गोएबेल्स बन गया है भारतीय मीडिया का ब्रांड एंबेसडर

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2014 के बाद देश में अनेक बदलाव देखने को मिले जिसमें से सबसे बड़ा और घातक बदलाव है संचार माध्यमों में झूठी खबरों और ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतिकरण की कोशिश। दरअसल मिथ्या या दुष्प्रचार की रणनीति नयी नहीं है, पर जब संचार के साधन सीमित थे, लोगों तक उसकी पहुंच कम थी, लोग भी अपने दायरे में ही सीमित रहते थे, तो ऐसे दुष्प्रचार, समाज को बहुत गहरे तक प्रभावित नहीं करते थे। पर आज हम जिस अबाध और  अनवरत जनसंचार के माध्यम के युग में हैं, उनमें ऐसे दुष्प्रचार फैलाना आसान है, पर यह भी बात सच है कि, उन दुष्प्रचारों की काट करना भी मुश्किल नहीं है। यह युद्ध के हमला और बचाव की तरह है। 

प्रधानमंत्री के जितने भी भाषण 2014 के बाद आये हैं उनका यदि अध्ययन किया जाए और उनकी सत्यता की परीक्षा की जाए तो अधिकांश भाषण झूठ के पुलिंदे साबित हुए हैं। मैं झूठे वादों की बात नहीं करता। वादा करना और उन्हें भुला देना, जानबूझ कर ऐसे वादे करना जिन्हें पूरा ही न किया जा सके, आदि आदि सभी राजनेताओं की एक सामान्य फितरत है। यह फितरत खास तौर पर जब चुनाव नजदीक होता है तो और उभर कर सामने आ जाती है। पर प्रधानमंत्री ने सरकार की उपलब्धियों, ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ घटनाओं के उल्लेख में इतना खुला मिथ्यावाचन किया है कि वह न केवल हास्यास्पद लगता है बल्कि वह यह भी सन्देह उपजाता है कि कहीं यह मिथ्यावाचन उनके मस्तिष्क में एक प्रकार के मनोरोग का प्रारंभ तो नहीं है। 

पर यह कोई मनोरोग नहीं है। बल्कि यह नाज़ी तानाशाह एडोल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबेल की नीति का अनुसरण है। 2014 के बाद भाजपा आईटी सेल ने एक सोची समझी साजिश के अंतर्गत योजनाबद्ध रूप से भारतीय इतिहास के स्वाधीनता संग्राम के कालखंड के बारे में, तरह तरह की  गलत और भ्रामक सूचनाएं व्हाट्सएप और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से फैलानी शुरू की जिससे लोगों में यह बात पैठनी शुरू हो गयी कि हमारे स्वाधीनता संग्राम में उन महान नेताओं का योगदान उतना नहीं था जितना उसे बार बार विभिन्न इतिहासकारों द्वारा बताया गया है। इसे इतिहास के गलत और भ्रामक लेखन के रूप में भी प्रचारित किया गया और महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू की स्वाधीनता संग्राम के दौरान उनकी भूमिकाओं पर विशेष रूप से हमला किया गया।

गांधी पर हमला करने के लिये सुभाष बाबू के नाम का दुरुपयोग किया गया और नेहरू पर हमला करने के लिये सरदार पटेल का इस्तेमाल किया गया। पर आईटी सेल के हमलावर, या तो यह तथ्य जानते हुए या इस तथ्य से अनजान थे कि गांधी सुभाष के आपसी मतभेदों के बावजूद दोनों में एक आत्मीयता थी, इस गोएबेलिज़्म में लगे थे और आज भी काफी एक्सपोज हो जाने के बाद भी, अपने काम पर लगे हैं। और ऐसी ही आत्मीयता नेहरू और पटेल में थी। यूरोपीय फासिज़्म के आदर्श को मानने वाले आरएसएस के लोग लोकतंत्र का यह मूल समझ ही नहीं पाते हैं कि मत वैभिन्यता लोकतंत्र की पहली शर्त है। यह पहली शर्त ही नहीं देश की बहुलतावादी संस्कृति की आत्मा भी है और इसे मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना कह कर मान्यता दी गयी है। पर इसका एक लाभ भी हुआ। जब यह दुष्प्रचार युद्ध शुरू हुआ तो लोगों ने इतिहास और तरह-तरह के संदर्भ ग्रंथों को ढूंढना शुरू कर दिया और जिन माध्यमों से यह दुष्प्रचार किया जा रहा था या है, उन्हीं माध्यमों से इस दुष्प्रचार की काट भी शुरू हो गयी। हिटलरकालीन गोएबेलिज़्म का दांव विपरीत पड़ा और यह मायावी छल लम्बे समय तक नहीं टिक सका। 

