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Categories: बीच बहस

कवि अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं में नहीं दिखते स्त्री, दलित, वंचित और श्रमिक

‘हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय’ ये पंक्तियां भाजपा के सबसे उदार समझे जाने वाले चेहरे अटल बिहारी वाजपेयी की हैं। महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में नाम आने और गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे से संघ के संबंध के खुलासे के बाद से यह संगठन भारतीय जनमानस में खलनायक बन गया था।

ऐसे में आरएसएस अपनी कट्टर सांप्रदायिक छवि के साथ भारतीय समाज और भारतीय राजनीति में आगे नहीं बढ़ सकती थी। संघ को आजाद भारत की सक्रिय राजनीति में एक ऐसे मुखौटे की तलाश थी जो अपनी उदार कट्टरता के साथ न सिर्फ जनसंघ (बाद में भाजपा) और संघ को लोकतांत्रिकता का जामा पहनाए। अटल इसमें फिट थे।

‘हिंदू तन-मन’ से छद्म सेकुलरिज्म तक अटल बिहारी वाजपेयी का विकास दरअसल संघ के केचुली बदलकर समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का काल है। सीधे-सपाट शब्दों में कहें तो अटल बिहारी वाजपेयी ही वो शख्स हैं, जिसने अपनी उदार कट्टरता के बूते आरएसएस और भाजपा को छद्म लोकतांत्रिकता का जामा पहनाकर समाज में सांप्रदायिक विषाक्तता को प्रसाद बताकर बांटा।

16 अगस्त को उनके देहांत के बाद उनकी कथित कविताओं की पंक्तियों को रातों-दिन हिंदी के अख़बारों और समाचार चैनलों ने इतनी बार और इतने तरीके से पाठ किया कि वो मरने के बाद रातों-रात महाकवि बन गए। तो उनकी कविता के बहाने उनके चाल चरित्र चेहरे का विश्लेषण करना ज़रूरी हो जाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी दरअसल दक्षिणपंथ के बौद्धिक संवाहक बनकर संघ के हिंदुत्ववादी एजेंडे को समाज में ले जाने में कामयाब रहे। वो अपनी कविताओं में संघ की ऐतिहासिक चेतनाविहीन, तर्कहीन, तथ्यहीन कपोल-कल्पित बातों और बर्बरताओं का गौरवमयी आख्यान रचते रहे, जिसे पढ़कर संघ की नई पीढ़ी तैयार हुई जो न सिर्फ विचार और विवेकहीन थी, बल्कि मूढ़ और हद दर्जे तक असहिष्णु और मरने-मारने पर आमादा थी।

अटल बिहारी वाजपेयी ने रोल मॉडल बनकर संघ के ब्राह्मणवादी नस्लवाद को न सिर्फ ग्लैमराइज किया बल्कि नई पीढ़ी के सामने संधान लक्ष्य की भांति प्रस्तुत किया, जिसमें नस्लीय श्रेष्ठता का दंभ तो था ही साथ ही साथ देश को फिर से महान का मानक और ज़रूरी शर्त भी था।

उनकी कविता ‘मैं अखिल विश्व का गुरु महान’ की पंक्तियां उनके ब्राह्मणवादी एजेंडे का बयान करती हैं,
मैं अखिल विश्व का गुरु महान
देता विद्या का अमर दान
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर

आरएसएस को अपने प्रगतिगामी मंसूबों को देश पर थोपने के लिए एक चेतनाविहीन समाज की ज़रूरत रही है। इसके लिए संघ अपनी शाखाओं के जरिए लगातार समाज के एक बड़े हिस्से को विचारविहीन चेतनाविहीन बनाने में दशकों से लगा हुआ है। वो युवा शक्ति की ऊर्जा का प्रयोग विध्वंस में करना चाहता है। बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों से लोकर आज के बेहद सांप्रदायिक और असहिष्णु समय में अगर हम देखें तो पाएंगे कि गले में भगवा गमछा डाले युवा शक्ति अपनी अपार ऊर्जा को लगातार देश और समाज के विध्वंस में इस्तेमाल कर रही है।

संघ हमेशा से ऐसे युवाओं को तैयार करने में लगा रहा है, जिनमें जोश तो हो पर होश न हो। ये काम मदिरा करती है। अटल बिहारी की मदिरा हरिवंश राय बच्चन की मदिरा से अलग है। बच्चन कहते हैं, “पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से।”

अटल बिहारी वाजपेयी की, ‘कवि आज सुना वह गान रे’ कविता का रूपक देखिए, जिसमें उन्होंने जोश को मदिरा बताया है। अटल बिहारी वाजपेयी कहते हैं, “हम दीवाने आज जोश की, मदिरा पी उन्मत्त हुए।” जोश की मदिरा पीकर उन्मत्त हुए लोगों की टोली थी वो जिसने बाबरी मस्जिद तोड़कर भारत देश को सांप्रदायिक आतंकवाद की अग्नि में आहूत कर दिया। बच्चन की ‘मदिरा’ जीवन की चेतना की बात करती है और अटल बिहारी की ‘मदिरा’ चेतनाविहीन होकर सांप्रदायिकता की हद तक उन्मत्त हो जाने की बात करती है।

