महिलाओं की गैरबराबरी पर क्या कहती हैं अर्थशास्त्र की नोबेल पुरस्कार विजेता क्लाडिया गोल्डिन

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इस बार जब क्लाडिया गोल्डिन को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई, तब शायद ही किसी को उम्मीद रही हो कि उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा जाएगा। वह 77 साल की हो चुकी हैं। उनका काम मुख्यतः अर्थशास्त्र के इतिहास पर है और तुलनात्मक अध्ययन करते हुए श्रम भागीदारी, खासकर महिलाओं की श्रम भागीदारी को काफी गहरे खंगालने में लगी रही हैं।

लगभग 200 साल के आधुनिक इतिहास के दौर पर काम करते हुए, वह एक डिकेटिव की तरह उन कारकों की तलाश में रहीं, जिसकी वजह से आधुनिक श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी ही नहीं, वेतन भुगतान में भी उन्हें असमानता का सामना करना पड़ रहा था। कोविड-19 के दौर में यह स्थिति और भी बदतर हुई थी। इस समय के काफी पहले तक वह अपने थिसिस पर काम कर चुकी थीं, और वह इस संदर्भ में लगातार बोल रही थीं। और, नये सिरे से एक बार फिर श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी पर कुछ नये तथ्य जोड़ रही थीं।

वह बाजार के ‘मालिकों’ के लालच के बारे में जानती थीं और वह यह भी जान रही थीं कि वे क्यों महिला को पुरूष की बराबरी वाला वेतन भुगतान क्यों नहीं करते हैं। वह इसके ऐतिहासिक संदर्भ को पुख्ता कर रही थीं। अक्टूबर, 2021 में उनकी पुस्तक ‘कैरियर एण्ड फैमिलीः वुमेन सेंचुरी-लांग जर्नी टूवर्ड इक्विटी’ छपकर आई। इस पुस्तक में उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया था कि सामंतवादी और कृषि आधारित समाज में कुल श्रम भागीदारी में महिलाओं की हिस्सेदारी इतनी कम नहीं थी, जो हमें आधुनिक औद्योगिक समाज में दिखती है।

वह आधुनिक दौर और पिछले दौर के बीच महिला श्रम भागीदारी का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए इसे अंग्रेजी के यू अक्षर के रूप में बताती हैं। इस यू का प्राथमिक भाग कृषि आधारित समाज है। नीचे का फ्लैट हिस्सा पूंजीवाद की प्राथमिक और साम्राज्यवादी दौर की अर्थव्यवस्था है। इसका ऊपर उठता हिस्सा सेवा क्षेत्र के विस्तार का दौर है। वह इस ऐतिहासिक विकास में श्रम भागीदारी के घटने और ऊपर उठने के कारकों में सस्ते श्रम की मांग, परिवार की स्थितियों में बदलाव और महिलाओं की गर्भधारण पर नियंत्रण करने की क्षमता को बड़ा कारण मानती हैं।

क्लाडिया गोल्डिन को नोबेल पुरस्कार ‘महिलाओं के श्रम बाजार के परिणामों के बारे में हमारी समझ को बेहतर बनाने के लिए’ दिया गया। यह नोबेल पुरस्कार की घोषणा के समय कहा गया। इस तरह से यह पुरस्कार उन्हें 2021 या 2022 में ही दे देना चाहिए था। लेकिन, कोविड-19 के समय में बैंकों को संभालना एक बड़ा काम था, और यह पुरस्कार भी इस संदर्भ में काम करने वाले अर्थशास्त्रियों को दिया गया था।

पॉल क्रुगमान ने न्यूयार्क टाइम्स में 12 अक्टूबर, 2023 को लिखाः “गोल्डिन को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा के बाद कई सारी टिप्पणियों को देख रहा हूं जो महिलाओं की उन्नति की दिशा में आने वाली बाधाओं को खत्म करने का परिप्रेक्ष्य दे रहे हैं। लेकिन, आज का वर्तमान राजनीतिक परिवेश में मुझे लगता है पिछड़ेपन वाली बातों से डरना चाहिए। रूढ़िवादी रो वी वेडे के निर्णय को कई सारे रेड राज्यों में पलट देने में सफल हो चुके हैं। ये गर्भपात को तुरंत प्रतिबंधित करने की मांग कर रहे हैं।”

पॉल क्रुगमान ने आगे लिखा: “एक बड़ा हिस्सा जन्म को नियंत्रित करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने पर नजर गड़ाए हुए है। हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि ऐसा नहीं हो सकता है। इन बातों को यदि हम एक ओर भी रख दें तब भी अर्थशास्त्र की दुनिया में यह आश्चर्यजनक क्षण है। क्लाडिया गोल्डिन की नई दिशा देने वाला यह शोध इतिहास की ठोस जमीन पर है और यह वर्तमान के लिए बेहद प्रासंगिक है। यह समाज विज्ञान के लिए एक मॉडल है। यह सही मायने में नोबेल है जिसका अभिवादन करना चाहिए।”

इस संदर्भ में, क्लाडिया की पुस्तक पुस्तक ‘कैरियर एण्ड फैमिलीः वुमेन सेंचुरी-लांग जर्नी टूवर्ड इक्विटी’ के पहले अध्याय का एक अंश उद्धृत करना उपयुक्त होगाः “1963 में बेट्टी फ्रीडमैन कॉलेज की पढ़ी हुई लड़कियों के बारे में लिख रही थीं, जो घरों में मां बनकर निराशा से भरी हुई थीं, और इस बात को चिन्हित कर रही थीं कि उनकी समस्या का ‘कोई नाम नहीं है’।

