Monday, April 15, 2024

यूक्रेन युद्ध के दो सालः पश्चिम के पराभव का काल

यूक्रेन में रूस की विशेष सैनिक कार्रवाई के चलते दो साल पूरे हो गए हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन में विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू की थी। उसके एक रोज बाद इस स्तंभकार ने लिखा था- “आधुनिक काल का जब कभी इतिहास लिखा जाएगा, 24 फरवरी 2022 को उस दिन के रूप में दर्ज किया जाएगा, जब 1991 में अस्तित्व में आए कथित एक-ध्रुवीय विश्व के अंत की पुष्टि हो गई। अभी ये युद्ध अपनी परिणति तक नहीं पहुंचा है। ऐसे में युद्ध के कभी भी कोई नया मोड़ ले लेने की गुंजाइश बनी हुई है। इसलिए अभी ऐसी बड़ी घोषणा करना बेशक एक बड़ा जोखिम उठाना है। लेकिन कई ऐसे संकेत हैं, जिनके आधार पर यह जोखिम उठाया जा सकता है।”

दो साल बाद आज यह तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि वह अनुमान सटीक साबित हुआ। उस टिप्पणी में विशेष सैनिक कार्रवाई से पहले के घटनाक्रमों की चर्चा करते हुए यह दलील दी गई थी कि रूस को विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू करने के लिए मजबूर कर अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) ने अपने लिए एक बड़ा जोखिम मोल लिया है, जिसमें उसके सफल होने की संभावना न्यूनतम है। (पुतिन ने परदा गिरा दिया है | जनचौक (janchowk.com))

अब आज दो साल बाद क्या सूरत है? एक लंबी योजना के तहत नाटो ने यूक्रेन को अपना प्रॉक्सी बनाया। उसके जरिए रूस के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर शुरू किया गया। मकसद था रूस को घेरना और अंततः उसे हमेशा के लिए पंगु बना देना। लेकिन साफ है कि यह दांव उलटा पड़ा।

नाटो का प्रॉक्सी बनने की बहुत महंगी कीमत यूक्रेन को चुकानी पड़ी है। आज वह सैनिक और आर्थिक रूप से बर्बाद हो चुका है। (Ukraine – two years on, no end in sight – Michael Roberts Blog (wordpress.com)).

दूसरी तरफ इस युद्ध ने रूस को अपनी अर्थव्यवस्था को आत्म-निर्भर बनाने के लिए प्रेरित किया। यह जाहिर हुआ कि रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने 2014 में यूक्रेन में अमेरिका प्रायोजित बहुचर्चित माइदान तख्ता पलट के बाद से युद्ध का अनुमान लगा कर तैयारियां शुरू कर दी थीं। उसका नतीजा विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू होने के बाद दिखा।

फरवरी 2022 में इतिहास के सबसे सख्त प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि वे रूसी मुद्रा रुबल को rubble (मलबा) बना देंगे। लेकिन हुआ उसके विपरीत है। रूस ने अपने सोवियत युग के मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स में दोबारा जान फूंक दी है। उसने एक मजबूत युद्ध अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली है। नतीजतन, पिछले दो वर्षों में रूसी अर्थव्यवस्था स्थिर गति से आगे बढ़ी है। जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए रूसक्रय शक्ति समतुल्यता (PPP) के पैमाने पर दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। रूस की इस अंतर्शक्ति को पश्चिमी मीडिया को भी स्वीकार करना पड़ा है। (The surprising resilience of the Russian economy)

दूसरी तरफ रूस को पंगु बनाने की अमेरिकी योजना में शामिल होकर यूरोप ने अपने पावों पर कुल्हाड़ी मारी है। रूस यूरोप के लिए सस्ती ऊर्जा का स्रोत था। यूरोपीय उद्योग रूस से आने वाली प्राकृतिक गैस पर निर्भर थे। प्रतिबंध लगाकर यूरोपीय देशों ने खुद यह स्रोत बंद कर दिया। इसका असर उन देशों के नागरिकों को ऊंची महंगाई के रूप में चुकानी पड़ी। उधर जर्मनी जैसा देश, जो दो साल पहले तक दुनिया में एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति था, अपने उद्योगों की जड़ खोदने की तरफ जा बढ़ा। (Germany faces threat of creeping deindustrialisation, warns steel boss (ft.com)). 