आज का भारत और संसार न तो हिटलर के समय का जर्मनी है और न तब का विश्व कि एक तानाशाही राज में सत्ता जो कह दे लोग उसे मान लें। आईटी सेल के दुष्प्रचार का यह अंदाज रहा कि उसने नेहरू की वंशावली को एक मुस्लिम वंश से जोड़ कर साबित करते हुए फैला दिया। मैं ऐसे बहुत से पढ़े लिखे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, जो इस झांसे में आ गए और वे भी जाने अनजाने इस झूठ को संक्रामक रोग की तरह फैलाने लगे। इस दुष्प्रचार का प्रभाव इसलिए भी बढ़ा कि, अधिकतर लोगों के पास इन सब तथ्यों की पड़ताल करने का न तो समय है और न ही रुचि, तो इसी का लाभ उठा कर लम्बे समय तक भाजपा आईटी सेल अपने दुष्प्रचार में सफल हो गया। पर जब इस दुष्प्रचार का जवाब दिया जाने लगा और इस दुष्प्रचार में भाजपा आईटी सेल मात खाने लगा तो सरकार को यह आभास हुआ कि सोशल मीडिया झूठ फैलाने के एक माध्यम के रूप में भी प्रयुक्त हो रहा है। जब तक झूठ का व्यापार भाजपा आईटी सेल द्वारा प्रायोजित था, और इससे आरएसएस भाजपा का हित सध रहा था, सरकार ने सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे झूठ के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा पर जैसे ही यह माया बिखरने लगी, और झूठ की परतें दर परते उघड़ने लगीं सरकार सक्रिय हो गयी। 

पर इससे एक फायदा भी हुआ। जब स्वाधीनता संग्राम की महान घटनाओं और नेताओं के बारे में तरह-तरह के तथ्य सामने लाये जाने लगे तब, लोगों ने इससे जुड़ी किताबें पढ़नी शुरू की, इंटरनेट पर इनसे सम्बंधित सामग्री की तलाश शुरू हुयी और एक प्रकार से इतिहास का यह पुनर्लेखन और पुनर्पाठ शुरू हुआ। इससे एक और रोचक तथ्य पर लोगों का ध्यान गया कि, आईटी सेल या आरएसएस के लोग देश की हर दुरवस्था के लिये या तो मुग़लों को जिम्मेदार मानते हैं या गांधी नेहरू और अन्य स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों को। आज तक आरएसएस के किसी व्यक्ति ने ब्रिटिश शासन या साम्राज्य द्वारा किये गए भारतीय किसान, समाज और मजदूरों के शोषण और अत्याचारों के बारे में नहीं लिखा है।

उनके निशाने पर गांधी रहे या नेहरू पर, ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने सुभाष बाबू और सरदार  पटेल आदि को बख्श दिया हो। 1945 में छपे एक आरएसएस  की पत्रिका में, एक कार्टून के माध्यम से, गांधी को रावण के रूप में दिखाया गया है और सावरकर तथा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राम और लक्ष्मण के रूप में हैं। गांधी के दस सिरों में सुभाष भी हैं और पटेल भी।  यह कार्टून आरएसएस की मानसिकता का जीवंत प्रमाण है। आज भी आरएसएस वही खड़ा है जहां यह आज़ादी के समय खड़ा था। उसी मरे हुए द्विराष्ट्रवाद के नाग को अपने गले में लटकाए बने रहने को अभिशप्त है। 

