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तानाशाही, लोकतन्त्र और खूंटियों पर संविधान

इस समय जब यह पंक्तियाँ मैं लिख रहा हूँ दिल्ली के सरहद पर एक ओर तो देश के जवान हैं और दूसरी और ‘अन्नदाता’ भूमिपुत्र किसान खड़े हैं। ‘जय जवान-जय किसान‘ के नारे के तहत देश अपने जिन दो बेटों पर फ़ख्र करता था, प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें दुश्मन शक्तियाँ बना कर आमने सामने खड़ा कर दिया है।

वही पुराना फ़िकरा, हालत तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में हैं।

कल संविधान दिवस था। हर साल 26 नवंबर को मनाया जाता है, जिस दिन भारत के संविधान मसौदे को अपनाया गया था। कल का संविधान दिवस दो बातों के चलते खास रहा। एक तो इसलिए कि संविधान को इस देश में शामिल किए पूरे सत्तर साल हो गए और दूसरा इसलिए कि कल जिस तरह से हरियाणा की खट्टर सरकार ने केंद्र सरकार के इशारे पर विरोध-प्रदर्शन करने दिल्ली जा रहे किसानों को अपने ही देश के एक राज्य से गुजरने से रोकने की कोशिश की उससे साफ़ लग रहा है कि जैसे संविधान को खूंटी पर टांग कर, लोकतन्त्र की फ़ातिहा पढ़ दिया गया है।

वो भी भूमिपुत्र हैं, रोके से कहाँ रुकते हैं।

उनके लिए उनका मंदिर-मस्जिद और माँ उनकी भूमि है जिसकी रक्षा के लिए वह सड़कों पर उतर आए हैं। उन्होंने वह तमाम बड़े-बड़े पत्थर जो सरकार ने क्रेनों से उठाकर सड़कों पर रखे थे, हाथों से उठाकर दरिया में बहा दिये। आँसू गैस के गोले और जल-तोपें उनका रास्ता नहीं रोक पायीं। पुलिस, अर्ध-सैनिक बल और सीआरपीएफ़ के जवान पीछे हट गए और किसान आगे बढ़ते चले गए।

अहमद नदीम कासमी याद आ गए। उनका एक शे’र है:

रुके हुए हैं जो दरिया, उन्हें रुका न समझ

कलेजा चीर के निकलेंगे कोहसारों (पहाड़ों) का। 

शाम ढलने से पहले वह करनाल बाई पास पर खड़ी चौ० छोटूराम की प्रतिमा तक पहुँच गए थे। ब्रिटिश काल में किसानों के क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े चौ० छोटूराम ने कहा था: “मैं किसान को हुक्मरान देखना चाहता हूँ और इसीलिए चाहता हूँ कि वह दूसरों पर निर्भर रहने की भावना से पीछा छुड़ायें ….ए किसान, किसी का पिछलग्गू न बन, गुलामी को छोड़ और हाकिम बन।”

2019 में हरियाणा में अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत रोहतक रैली में से की थी चौ० छोटूराम की प्रतिमा के अनावरण के साथ। रोहतक की रैली में पीएम मोदी ने लंबा भाषण दिया और (पीएमओ) ने नरेंद्र मोदी का बयान ट्वीट किया, “ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसानों की आवाज़, ‘जाटों’ के मसीहा, रहबर-ए-आज़म, दीनबंधु चौ० छोटूराम जी की इतनी भव्य प्रतिमा का अनावरण करने का अवसर मिला।”

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में चौ० छोटूराम की तुलना सरदार पटेल से भी। लोग चौ० छोटूराम को जाट नेता कहे जाने वाले ट्वीट से पहले से ही नाराज थे। उनका मानना है कि चौ० छोटूराम सिर्फ़ जाटों के मसीहा नहीं थे, बल्कि वे समस्त किसानों और कामगारों के मसीहा थे। इससे हरियाणा में सोशल मीडिया पर इस बयान की इतनी फ़जीहत हुई कि पीएमओ को ट्वीट तुरंत हटाना पड़ा। चौ० छोटू राम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनकी वजह से अविभाजित पंजाब प्रांत में न तो मोहम्मद अली जिन्ना की चल पायी और ना ही हिंदू महासभा की।