अटल बिहारी का व्यक्तित्व और चरित्र बेहद जटिल था। ये जटिलता ही उनका अपना अर्जन थी जो उन्हें संघ से अलग करती हुई भी संघी बनाए हुए थी। उनकी कविता ‘वैभव के अमिट चरण चिन्ह’ की इन पंक्तियों में आए रूपक और बिंब जबर्दस्ती थोपे हुए ब्रह्मचर्य से यौन कुंठित पुरुष के मनोद्गार से लगते हैं,
सरिता की मंझधार में
अपराजित पौरुष की संपूर्ण
उमंगों के साथ
जीवन की उत्ताल तरंगों से
हंस-हंस कर क्रीड़ा करने वाले
नैराश्य के भीषण भंवर को
कौतुक के साथ आलिंगन
आनंद देता है

अपने बर्बर, रक्तपात और हिसंक इतिहास को गौरवशाली बताने वाला कोई भी व्यक्ति कभी भी अपने देश और समाज को सही रास्ता नहीं दिखा सकता। संघ की राष्ट्रवाद की परिकल्पना इसी इतिहासबोध हीनता से उपजी है। जो अपनी हर बर्बरता, लूटपात, बलात्कार और व्यापक जनसंहार को अधर्म पर धर्म की विजय बताकर जस्टिफाई करती है।

हमारी विश्वविदित विजयों का इतिहास
अधर्म पर धर्म की जयगाथाओं से बना है
हमारे राष्ट्र जीवन की कहानी
विशुद्ध राष्ट्रीयता की कहानी है

अटल बिहारी की राष्ट्रीयता में स्त्री कहीं नहीं है। उनकी राष्ट्र-कल्पना में ‘भारत माता’ भी ‘राष्ट्रपुरुष’ में तब्दील हो जाती हैं। वो खुला एलान करते हैं कि यहां जो कुछ भी है सब हिंदू है। और हिंदुत्व को बनाए रखने के लिए वो हिंदुत्ववादी जेहाद का आह्वान करते हुए कहते हैं कि इस देश का हर कंकर हर बिंदु हिंदुत्व से लबरेज है। हम जिएंगे तो इसके लिए हम मरेंगे तो इसके लिए। ‘भारत जमीन का टुकड़ा नहीं’ कविता देखिए,
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है
यह चंदन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है
इसका कंकर-कंकर शंकर है
इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है
हम जिएंगे तो इसके लिए
हम मरेंगे तो इसके लिए

इसके अतिरिक्त दलित, वंचित और श्रमिक वर्ग भी उनकी रचनाओं में कहीं जगह नहीं पाता। उनके दो कविता संग्रहों में केवल एक कविता ‘आओ फिर से दिया जलाएं’ में वो एक जगह नवदधीचियों से अपनी हड्डियां गलाने का आह्वान करते हैं। उनके पास दलितों वंचितों के उत्थान के लिए कोई विचार नहीं अलबत्ता वो उन्हें उलाहने देते हैं अपने जीवन ध्येय को अपने परिवार की परिवरिश और रोटी कपड़े के संघर्ष तक सिमटे रहने के लिए। याद कीजिए बाबरी विध्वंस करने वाले अधिकांश कारसेवक पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले दधीचि थे, जिनकी हड्डियों को विध्वंस का वज्र बनाने के लिए संघ-भाजपा द्वारा इस्तेमाल किया गया है।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने
नवदधीचि हड्डियां गलाएं
आओ फिर से दिया जलाएं

पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान को लेकर अटल बिहारी की नीतियां आरएसएस से अलग नहीं थीं। अटल बिहारी वाजपेयी संघ की उस सोच को ही वहन कर रहे थे जो पाकितस्तान को फतह करके फिर से भारत में मिलाने के सपने देखती आई है। कारगिल युद्ध इसी का परिणाम था। उनके मंसूबों का खुलासा उनकी ये कविता करती है जिसका उन्वान है. ‘पंद्रह अगस्त की पुकार’।
दिन दूर नहीं खंडित भारत को
पुन: अखंड बनाएंगे
गिलगित से गारो पर्वत तक
आज़ादी पर्व मनाएंगे
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से
कमर कसें बलिदान करें
जो पाया उसमें खो न जाएं
जो खोया उसका ध्यान करें

अटल बिहारी वाजपेयी की कथनी और करनी में भी घोर विरोधाभास है। उनकी ‘हिरोशिमा की पीड़ा’ कविता को पढ़कर क्या कोई सोच सकता है कि इस कविता को लिखने वाले ने 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण किया होगा।

किसी रात को
मेरी नींद अचानक उचट जाती है
आंख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूं कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!
यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा

प्रेम उनकी कविता में कहीं भी नहीं दिखता, न ही मनुष्यता। वो चाहकर भी अपनी कविताओं में मनुष्य नहीं हो पाए।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव का आलेख।)

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This post was last modified on August 17, 2020 2:10 am

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