सबसे हैरान करने वाली बात यह भी है कि आरएसएस की आलोचना के केंद्र में कहीं एमए जिन्ना भी नहीं हैं। इसका कारण है सावरकर और जिन्ना दोनों ही राष्ट्रवाद की जिस थियरी को मानते थे, वह धर्म पर ही केंद्रित थी। जिन्ना तो अपना मिशन, पाकिस्तान के रूप में पा गए पर आरएसएस, सावरकर का सारा खेल गांधी ने अपनी अबाध लोकप्रियता और अपनी राजनीति से खत्म कर दिया और बहुलतावादी संस्कृति वाले भारत ने एक सर्वधर्म समभाव पर आधारित एक सेक्युलर राज्य का विकल्प चुना। आरएसएस की मूल समस्या ही यह थी कि भारत एक सेक्युलर गणतंत्र न बने बल्कि वह पाकिस्तान की तरह एक हिंदू राष्ट्र बने। पर धार्मिक कट्टरता के खिलाफ जम कर खड़े गांधी और स्वाधीनता संग्राम के अन्य नेताओं ने इसे होने नहीं दिया। हालांकि इसकी कीमत गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। आज भी आरएसएस गांधी हत्या नहीं, गांधी वध कहता है। हत्या और वध का अंतर इनकी घृणित और शर्मनाक सोच को उजागर करता है। 

अब आज जब आरएसएस भाजपा के पास स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान बताने के लिये कुछ भी नहीं है तो वह ऐसे ही गोएबेलिज़्म के रास्ते पर चल कर दुष्प्रचार की आड़ में अपना हित साधते हैं। देश की सारी समस्याओं की जड़ में नेहरू की नीतियों उसे दिखती हैं और यह प्रवृत्ति पागलपन के एक ऐसे दौर में पहुंच गयी है कि आजादी मिलने के अवसर पर दिया गया नेहरू का पहला भाषण भाजपा के एक मंत्री को महंगाई का जिम्मेदार नज़र आता है। 

यह रोचक और हास्यास्पद घटना मध्य प्रदेश की है। मध्य प्रदेश, सरकार के एक मंत्री विश्वास सारंग ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि, “15 अगस्त, 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने जो भाषण दिया था, उसी भाषण के कारण देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ी है।”

सारंग के इस बयान पर सोशल मीडिया पर लोग आपत्ति जता रहे हैं और कई पार्टी के लोगों ने भी इस पर अपनी टिप्पणी की है।

उन्होंने आगे कहा, “अगर कांग्रेस महंगाई और इस देश की अर्थव्यवस्था को लेकर प्रदर्शन करना ही चाहती है तो उन्हें 10 जनपद के बाहर करना चाहिए क्योंकि इस देश की आजादी के बाद अर्थव्यवथा को कुठाराघात करके महंगाई बढ़ाने का श्रेय किसी को जाता है तो वो नेहरू परिवार को जाता है।” 

फिर वे आगे बोले, “महंगाई एक दिन में नहीं बढ़ती है।  अर्थव्यवस्थाओं की नींव एक दिन में नहीं रखी जाती। 15 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से जवाहरलाल नेहरू जी ने जो भाषण दिया था, उसी भाषण के कारण इस देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ी है। मोदी जी ने तो पिछले सात साल में अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया है।” 

यह भी देखिएगा कि, इस अत्यंत हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण बयान का भी बचाव भाजपा आईटी सेल करेगा और गोएबेलिज़्म की अफीम में धुत कुछ पढ़े लिखे लोग भी या तो इस बयान का बचाव करेंगे या चुप लगा जाएंगे। 

