्था में, जहां किसी न किसी रूप में जनता के प्रति जवाबदेही बनी रहती है, राजनीति की तात्कालिक ज़रूरतें कैसे राजनीति के उद्देश्यों के प्रकट रूपों के बीच के भेद को कम करती हैं और अनोखे ढंग से मनुष्य की मूलभूत ज़रूरतों के हित में चीजों को ढालती जाती हैं, भारत में राहतों की राजनीति की वर्तमान प्रतिद्वंद्विता इसी का एक प्रमाण है। इस समूचे उपक्रम में सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है संविधान के उस जनतांत्रिक ढांचे का बना रहना जो राहतों को लेकर इस प्रतिद्वंद्विता की अनिवार्यता पैदा करता है।

किसी भी प्रमाता (subject) के अस्तित्व का यही वह two fold, द्वयात्मक स्वरूप है, जो उसकी आंतरिक गतिशीलता का मूल कारक होता है। यही उसके अस्तित्व के नए-नए रूपों को सुनिश्चित करता है। इस बात को साफ़ तौर पर समझने की ज़रूरत है कि इसमें किसी बाहरी ईश्वरीय (विचारधारात्मक) परम तत्त्व की कोई भूमिका नहीं होती है। एक प्रमाता के रूप में भारतीय राजनीति के सभी रूपों की इस द्वयात्मक एकता की भी यही सच्चाई है।

मनोविश्लेषक जॉक लकान ने इसे ही प्रमाता के आब्जेक्ट-ओ के रूप में व्याख्यायित किया था, प्रमाता में अन्तर्निहित उसकी अभिलाषाओं का खुद से ही छिपा हुआ वह अंश जिसकी पूर्ति के लिए वह हमेशा क्रियाशील रहता है। इससे मुक्त प्रमाता मृतक समान होता है। यह राजनीति में सत्ता की अविच्छिन्न अभिलाषा का ही एक अंश है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं।) 

जनचौक से जुड़े

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Latest Updates

Latest

लोकतंत्र का संकट राज्य व्यवस्था और लोकतंत्र का मर्दवादी रुझान

आम चुनावों की शुरुआत हो चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट में मतगणना से सम्बंधित विधियों की सुनवाई जारी है, जबकि 'परिवारवाद' राजनीतिक चर्चाओं में छाया हुआ है। परिवार और समाज में महिलाओं की स्थिति, व्यवस्था और लोकतंत्र पर पितृसत्ता के प्रभाव, और देश में मदर्दवादी रुझानों की समीक्षा की गई है। लेखक का आह्वान है कि सभ्यता का सही मूल्यांकन करने के लिए संवेदनशीलता से समस्याओं को हल करना जरूरी है।

साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ जंग का एक मैदान है साहित्य

साम्राज्यवाद और विस्थापन पर भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में विनीत तिवारी ने साम्राज्यवाद के संकट और इसके पूंजीवाद में बदलाव के उदाहरण दिए। उन्होंने इसे वैश्विक स्तर पर शोषण का मुख्य हथियार बताया और इसके विरुद्ध विश्वभर के संघर्षों की चर्चा की। युवा और वरिष्ठ कवियों ने मेहमूद दरवेश की कविताओं का पाठ किया। वक्ता ने साम्राज्यवाद विरोधी एवं प्रगतिशील साहित्य की महत्ता पर जोर दिया।

Related Articles

लोकतंत्र का संकट राज्य व्यवस्था और लोकतंत्र का मर्दवादी रुझान

आम चुनावों की शुरुआत हो चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट में मतगणना से सम्बंधित विधियों की सुनवाई जारी है, जबकि 'परिवारवाद' राजनीतिक चर्चाओं में छाया हुआ है। परिवार और समाज में महिलाओं की स्थिति, व्यवस्था और लोकतंत्र पर पितृसत्ता के प्रभाव, और देश में मदर्दवादी रुझानों की समीक्षा की गई है। लेखक का आह्वान है कि सभ्यता का सही मूल्यांकन करने के लिए संवेदनशीलता से समस्याओं को हल करना जरूरी है।

साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ जंग का एक मैदान है साहित्य

साम्राज्यवाद और विस्थापन पर भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में विनीत तिवारी ने साम्राज्यवाद के संकट और इसके पूंजीवाद में बदलाव के उदाहरण दिए। उन्होंने इसे वैश्विक स्तर पर शोषण का मुख्य हथियार बताया और इसके विरुद्ध विश्वभर के संघर्षों की चर्चा की। युवा और वरिष्ठ कवियों ने मेहमूद दरवेश की कविताओं का पाठ किया। वक्ता ने साम्राज्यवाद विरोधी एवं प्रगतिशील साहित्य की महत्ता पर जोर दिया।