चौ० छोटूराम हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को पसंद नहीं करते थे। अंग्रेज शासक जब जिन्ना की पीठ ठोक रहे थे तो चौ० छोटूराम ने कान पकड़ कर जिन्ना को पंजाब से निकाल दिया था। तब पंजाब में बहुसंख्यक मुस्लिम भी जिन्ना को पसंद नहीं करते थे। पंजाब के मुसलमानों के दिल चौ० छोटूराम ने जीत रखे थे जो इनको छोटा राम कहा करते थे। जिन्ना को पंजाब से निकालने के बाद तो मुसलमानों ने चौ० छोटूराम को ‘रहबर-ए-हिन्द’ का खिताब दे दिया।

किसानों के इस संघर्ष के समय में चौ० छोटूराम को आज याद करना इसलिए भी बनता है क्योंकि चौधरी छोटूराम की अपनी लेखनी से किसानों के हक़ में हमेशा अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे। उनके लिखे लेख ‘ठग बाजार की सैर’ और ‘बेचारा किसान’ के लेखों में से 17 लेख जाट गजट में छपे। 1937 में जब सिकन्दर हयात खान पंजाब के पहले प्रधानमंत्री और चौ० छोटूराम विकास व राजस्व मंत्री बने तो उन्होने अनेक कानूनों के जरिए किसानों को शोषण से निज़ात दिलवाने के भरसक प्रयास किए।

चौ० छोटूराम की बदौलत साहूकार पंजीकरण एक्ट (1934) जो लागू हुआ। इसके अनुसार कोई भी साहूकार बिना पंजीकरण के किसी को कर्ज़ नहीं दे सकता था और न ही किसानों पर अदालत में मुकदमा कर सकता था। इस अधिनियम के कारण साहूकारों की एक फौज पर अंकुश लग गया। गिरवी ज़मीनों की मुफ़्त वापसी एक्ट 1938 भी चौ० छोटूराम लेकर आए। इसके जरिए जो जमीनें 8 जून 1901 के बाद कुर्की से बेची हुई थी तथा 37 सालों से गिरवी चली आ रही थीं, वो सारी जमीनें किसानों को वापस दिलवाई गईं।

आज मोदी सरकार मंडीकरण बोर्ड का सफ़ाया करने पर आमादा है लेकिन चौ० छोटूराम कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम (1938) के तहत नोटिफाइड एरिया में मार्केट कमेटियों का गठन किया गया। एक कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को अपनी फसल का मूल्य एक रुपये में से 60 पैसे ही मिल पाता था। अनेक कटौतियों का सामना किसानों को करना पड़ता था। आढ़त, तुलाई, रोलाई, मुनीमी, पल्लेदारी और कितनी ही कटौतियां होती थीं। इस अधिनियम के तहत किसानों को उसकी फसल का उचित मूल्य दिलवाने का नियम बना। आढ़तियों के शोषण से किसानों को निजात इसी अधिनियम ने दिलवाई।

व्यवसाय श्रमिक अधिनियम 11 जून 1940 को लागू हुआ। बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाए जाने वाले इस कानून ने मजदूरों को शोषण से निजात दिलाई। सप्ताह में एक दिन की छुट्टी वेतन सहित और दिन में 8 घंटे काम करने के नियत किये गए। अब मोदी सरकार 8 घंटे की दिहाड़ी को 12 घंटे करने पर तुली हुई है।

चौधरी छोटूराम ने 8 अप्रैल 1935 में किसान व मजदूर को सूदखोरों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए बनवाया। इस कानून के तहत अगर कर्जे का दुगुना पैसा दिया जा चुका है तो ऋणी ऋण-मुक्त समझा जाएगा। इसके अनुसार किसान के कर्जा ना चुका पाने की सूरत में तय हो गया कि उसके दुधारू पशु, बछड़ा, ऊंट, रेहड़ा, घेर, गितवाड़ आदि आजीविका के साधनों की नीलामी नहीं की जाएगी। अब किसान कर्ज़ों का बोझ न बर्दाश्त करते हुए आत्महत्याएँ कर रहे हैं और मोदी अमेरिका बसे भारतीयों को कहते हैं ‘सब चंगा सी’।

हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने शोषण से मुक्ति संबंधी जो कुछ भी हासिल किया था मोदी सरकार उसके उलट जाकर कॉर्पोरेट घरानों द्वारा शोषण के अँधेरों में धकेल देने की ज़िद पर अड़ी हुई है। एक तरह से जिस तरह से सशस्त्र जवानों को निहत्थे किसानों के विरुद्ध खड़ा करके हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है। इसे किसानों के खिलाफ युद्ध का एलान कहना ही मुनासिब है।