युद्ध शुरू होते ही मशहूर अर्थशास्त्री माइकल हडसन ने कहा था कि प्रतिबंधों के जाल में फंसा कर अमेरिका ने तीसरी बार जर्मनी को परास्त कर दिया है- लेकिन इस बार उसने ऐसा बिना युद्ध लड़े किया है। (America Defeats Germany for the Third Time in a Century (michael-hudson.com))

पिछले दो वर्षों की घटनाओं ने हडसन की बात को सही साबित किया है। जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों ने रूस से ऊर्जा पाना बंद कर दिया और इसकी भरपाई के लिए चार से पांच गुना महंगी कीमत पर अमेरिका से लिक्वीफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) की खरीदारी शुरू की। इससे अमेरिकी तेल कंपनियों का मुनाफा बढ़ा है, जबकि यूरोप का आर्थिक संकट गहरा होता जा रहा है। आरोप है कि इस रुझान को स्थायी बनाने के प्रयासमें ही अमेरिका ने नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलान को समुद्र के अंदर विस्फोट से उड़ादिया। (Reporter Seymour Hersh on “How America Took Out the Nord Stream Pipeline”: Exclusive TV Interview | Democracy Now!)

बेशक इस युद्ध से अमेरिका आर्थिक रूप से कम प्रभावित हुआ है। बल्कि कई मामलों में उसे लाभ हुआ है। जर्मनी में अपना कारोबार बंद करने वाले कई उद्योग अपने कारखाने अमेरिका ले गए हैँ। अमेरिका में यूरोपीय निवेश में भारी बढ़ोतरी हुई है।

लेकिन अमेरिका का नुकसान सामरिक और भू-राजनीतिक है। युद्ध के मैदान यूक्रेन की पराजय को सीधे अमेरिका की कमजोर पड़ी ताकत और घटते प्रभाव के साथ जोड़ कर देखा गया है। यह बात दुनिया के सामने आई है कि गोला-बारूद उत्पादन की अमेरिकी क्षमता क्षीण हो चुकी है। (US military in decline, threats from China ‘formidable,’ report says (defensenews.com)) उच्च तकनीक वाले हथियारों की आपूर्ति उसने की है, लेकिन युद्ध में आज भी आम गोला-बारूद का महत्त्व बचा हुआ है। यूक्रेन की नाकामियों का एक प्रमुख कारण इस मामले में रूस से पिछड़ जाना बताया गया है।

हकीकत यह है कि यूक्रेन इस सदी में सैनिक उद्देश्य हासिल करने में अमेरिका की लंबी नाकामियों की शृंखला में शामिल हो गया है। अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया आदि इस शृंखला की पूर्व कड़ियां रही हैं। इससे अमेरिकी सैनिक शक्ति के रुतबे में गहरी सेंध लगी है। यह धारणा टूटी है कि अपनी सैनिक महाशक्ति की हैसियत से अमेरिका दुनिया को अपने ढंग से चलाने में सक्षम है। यह क्षति बहुत गहरी है और इसके परिणाम दूरगामी होंगे।

इस घटनाक्रम ने खुद अमेरिका के शासक वर्ग और रणनीतिक समुदाय (strategic community)में विभाजन पैदा कर दिया है। यूक्रेन को समर्थन देने की जो आम सहमति आज से दो साल पहले वहां दिखी थी, वह आज टूट चुकी है। इस हद तक कि जो बाइडेन प्रशासन अपना पूरा जोर लगाने के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से यूक्रेन के लिए और सैनिक एवं वित्तीय मदद का नया प्रस्ताव पारित नहीं करवा पा रहा है। यह प्रस्ताव कई महीनों से लंबित पड़ा है।रिपब्लिकन पार्टी का एक बड़ा खेमा यूक्रेन को दी गई मदद को संसाधनों की अब बर्बादी मानने लगा है।

नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में फिर से रिपब्लिकन उम्मीदवार बनने जा रहे डॉनल्ड ट्रंप ने एलान किया है कि राष्ट्रपति बनते ही 24 घंटों के अंदर वे यूक्रेन युद्ध को समाप्त कर देंगे। यहां तक कि एक भाषण में उन्होंने यूरोपीय देशों को चेतावनी दे दी कि वे अपनी रक्षा का खर्च खुद वहन करें और नाटो के लिए अपना आर्थिक योगदान बढ़ाएं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वे रूस को उन यूरोपीय देशों पर कब्जा कर लेने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, जो अपना आर्थिक योगदान नहीं करेंगे। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षणों में ट्रंप की स्पष्ट बढ़त को देखते हुए उनके इस बयान ने नाटो के अंदर भारी उथल-पुथल मचा रखी है।

