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किसान नेताओं ने कहा- ठोस प्रस्ताव पर ही होगी सरकार से बात, अडानी-अंबानी के सामानों के सामाजिक बहिष्कार की अपील

आज सिंघू बॉर्डर पर बैठक के बाद किसान संगठनों ने सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि सरकार कुछ ठोस प्रस्ताव लेकर आए, संशोधनों से बात नहीं बनेगी। मीडिया को संबोधित करते हुए योगेंद्र यादव ने कहा, “सरकार हमें अलगाववादी बताती है, किसान आंदोलन को बदनाम करने की साजिश कर रही है। सरकार ने पत्र में लिखा है कि हम क्या चाहते हैं। क्या सरकार हमें इतना नासमझ समझती है। हम बिल्कुल शुरू से कह रहे हैं कि हम क्या चाहते हैं। फिर पांच राउंड की वार्ता और गृह मंत्री के साथ बैठक में अब तक क्या बातचीत हुई।

योगेंद्र यादव ने कहा कि 9 दिसंबर को सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव में 5 दिसंबर की मौखिक बात को दोहराया गया था। हम एक बार फिर सरकार को स्पष्ट बता रहे हैं।  हम तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करवाना चाहते हैं, हमें संशोधन नहीं चाहिए। दूसरी बात राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों के मुताबिक सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए सरकार क़ानून बनाकर गारंटी दे। वहीं बिजली विधेयक ड्रॉफ्ट पर पर सरकार का प्रस्ताव अस्पष्ट है। प्रदर्शनकारी किसान और किसान संगठन बातचीत के लिए तैयार हैं बस इंतज़ार इस बात का है कि सरकार कब खुले मन से बात करने के लिए आगे आती है। उन्होंने कहा कि निरर्थक संशोधनों के खारिज प्रस्ताव को दोबारा भेजने के बजाय सरकार ठोस लिखित प्रस्ताव के साथ आगे आए तो बात हो।

किसान नेताओं ने कहा कि सरकार इसे लटकाकर किसानों का मनोबल तोड़ना चाहती है। जब हम कह रहे हैं कि जब हम तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने से कम पर राजी नहीं हैं तो फिर क्यों बार-बार आप संशोधन का झांसा देकर खिलवाड़ कर रहे हैं। इसका मतलब है कि किसानों को सरकार हल्के में ले रही है, जबकि इस देश की 60 प्रतिशत आबादी वाले हम किसान अनाज उगाकर देश की अवाम का पेट भरने से लेकर देश की सीमा की रक्षा के लिए अपने घर के जवान देते हैं।

किसान नेताओं ने कहा कि एमएसपी पर सरकार का प्रस्ताव स्पष्ट नहीं है। सरकार ठोस प्रस्ताव लिखित में भेजे। सरकार आग से न खेले।

अडानी-अंबानी के सामानों के सामाजिक बहिष्कार की अपील
किसान महापंचायत के अध्यक्ष राम पाल दास ने कहा, “सरकार जिन अडानी-अंबानी के लिए ये सब कर रही है अब समय आ गया है कि हम लोग अडानी-अंबानी के सामानों का सामाजिक बहिष्कार करें। ये आंदोलन अब सीधे कॉरर्पोरेट के खिलाफ़ होगा, जिनकी गुलामी सरकार कर रही है। हमें अब सीधे उन्हें घेरना होगा और हम घेरेंग भी।

किसान नेताओं ने कहा कि सरकार ऐसे काम कर रही है, जिससे किसानों में असंतोष अविश्वास पैदा हो। सरकार ने पहले प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान लागू करके किसानों की हालत को बद से बदतर कर दिया। सरकार ने 75 फीसद फसल एमएसपी से बाहर कर दी।

वहीं हरियाणा के किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, “सरकार लोगों को गुमराह कर रही है कि वो बात करना चाहती है पर किसान ही अड़े हैं बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन सच ये है कि हमने कभी भी बात से इनकार नहीं किया। वो जब बात करने आएंगे तो बात करेंगे हम। मुद्दे की बात ये है कि जब इस देश के किसान कृषि क़ानूनों को नकार रहे हैं तो ये सरकार कृषि क़ानून हम किसानों पर क्यों थोप रही है? क्यों बता रही है किसानों के हित में है कृषि क़ानून? आखिर इस कृषि क़ानून को सरकार क्यों हर हाल में लागू करने पर अड़ी हुई है? क्या राज है इस क़ानून के पीछे!