मोदी सरकार ने ही 19 नवंबर, 2015 को राजपत्र अधिसूचना की सहायता से 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में घोषित किया था। अब उसी संविधान दिवस पर ही वह किसान-मजदूर के धरना-प्रदर्शन करने के लोकतांत्रिक अधिकार तक, जो उन्हें संविधान देता है, छीन लेने पर आमाद हो गयी है। एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच से आवाजाही को रोकना लोकशाही, राज्यों के बीच समन्वय और सहयोगी संघवाद के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

यह लोकतन्त्र नहीं तानाशाही है।

अल्बर्ट आइंस्टीन इंस्टीट्यूट के राजनीति विज्ञानी जीन शार्प अपनी प्रसिद्ध किताब ‘फ़्रॉम डिक्टेटरशिप टू डेमॉक्रेसी’ (हिन्दी में तानाशाही से लोकशाही) में लिखते हैं “किसी भी समझौता वार्ता में, तानाशाहों द्वारा चाहे जो भी वायदे किए जाएँ, किसी को भी, कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि तानाशाह अपने लोकतांत्रिक विरोधियों का समर्पण प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, कुछ भी वायदा कर सकता है। लेकिन अक्सर तानाशाह अपने वायदों पर खरे नहीं उतरते। अपने वायदों से मुकरते हुए, अपने दिए गए वचनों को तोड़ते हुए, तानाशाह सभी समझौतों का निर्लज्जता से ठट्ठा, मारते हुए उल्लंघन भी कर सकते हैं”।

यदि लोकतंत्रवादी, दमन से मुक्ति पाने की खातिर, अपने प्रतिरोध को रोकने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो वे जान लें कि अन्तत: ठगे जाएँगे और उनको गहरी निराशा ही हाथ लगेगी। प्रतिरोध में ठहराव शायद ही कभी दमन को कम करता है एक बार आन्तरिक और अन्तरराष्ट्रीय विरोध की निरोधक शक्ति को हटा दिए जाने के बाद, तानाशाह अपने उत्पीड़न और हिंसा को, पहले से कहीं अधिक क्रूर बना सकते हैं। लोकप्रिय प्रतिरोध का पतन अक्सर उस प्रतिकार बल को हटा, मिटा और विलुप्त कर देता है, जिसने तानाशाही के नियंत्रण और क्रूरता को सीमित दायरे में बाँधा होता है। उस स्थिति में, अत्याचारी अपनी इच्छानुसार किसी के भी विरूद्ध, जो चाहे वो कार्रवाई कर सकते है।“

कृष्ण लाल श्रीधरनी लिखते हैं, “जालिम-अत्याचारी के पास दर्द, पीड़ा, चोट और कष्ट देने की उतनी ही अधिक शक्ति होती है; जितनी मासूम मज़लूम के पास प्रतिरोधक-शक्ति की कमी होती है।”

जीन शार्प याद दिलाते हैं कि “सौदेबाज़ी नहीं, प्रतिरोध ही संघर्षों में बदलाव लाने के लिए आवश्यक कारक है, जहां मूलभूत मुद्दे दाँव पर लगे हों। लगभग सभी मामलों में, तानाशाह को सत्ता से बेदखल करने के लिए प्रतिरोध जारी रखना चाहिए। …राजनीतिक अवज्ञा या अवहेलना, या अहिंसक संघर्ष, मुक्ति के लिए संघर्ष करने वालों के लिए उपलब्ध सबसे प्रबल और शक्तिशाली साधन है।”

जीन शार्प वैसे बंदा तो सुनते हैं सयाना है; बातें भी सयानी करता है। अब तक तो किसान उसकी ही बातों पर अमल करते नज़र आते हैं। किसी डेयरी फ़ार्मिंग से जुड़े किसान को शायद ही उसकी बात समझ में आए। वह तो छूटते ही पूछेगा भाई तानाशाही से लोकशाही की बातें कर रहा है, कभी पनीर से भी दूध बना है?

अब तक तो एक ही माँ के दोनों बेटे जवान और किसान आमने-सामने खड़े हैं। स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है।

आगे मौला जाने।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 27, 2020 8:40 pm

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