जब दुष्प्रचार बढ़ने लगा तो बहुत सी फैक्ट चेकिंग वेबसाइट भी सामने आ गयी जो इन झूठों का पर्दाफाश करने लगीं। ऐसी वेबसाइट में प्रतीक सिन्हा की वेबसाइट आल्ट न्यूज़ प्रमुख है जो इन झूठों को बेनकाब करती है और सच को सामने लाती है। इसी क्रम में आल्ट न्यूज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल ही वाराणसी में दिये गए एक भाषण में किये गए दावों की पड़ताल की और तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर उक्त फर्जी दावों को झूठा साबित किया।

आईटी सेल तो एक प्रचार माध्यम है और दुष्प्रचार, प्रचार का ही एक विकृत रूप है। उसके द्वारा फैलाया गया झूठ उतना चिंतित नहीं करता है जितना प्रधानमंत्री के द्वारा कहे गए भाषणों में झूठे दावे चिंतित करते हैं। पीएम के भाषण दुनिया भर में पढ़े सुने जाते हैं और उनकी समीक्षा होती है। ऐसे झूठे भाषणों से न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि खराब होती है, बल्कि देश के बारे में दुनिया भर में एक विपरीत राय बनती है। 

आल्ट न्यूज की इस रोचक पड़ताल को पढ़िये जो मैं ऑल्ट न्यूज वेबसाइट पर अर्चित मेहता के लेख से लेकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव साल 2022 में फ़रवरी से मार्च के बीच होने वाले हैं। चुनावों के दौरान सरकारों द्वारा अपने कार्यकाल की सराहना करना एक सामान्य बात है। इसी क्रम में 15 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी की यात्रा की और यूपी में कुछ प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन करते हुए योगी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया। अपने 30 मिनट के लंबे भाषण में प्रधानमंत्री ने कई दावे किये जिसमें से कुछ दावे भ्रामक और ग़लत थे। ऐसा भी कई बार हुआ जब नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के दौरान, भाजपा के बारे में अपनी राय को तथ्यों के रूप में पेश किया। 

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का विश्लेषण अर्चित मेहता ने इस प्रकार किया है। 

● दावा 1 : यूपी सरकार ने देश में सबसे ज़्यादा कोरोना टेस्ट्स और वैक्सीनेशन किया।

अपने भाषण में प्रधानमंत्री कहते हैं, “आज यूपी कोरोना की सबसे ज़्यादा टेस्टिंग करने वाला राज्य है। आज यूपी पूरे देश में सबसे ज़्यादा वैक्सीनेशन करने वाला राज्य है।”  

● तथ्य 

COVID19India.org के मुताबिक, यूपी ने सबसे ज़्यादा टेस्ट्स किये हैं। लेकिन यूपी देश का सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला राज्य भी है। 

MoHFW के नवीनतम डेटा के मुताबिक, यूपी में कोरोना वैक्सीन की पहली और दूसरी डोज़ दिए जाने की संख्या बाकी राज्यों से ज़्यादा है। लेकिन जब इस डेटा को प्रति लाख लोगों के हिसाब से देखा जाए तो एक अलग ही तस्वीर नज़र आती है। 

ऑल्ट न्यूज़ ने आधार कार्ड धारकों की संख्या के आधार पर सभी राज्यों में प्रति लाख जनसंख्या पर दोनों डोज़ लेने वाले लोगों की संख्या का विश्लेषण किया। 

इस डेटा के आधार पर यूपी में प्रति लाख लोगों के हिसाब से 3,516.89 लोग टीके की दोनों डोज़ ले चुके हैं। ये दूसरा सबसे कम आंकड़ा है जो 7,575.84 की राष्ट्रीय दर से बहुत कम है। 

प्रधानमंत्री के इस दावे को जहां आंकड़ों से काउन्टर किया जा सकता है, वहीं उन्होंने ऐसे भी कुछ दावे किये जो ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर दिखे। जब प्रधानमंत्री ने कोरोना को फैलने से रोकने के लिए योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ करते हुए उनके प्रयासों को “अभूतपूर्व” कहा, तब वो कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गंगा में बहती हुई लाशों और श्मशान घाटों पर अनवरत जलती हज़ारों चिताओं का ज़िक्र करना भूल गये। 

