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क्या इस कोरोना काल में भी भारत दुनिया का सबसे खुशहाल देश है?

कोरोना संक्रमण से बचाव के उपाय के तौर पर लॉक डाउन से पहले 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान जब लोग ताली, थाली, शंख, घंटी और ढोलक बजाते हुए सड़कों पर निकल आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस पर गहरी नाराज़गी जताई थी। उनकी नाराज़गी स्वाभाविक ही थी, क्योंकि जनता कर्फ्यू का आह्वान करते हुए उन्होंने कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए सोशल डिंस्टेसिंग बनाए रखने पर जोर दिया था। उन्होंने घर की देहरी को लक्ष्मण रेखा बताते हुए उसे न लांघने की अपील लोगों से की थी।

जाहिर है कि लोगों ने खासकर प्रधानमंत्री के प्रशंसक वर्ग ने उनकी इस अपील की धज्जियां उड़ाई थीं। इसलिए लगा था कि अब आनन-फानन में लागू किए तीन सप्ताह के लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री लोगों से ऐसा कुछ भी करने को नहीं कहेंगे जिससे कि 22 मार्च जैसे दृश्य निर्मित हों और लॉकडाउन के मकसद के उलट लोगों को एक जगह इकट्ठा होने का मौका मिले। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

कोरोना के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई के दौरान प्रधानमंत्री 3 अप्रैल को एक बार फिर देश से मुखातिब हुए। कोरोना काल के दौरान देश को उनका यह तीसरा संबोधन था। चूंकि लॉकडाउन शुरु हुए एक सप्ताह से ज्यादा का समय हो गया था, इसलिए आम लोगों और खासकर गरीब तबके के सामने पेश आ रही तमाम तरह की दुश्वारियों और कोरोना से संक्रमित लोगों का इलाज कर रहे तमाम डॉक्टरों के लिए जरूरी मास्क, दस्ताने, एप्रिन, कोरोना जांच किट आदि के अभाव के मद्देनजर लगा कि प्रधानमंत्री कुछ ठोस उपायों की जानकारी लोगों को देंगे। लेकिन प्रधानमंत्री इन मुद्दों पर बात करने के बजाय इस संकट की घड़ी में लोगों से 5 अप्रैल की रात को 9 बजे नौ मिनट के लिए अपने घरों की लाइटें बंद कर दीये और मोमबत्ती जलाने का आह्वान किया। इस आह्वान के साथ ही उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग पर जोर देते हुए साफ कहा था कि इस दौरान लोग अपने घरों से बाहर निकल कर सड़कों पर इकट्ठा नहीं होंगे।

मगर प्रधानमंत्री के इस आह्वान का भी वैसा ही हश्र हुआ जैसा 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का हुआ था। लोगों ने प्रधानमंत्री की अपील पर अपने घरों की लाइटें बंद कर दीये और मोमबत्ती तो लगाए, लेकिन इस मौके पर देश के कई शहरों में प्रधानमंत्री की पार्टी के उत्साही कार्यकर्ताओं ने काफी देर तक जमकर आतिशबाजी भी की। यही नहीं, कई जगह सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने की प्रधानमंत्री की नसीहत को ठेंगा दिखाते हुए नाचते-कूदते जय श्रीराम, भारत माता की जय, वंदे मातरम, चाइना वायरस गो बैक और मोदी-मोदी के नारों के साथ मोमबत्ती और मशाल जुलूस भी निकाले गए।

चौतरफा अवसाद और उदासी के माहौल में अपने घरों में दीये और मोमबत्तियां जलाकर संकट की घड़ी में एकजुटता का प्रदर्शन और समाज में सकारात्मकता का प्रसार करने के प्रधानमंत्री के आह्वान में मौलिकता न होते हुए भी कोई बुराई नहीं थी। यूरोप के कुछ देशों ने भी इस दौर में अपने यहां ताली-थाली बजाने और दीये-मोमबत्ती जलाने जैसे कार्यक्रम किए हैं। लेकिन हमारे यहां तो 5 अप्रैल को रात के नौ बजते ही पूरे देश में दिवाली जैसा माहौल बन गया।

मानवीय संवेदना और एकजुटता प्रदर्शित करने के आयोजन को चारों दिशाओं से आ रहे आतिशबाजी के शोर ने बेहद अमानवीय और घृणास्पद बना दिया। इससे पहले 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान कोरोना योद्धाओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रदर्शन के लिए ताली और थाली बजाने के प्रधानमंत्री के आह्वान का भी ऐसा ही अश्लील हश्र हुआ था। उस आयोजन से भी यही जाहिर हुआ था कि प्रधानमंत्री की मंशा चाहे जितनी सात्विक रही हो, उसका पालन करने वाली उनके समर्थकों की जमात जाहिलों और अमानुषों से भरी हुई है, जो बड़े से बड़े शोक के मौके पर भी जश्न मनाने में किसी तरह का संकोच नहीं करती है।