लगभग 60 साल बाद कॉलेज से स्नातक कर आने वाली लड़कियां कैरियर के रास्तों पर थीं। लेकिन उनके साथ काम करने वाले स्नातक पुरुषों के मुकाबले में, उनकी आय और प्रोमोशन जिस तरह का था उससे उन्हें लगता था कि उन्हें किनारे की ओर ठेला जा रहा है। इन्हें भी समस्या थी जिसका ‘कोई नाम नहीं था’।” (अध्यान 1-द न्यू प्रॉबलम विद नो नेम, पेजः 1, प्रिंसटन प्रकाशन वेब पेज से सभार; नोटः यहां पहला अध्याय उपलब्ध है)।

क्लाडिया गोल्डिन ने इस समस्या को नाम दिया, ऐतिहासिक संदर्भ दिया और इसे वर्तमान में हल करने की एक समझदारी को पेश किया। यदि हम 1960-70 के दशक में अमेरीका में नारीवादी आंदोलन को देखें, तब हम एक के बाद एक मांगों को उठते हुए देखते हैं। बाजार जिस समाज की धुरी बन गया था उसमें श्रम की हर स्तर पर बराबरी की मांग एक जरूरी मांग थी। यह सिर्फ श्रम के साथ बराबरी के व्यवहार की मांग नहीं थी, इसमें परिवार, बच्चे से लेकर एक नागरिक के बतौर बराबर होने के अधिकार की भी मांग थी।

इस तरह यह सिविल राइट आंदोलन का हिस्सा बन गया था और यह ऐतिहासिक संदर्भों की मांग कर रहा था। इस दौरान बाजार सेक्सुअलिटी को आजाद करने के लिए एक नई तकनीक को सामने लाया और वह था गर्भनिरोधक गोलियां। इस तकनीक ने महिलाओं को लंबे समय तक श्रम बाजार में बने रहने का मौका दिया और साथ ही सेवा क्षेत्र ने उन्हें विस्तारित रोजगार में भागीदारी की संभावना का बढ़ा दिया।

इस दौर के नारीवादी आंदोलन ने पूरे यूरोप को अपनी गिरफ्त में लिया और इसकी कुछ अनुगूंज भारत में भी सुनाई दी। इस दौर में कई सारी बहसें हुई, गीत रचे गये और 1990 तक अपनी ऊर्जा से अमेरीकी समाज को प्रभावित किये रहा।

क्लाडिया गोल्डिन इन आंदोलनों, श्रम बाजार में भागीदारी, नागरिक अधिकार आंदोलन और महिलाओं की स्थितियों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने ‘अर्बन स्लेवरी इन अमेरिकन साउथ, 1820-60; नाम से शोध ग्रंथ लिखा और इसे प्रकाशित कराया। 1990 में उनकी प्रसिद्ध पुस्तकः अंडरस्टैंडिंग द जेंडर ग्रोथः अ इकॉनामिक हिस्ट्री ऑफ अमेरिकन वुमेन’ आई। 2008 में उनकी पुस्तकः द रेस बिटविन ऐजुकेशन एण्ड टेक्नोलॉजी छपकर आई। वह ऐतिहासिक संदर्भों में लिख रही थीं।

इस संदर्भ में, भारत के अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के शोध कार्यों का उल्लेख जरूरी है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गरीबी और अकाल’ भूख को एक ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर उन कारकों की तलाश करती है जिनसे अकाल की स्थितियां बनती हैं। वह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बचपन में कलकत्ता की गलियों और खुद उनके घर के सामने भूख से अपनी मानसिक हवास खो देने वाले लोग रोटी खोजते हुए आ रहे थे, और खुली सड़कों पर मरते जा रहे थे।

उन्होंने कई देशों की उत्पादन की व्यवस्था और बाहरी हस्तक्षेप के बीच के अंतर्संबंधों का गहरा अध्ययन करते हुए बताया कि अकाल प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह इंसान द्वारा पैदा की हुई समस्या है। उन्होंने अर्थशास्त्र के उस विकासवादी धारा को चिन्हित किया जिसमें उत्पादन की प्रक्रिया पर बाजार से अधिक मानवीय पक्ष का अधिकार होना चाहिए।

क्लाडिया गोल्डिन का काम दुनिया भर के नारीवादी समझदारी को आगे बढ़ाने, बाजार व्यवस्था और श्रम बाजार की व्यवस्था को समझने और प्रतिक्रियावादी चिंतनों से निपटने में निश्चित ही एक समझदारी दे सकती है। खासकर, भारत जैसे देश में जहां महिलाओं की श्रम भागीदारी सउदी अरब से भी नीचे चली गई है।

भारत में लगभग दो करोड़ महिलाएं घरों में बैठकर निहायत ही कम वेतन पर काम कर रही हैं। वे श्रम बाजार के उन तहखानों में काम कर रही हैं जहां वे बच्चों को पैदा कर रही हैं, पाल रही हैं और सारा घरेलू काम का बोझ भी उठाये हुए हैं। उम्मीद है क्लाडिया गोल्डिन को पढ़ा जायेगा और उनके ऐतिहासिक संदर्भों को भारत में पुनः लिखा जाएगा।

(अंजनी कुमार पत्रकार हैं।)

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