● दावा 2 : योगी शासन में यूपी में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 4 गुना बढ़ी है

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “4 साल पहले तक यहां यूपी में दर्जन भर मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे उनकी संख्या अब करीब-करीब चार गुना हो चुकी है।”

● तथ्य

योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। MoHFW डेटा के मुताबिक, 2016 तक यूपी में 38 कॉलेज थे। 

2021 में ये संख्या 57 हो गई। लेकिन ये आंकड़ा पिछले आंकड़े से 4 गुना ज़्यादा नहीं है। 4 गुना बढ़ने का मतलब है कि यूपी में फ़िलहाल 152 मेडिकल कॉलेज होने चाहिए थे जो सच नहीं है। 

● दावा 3 : जल जीवन मिशन परियोजना तेज़ी से आगे बढ़ रही है।

अपने भाषण के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि यूपी सरकार तेज़ी से लोगों के घरों तक साफ़ पानी पहुंचाने का काम कर रही है। वो भाजपा सरकार के 2019 के जल जीवन मिशन की बात कर रहे थे। 2024 तक ग्रामीण इलाकों के हर घर तक पानी का नल पहुंचाना इस योजना का लक्ष्य बताया गया था।

● तथ्य 

JJM मिशन की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के आधार पर, पिछले 2 सालों में यूपी के ग्रामीण घरों में पानी का कनेक्शन पहुंचने के कुल आंकड़ों में 1.96% से 11.99% की बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन इस समय सीमा में बिहार में नल कनेक्शन पहुंचने के आंकड़ों में 1.84% से 85.74% की बढ़ोत्तरी हुई है। आंकड़ों की मानें तो बिहार में 1,44,15,050 कनेक्शन लगे हैं जो सबसे ज़्यादा हैं। जबकि यूपी में 26,32,761 कनेक्शन पहुंचे हैं जो कि देश में चौथे नंबर पर आता है। 

● दावा 4 : योगी आदित्यनाथ के शासन के दौरान महिलाओं के लिए सबसे ज़्यादा सुरक्षित प्रदेश यूपी है। 

● तथ्य 

प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी के “कानून और प्रशासन” की भी सराहना की। उनका कहना था कि यूपी में माता-पिता अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर डरे हुए थे। लेकिन अब ये बदल गया है। उन्होंने कहा कि जो लोग हमारी बेटियों और बहनों को परेशान करते थे अब उन्हें पता है कि वो कानून से नहीं बच सकते। प्रधानमंत्री मोदी ने ये बात हाथरस में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के कुछ महीनों बाद कही। इस घटना के कारण यूपी सरकार को काफ़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी।  सरकार पर महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अत्याचार के मामलों में ज़्यादातर दलित महिलाओं के मामलों में ढंग से कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगे थे। 

2017 के उन्नाव रेप केस के वक़्त भी यूपी सरकार पर शारीरिक शोषण के मामलों में कार्रवाई को लेकर आरोप लगे थे। इस केस में 2 साल के बाद भाजपा नेता और विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को नाबालिग लड़की से बलात्कार के मामले में सज़ा मिली थी। ये भी तब जब लड़की ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के घर के बाहर आत्मदाह करने की कोशिश की थी। इस पूरे मामले में पीड़ित लड़की के पिता की कस्टडी में ही मौत हो गई थी। 

नेशनल क्राइम ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम डेटा (2019) के मुताबिक, यूपी पूरे देश भर में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराधों में सबसे ऊपर (14.7%) है। पिछले रिपोर्ट का डेटा भी यही बताता था। 

रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में महिलाओं के खिलाफ़ अपराध में सज़ा का दर 55.2 है जो लिस्ट में चौथे नंबर पर है। इस लिस्ट में सबसे ऊपर मिज़ोरम है जिसका आंकड़ा 88.3 है। मणिपुर दूसरे स्थान पर (58) और तीसरे स्थान पर मेघालय (57.3) है। 

यूपी में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराधों की कुल संख्या 199,553 है। ये आंकड़ा पूरे देश में तीसरा सबसे ज़्यादा है। इस लिस्ट में सबसे पहले पश्चिम बंगाल (263,854) और दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र (220,435) है। 

ऑल्ट न्यूज़ को लेटेस्ट NCRB का डेटा भी मिला जिसमें यूपी की स्थिति गंभीर दिखती है, 

1. यूपी में हिरासत में महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार का आंकड़ा सबसे ज़्यादा 22 है। इसमें 10 मामलों के अपराधी सरकारी नौकर होते हैं। और 12 मामले प्रशासन/जेल का स्टाफ़/रिमान्ड होम/कस्टडी की जगह से सामने आते हैं। 

2. यूपी दहेज के कारण होने वाली हत्याओं के मामले में भी चरम पर है जो प्रति लाख के हिसाब से 2.2 है। ये आंकड़ा पूरे देश के औसत आंकड़े से भी 2 गुना ज़्यादा है। 

3. यूपी में गर्भपात और एसिड अटैक का आंकड़ा भी पूरे देश में सबसे ज़्यादा है। 

4. 20 लाख से ज़्यादा की आबादी वाले शहरों में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अत्याचार (ROTC) के मामलों में यूपी और महाराष्ट्र आगे हैं। लेकिन यूपी के 3 शहरों में ROTC की संख्या महाराष्ट्र के मुकाबले कहीं ज़्यादा है। साथ में, लखनऊ में दूसरे नंबर पर सबसे ज़्यादा ROTC के मामले पाये जाते हैं। सबसे ज़्यादा ROTC के मामले राजस्थान के जयपुर में हैं। 

5. बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के केस दर्ज होने के मामले में यूपी देश में दूसरे नंबर पर है। इस लिस्ट में पहले स्थान पर राजस्थान है। 

कुल मिलाकर, यूपी सरकार की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दावे किये। इसमें यूपी सरकार की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर और यूपी सरकार के प्रति अपनी राय को प्रधानमंत्री मोदी ने तथ्य बताते हुए पेश किया। उन्होंने कोरोना से हुई मौत के आंकड़े और यूपी में ऑक्सीजन की कमी को नज़रंदाज़ कर दिया। सही आंकड़े दिए बिना उन्होंने योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा की। यूपी में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अत्याचार के मामले काफ़ी ज़्यादा हैं। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी में महिलाओं के सुरक्षित होने की बात कही।

सबसे अधिक निराश परम्परगत मीडिया के न्यूज चैनलों और अखबारों ने किया है। अधिकांश न्यूज चैनल सरकार के प्रोपेगैंडा के माध्यम बन गए हैं। चाहे खबरे हों या डिबेट सबका एक ही उद्देश्य है सरकार की बेहतर छवि दिखाना। यह तो सोशल मीडिया का इतना अधिक प्रसार है कि जैसे ही सरकार के हित में कोई प्रोपेगैंडा उभरता है वैसे ही सोशल मीडिया और अन्य स्वतंत्र पत्रकारों के वीडियो ब्लॉग्स में उसकी पोल खुल जाती है। भाजपा आईटी सेल के दुष्प्रचार और प्रधानमंत्री सहित अन्य भाजपा नेताओं की लफ्फाजी और लन्तरानियों से सरकार और प्रधानमंत्री की छवि एक झूठे और जुमलेबाजी करने वाले नेता की बनती जा रही है। ऐसे समय में मीडिया को यह मिथ्यावाचन एक्सपोज करना चाहिए तो वह इस गोएबेलिज़्म की प्रयोगशाला बन गया है। मीडिया की यह भूमिका दुःखद भी है और निंदनीय भी। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर रहते हैं।)

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