फूहड़ता और अश्लीलता का जैसा प्रदर्शन प्रधानमंत्री के समर्थकों की जमात ने किया, वैसी ही निर्लज्जता और अश्लीलता का मुजाहिरा उन तमाम टीवी चैनलों ने भी किया, जो कोरोनो के संकट को भी सांप्रदायिक रंग देने के लिए जमीन-आसमान एक किए हुए हैं। जैसे ही रात को घड़ी ने 9 बजाये, वक्त का पहिया मानो थम गया। कोरोना के डरावने आंकड़े टीवी चैनलों के स्क्रीन से गायब हो गए। परपीड़ा का आनंद देने वाली पाकिस्तान की बदहाली की गाथा का नियमित पाठ भी स्थगित हो गया। भक्तिरस में डूबे तमाम चैनलों के मुग्ध एंकर मुदित भाव से चीख-चीख कर बताने लगे कि देखिए, प्रधानमंत्री के आह्वान पर पूरा देश किस तरह दीपावली मना रहा है।

यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जब पूरे देश में लॉक डाउन के चलते सिर्फ अनाज, सब्जी, फल और दवाई की दुकानें खुली हैं तो फिर आतिशबाजी के लिए पटाखों का जखीरा देश के हर गांव और शहर में कैसे पहुंच गया? दीपावली को बीते करीब छह महीने हो चुके हैं, लिहाजा यह भी नहीं माना जा सकता कि लोगों के घरों में बचे हुए पटाखे रखे होंगे। जाहिर है कि दीपावली का यह जश्न सत्ता और संगठन की सुविचारित योजना के तहत मना है।

भाजपा समर्थकों द्वारा दीये जलाने के इस आयोजन को भाजपा के 40वें स्थापना दिवस से जोड़ते हुए सोशल मीडिया पर जारी किए गए पोस्टरों से भी इस बात की तस्दीक होती है। 22 मार्च को जब लोग जनता कर्फ्यू तोड़कर सड़कों पर निकल आए तो प्रधानमंत्री ने नाराजगी जताई थी लेकिन इस बार वे पूरी तरह खामोश रहे। इससे जाहिर होता है कि 22 मार्च की उनकी नाराजगी भी महज दिखावटी थी। कहने की जरूरत नहीं कि मानवता पर आए इतने बड़े वैश्विक संकट की घड़ी में भी क्षुद्र राजनीतिक हित साधने के ऐसे उपक्रम की मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिल सकती।

गौरतलब है कि कोरोना वायरस के जानलेवा संक्रमण से दुनिया भर में अब तक 65 हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं और 12 लाख से ज्यादा लोग कोरोना की चपेट में आकर अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत में भी कोरोना वायरस का कहर तेजी से बढ़ते हुए अघोषित तौर पर संक्रमण के तीसरे चरण में पहुंच चुका है। अघोषित तौर पर इसलिए कि कई कारणों से सरकार इसके तीसरे चरण में प्रवेश को स्वीकार करने से बच रही है। आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक अब तक 100 से ज्यादा लोग इस बीमारी से मर चुके हैं और कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या चार हजार को पार कर चुकी है।

दुनिया भर में जनजीवन पूरी तरह ठप है। अमेरिका और यूरोप के समृद्ध और हर तरह से सक्षम माने जाने वाले देशों में भी दहशत और घबराहट का माहौल है। संक्रमण से बचने के लिए लोग घरों में दुबके हुए हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में जहां बड़ी संख्या में गरीब आबादी है, हालात और भी ज्यादा विकट हैं। बिना किसी तैयारी के अचानक लागू किए गए लॉक डाउन की वजह से देश के महानगरों और बड़े शहरों से लाखों प्रवासी मजदूर अपने-अपने गांवों की ओर पलायन कर गए हैं।

खेतों, कारखानों और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों असंगठित मजदूरों के सामने न सिर्फ रोजगार का बल्कि अपना, अपने परिवार का पेट भरने का भी संकट खड़ा हो गया है। पैदल चलकर अपने गांवों की ओर लौटते 50 से ज्यादा लोग भूख से मर चुके हैं। कई इलाकों से भूख से परेशान होकर लोगों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। दूसरी ओर साधन संपन्न तबका है जो लॉक डाउन को भी एक उत्सव की तरह लेते हुए घरों में बैठे-बैठे तरह-तरह की नौटंकियां कर रहा है।