अमेरिकी प्रभु वर्ग में पड़ी फूट का ही यह संकेत है कि धुर-दक्षिणपंथी माने जाने वाले अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन ने मास्को जाकर व्लादीमीर पुतिन का इंटरव्यू किया- उन पुतिन का जिन्हें अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया ने प्रतिबंधित कर रखा है और जिन्हें लांछित करने में उसने वर्षों से अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। कार्लसन ने इस इंटरव्यू में पुतिन को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया। इससे पुतिन की एक दूरदर्शी, गहरी अंतर्दृष्टि वाले, और संकल्पबद्ध नेता की छवि उभरी। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद इसके जरिए पहली बार पश्चिमी दर्शक/श्रोता वर्ग ने उनकी बातों को उस रूप में सुना, जो उनका मंतव्य होता है। ((1) Tucker Carlson on X: “Ep. 73 The Vladimir Putin Interview https://t.co/67YuZRkfLL” / X (twitter.com))

अमेरिका के नेतृत्व में रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों का उलटा असर सिर्फ यूरोप पर ही नहीं हुआ है। बल्कि इससे अमेरिकी प्रभुत्व की जड़ पर दीर्घकालिक प्रहार हो रहा है। यह आम समझ रही है कि दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व का कारण सिर्फ उसकी सैनिक शक्ति नहीं है। बल्कि उससे बड़ा कारण उसकी मुद्रा डॉलर का विश्व कारोबार की मुद्रा होना रहा है। वैसे तो डॉलर के प्रभाव से अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मुक्त कराने की ललक अनेक देशों में पहले से दिख रही थी, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद बनी परिस्थितियों ने इस प्रक्रिया को खासा तेज कर दिया। इतना तेज, जिससे यह प्रक्रिया एक परिघटना बन गई है। नतीजतन, खुद अमेरिकी वित्तीय संस्थानों को इस परिघटना पर विचार करना पड़ रहा है। इस सिलसिले में पिछले साल अमेरिकी बैंक जेपी मॉर्गन की एक रिपोर्ट खासी चर्चित हुई। (De-dollarization: The end of dollar dominance? | J.P. Morgan (jpmorgan.com)).

इस तरह कहा जा सकता है कि गुजरे दो साल अमेरिकी पराभव के स्पष्ट होने का काल हैं। मगर आज यह परिघटना संभवतः इतनेस्पष्ट रूप में हमारे सामने नहीं होती, अगर पिछले साल सात अक्टूबर को हमास ने इजराइल पर जोरदार हमला नहीं बोला होता। उस हमले के बाद से इजराइल फिलस्तीन के गजा में नरसंहार कर रहा है। उचित ही इसके इस कृत्य की तुलना दूसरे विश्व युद्ध से पहले जर्मनी में हिटलर के हॉलोकास्ट से की गई है। उसके युद्ध अपराधों को लेकर फिलहाल हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दक्षिण अफ्रीका की तरफ से दायर मुकदमे की सुनवाई चल रही है।

इस बीच अमेरिका गजा नरसंहार के लिए इजराइल को हथियार उपलब्ध करवाने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी इजराइल की ढाल बन कर खड़ा हुआ है। उसका इजराइली अपराध में शामिल होना इतना खुलेआम है कि ग्लोबल साउथ (विकासशील दुनिया) में अब गजा नरसंहार के लिए उसे भी प्रत्यक्ष रूप से दोषी ठहराया जा रहा है। इस घटनाक्रम ने दुनिया में अमेरिकी अख़लाक और सॉफ्ट पॉवर को पुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। इससे अमेरिकी पराभव की गति और तेज हुई है। गजा नरसंहार के सिलसिले में ही यमन के हूती समूह ने जिस तरह लाल सागर में परिवहन रोका है और यमन के खिलाफ अमेरिकी हमले जिस तरह अप्रभावी साबित हुए हैं, उससे महाशक्ति के रूप में अमेरिकी सैनिक हैसियत और भी अधिक संदिग्ध हुई है। 

यह अस्वाभाविक नहीं है कि बौद्धिक एवं रणनीतिक क्षेत्रों में यूक्रेन युद्ध, इजराइली नरसंहार और यहां तक कि ताइवान को लेकर अमेरिका के चीन से चल रहे टकराव को एक ही परिघटना के अलग-अलग अध्याय के रूप में देखा जाने लगा है। ((4) John Mearsheimer: Israel-Palestine, Russia-Ukraine, China, NATO, and WW3 | Lex Fridman Podcast #401 – YouTube).