माले विधायकों के नेतृत्व में किसानों का जत्था कल करेगा दिल्ली मार्च
भाकपा-माले के तरारी से विधायक और अखिल भारतीय किसान महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सुदामा प्रसाद, घोषी से विधायक रामबली सिंह यादव, अखिल भारतीय किसान महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और भोजपुर के युवा नेता राजू यादव, जन कवि कृष्ण कुमार निर्मोही आदि नेताओं के नेतृत्व में किसानों का एक जत्था कल 24 दिसंबर को दिल्ली रवाना होगा। किसान नेताओं का यह जत्था दिल्ली में किसान आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल में शामिल होगा।

किसान नेताओं का यह जत्था 28 दिसंबर तक दिल्ली में कैंप करेगा और फिर 29 दिसंबर को पटना वापस लौटकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर आयोजित राजभवन मार्च में हिस्सा लेगा। इन नेताओं के बिहार वापस लौट आने पर किसानों का दूसरा जत्था बिहार से दिल्ली की ओर प्रस्थान करेगा और यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।

एआईपीएफ और मंच के कार्यकर्ताओं ने रखा उपवास
आज आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और मजदूर किसान मंच के कार्यकर्ताओं ने अन्न का त्याग किया। एआईपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता एसआर दारापुरी और मजदूर किसान मंच के महासचिव डॉ. बृज बिहारी ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि कार्यक्रमों में लिए संकल्प प्रस्ताव में कहा गया किखेती किसानी को बर्बाद करने के लिए सरकार द्वारा लिए कॉरपोरेटीकरण के कांट्रैक्ट फार्मिंग के रास्ते की जगह सहकारी रास्ते से ही कृषि प्रधान भारत को आर्थिक मजबूती की तरफ ले जाया जा सकता है।

आज जरूरत देश की अस्सी प्रतिशत छोटी-मझोली खेती के सहकारीकरण की है, जिसमें दो-तीन गांव का कलस्टर बनाकर ब्याज मुक्त कर्ज, सस्ती लागत सामग्री, गांव स्तर पर फसल की एमएसपी पर खरीद, उसके संरक्षण और वितरण की व्यवस्था करने और कृषि आधारित उद्योग लगाने की है। इसे करने की जगह आरएसएस और भाजपा के लोग अंबानी-अडानी जैसे कॉरपोरेट घरानों के हितों के लिए राजहठ कर रहे हैं। उन्हें हठधर्मिता को त्याग कर कानूनों को रद्द करना चाहिए और एमएसपी पर कानून बनाना चाहिए।

केंद्र सरकार का काउंटर प्लान
वहीं केंद्र सरकार अपनी तमाम तिकड़मों के बावजूद किसान आंदोलन को कुचलने और इसकी छवि को बदनवाम करने के अपने मंसूबों में जब कामयाब नहीं हो पाई तो अब मीडिया के मार्फत किसानों और आम नागरिकों के बीच नकद पैसे की चमक दिखाकर गुमाराह करने के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है।

आज केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने घोषणा की कि 25 दिसंबर को अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के अवसर पर मोदी सरकार पीएम किसान सम्मान निधि के अंतर्गत नौ करोड़ किसानों के बैंक अकाउंट में 18,000 करोड़ रुपये ट्रांसफर करेगी।

इसके आगे उन्होंने एमएसपी के मुद्दे पर लीपापोती करते हुए कहा, “कृषि सुधार की दृष्टि से MSP को परिभाषित करने की दृष्टि से कई बातें हम सभी के मन में हैं, किसान नेताओं और किसानों के मन में भी हैं। कुछ सुधार हुए हैं और बहुत से सुधार आने वाले समय में कृषि क्षेत्र में किए जाने हैं।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on December 23, 2020 8:31 pm

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