इस प्रकार लॉक डाउन के चलते देश के भीतर ही साफ तौर पर देश का विभाजन हो गया है। एक देश खाए-अघाए यानी हर तरह से साधन संपन्न अमीर और मध्यम वर्ग का है और एक देश उन लोगों का है जो जिंदा रहने के लिए जरूरी और मूलभूत साधनों से वंचित होने के साथ ही तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना कर रहे हैं। पहले का दूसरे से कोई सरोकार नहीं है, यानी दोनों के बीच ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ है।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना काल में 3 अप्रैल को जब तीसरी बार देश के लोगों से मुखातिब हुए थे तब उन्होंने भूख और बेरोजगारी के संकट का सामना कर रहे गरीबों का भी जिक्र किया था और उनके साथ प्रतीकात्मक एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए ही दीये और मोमबत्ती जलाने का आह्वान किया था। लेकिन उनके आह्वान पर अमल में उन गरीबों के प्रति चिंता कहीं से भी देखने को नहीं मिली। कोरोना से संक्रमित लोगों का इलाज कर रहे उन डॉक्टरों और उनके सहयोगी अस्पताल कर्मियों के प्रति भी चिंता के कहीं दर्शन नहीं हुए, जो एक महीने से एन 95 मास्क, पीपीई मटीरियल से बने दस्ताने, एप्रिन, कोरोना जांच किट आदि की मांग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन में भी डॉक्टरों की इस मांग के प्रति चिंता का लोप था। ऐसे में सवाल है कि बेमौसम दीवाली का यह अश्लील जश्न मनाकर किसके प्रति एकजुटता प्रदर्शित की गई?

कहने की जरुरत नहीं कि भारत आज दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जहां खाया-अघाया तबका मानवता पर आए इस घोर संकट के दौर में भी उत्सव मना रहा है और देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरी बेशर्मी के साथ उसके इस जश्न को प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से जोड़कर उन्हें महामानव और विश्व नेता के रूप में पेश कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र का एक संस्थान ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क’ (एसडीएसएन) हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वे करके वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक यानी वर्ल्ड हैपीनेस इंडेक्स जारी करता है। कुछ निर्धारित मानकों के आधार पर तैयार किए जाने वाले इस सूचकांक में बताया जाता है कि कौन सा देश कितना खुशहाल है। इस साल जारी ‘वर्ल्ड हैपीनेस इंडेक्स 2020’ में भारत 156 देशों की सूची में 144वें पायदान पर है। अगर संयुक्त राष्ट्र का यह संस्थान खुशहाली के अपने निर्धारित मानकों से हटकर अलग-अलग देशों की मीडिया रिपोर्ट के आधार पर सर्वे करे कि दुनिया भर में कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के बाद कौन सा देश कितना सुखी है, तो निश्चित ही भारत का स्थान सबसे ऊपर होगा।

कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया के तमाम विकसित, विकासशील और पिछड़े देशों के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। संकट भारत के लिए भी साधारण नहीं है, बल्कि हालात तेजी से भयावह होते जा रहे हैं। संकट से निबटने में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का दर्दनाक खोखलापन, अब तक की इस सबसे बड़ी महामारी का मुकाबला करने के लिए जरूरी संसाधन और सरकार के सोच की सीमाएं पूरी तरह उजागर हो चुकी हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवालों से बचने के लिए अपनी चिर-परिचित लफ्फाजी और उत्सवप्रियता का सहारा लेते हुए इस आपदा काल को भी एक अखिल भारतीय महोत्सव में बदल दिया है। ऐसा महोत्सव जिसमें वे धार्मिक प्रतीकों और राष्ट्रवाद का तड़का लगाते हुए कभी ताली, थाली, घंटी और शंख बजाने का आह्वान करते हैं तो कभी दीया और मोमबत्ती जलाने का।

22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान ताली, थाली, घंटी, शंख और ढोल-नगाड़ों के साथ शुरू हुए ‘कोरोना महोत्सव’ की अपार ‘सफलता’ के बाद प्रधानमंत्री के आह्वान पर 5 अप्रैल की रात नौ बजे दीये और मोमबत्ती जलाने का देशव्यापी कार्यक्रम भी पूरी तरह ‘हिट’ रहा। देखना दिलचस्प होगा कि लॉक डाउन यानी ‘कोरोना महोत्सव’ के समापन पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना संकट से निबटने के नाम पर कौन सी नई उत्सवी पेशकश देश के सामने रखते हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 7, 2020 8:01 pm

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