अमेरिका के दक्षिणपंथी रणनीतिक दायरे में भी इन तीनों घटनाक्रमों को एक साथ जोड़ कर देखने के प्रयास हाल में शुरू हुए हैँ। खास बात यह है कि इस विमर्श में यह प्रश्न भी उठाया जाने लगा है कि इन सब हालात के लिए खुद अमेरिका कितना जवाबदेह है। इस लिहाज से अमेरिकी दक्षिणपंथी सामरिक वेबसाइट द नेशनल इंस्ट्रेस्ट में हाल में छपा एक विश्लेषण खासा चर्चित हुआ (What the Ukraine War, Taiwan, and Gaza Have in Common | The National Interest). इसमें इसी सवाल पर विचार किया गया कि यूक्रेन युद्ध, ताइवान विवाद, और गजा संकट में आखिर समान पहलू हैं और उनके लिए खुद अमेरिका किस हद तक जिम्मेदार है। लेख का निष्कर्ष यह है कि इन तीनों स्थलों पर युद्ध जैसे हालात बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी अमेरिका पर आती है।

जब इस तरह के सवाल किसी देश के शासक समूहों के बीच उठने लगें, तो उसका सीधा मतलब होता है कि लक्ष्य प्राप्ति में विफलता के कारण वहां निराशा और बेबसी का आलम है। अमेरिकी रणनीतिकारों का चिंतित होना लाजिमी है। वे यूक्रेन में सामरिक और गजा में नैतिक छवि के हुए नुकसान को चीन के साथ बढ़ती आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा में अमेरिका के लगातार पिछड़ने की हकीकत से जोड़कर देखते हैं। यह बात अब साफ हो चुकी है कि अमेरिका ने सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में चीन के खिलाफ जो चिप वार छेड़ा, उसमें वह नाकाम हो चुका है। यही बात आर्थिक रूप से चीन को घेरने के उसके अभियान के बारे में कही जा सकती है।

इस पृष्ठभूमि में यह आशंका वाजिब है कि जब रूस और हूती के खिलाफ अमेरिका अपने सैनिक उद्देश्य प्राप्त करने में विफल रहा है, तो वह चीन का मुकाबला कैसे करेगा, जिसने हाइपरसोनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस संचालित युद्ध उपकरणों और साइबर युद्ध क्षमता में महारत हासिल कर ली है?

इस स्तंभकार ने 25 फरवरी 2022 को- यानी यूक्रेन में लड़ाई शुरू होने के एक दिन बाद- लिखा था कि व्लादीमीर पुतिन ने तीन दशक से जारी एक-ध्रुवीय विश्व का पटाक्षेप कर दिया है। उस लेख में विशेष सैनिक कार्रवाई शुरू करने के पीछे व्लादीमीर पुतिन की संभावित गणनाओं का जिक्र किया गया था। यह कहा गया- “इन गणनाओं के साथ ही केजीबी के पूर्व अधिकारी पुतिन ने प्रहार किया है। इसकी भौतिक चोट का शिकार यूक्रेन बना है। लेकिन मनोवैज्ञानिक, रणनीतिक, और सामरिक चोट एक-ध्रुवीय विश्व के सूत्रधार तक पहुंची है। ये चोट ऐसी है, जिसकी पीड़ा उसे हो रही है, लेकिन उसका कारगर जवाब देने में वह खुद को लाचार पा रहा है। जब ऐसा हो, तब यह अनुमान लगाना निराधार नहीं होता कि जमीनी सूरत बदल चुकी है। ये बदलाव काफी समय से आ रहा था, लेकिन परिवर्तन परदे के पीछे था। पुतिन ने परदा हटा दिया है।”

स्पष्टतः पिछले दो साल की घटनाओं ने उस आकलन को सही साबित किया है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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