हाथ में हथियार के बाद अब सत्ता की कमान

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नई दिल्ली। तेलंगाना में गुरुवार को रेवंत रेड्डी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ 12 अन्य विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह के बाद रेवंत रेड्डी के कैबिनेट में शामिल दंसारी अनुसूया का नाम सुर्खियों में है। ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्या है कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में अनुसूया का नाम चर्चा में है। मीडिया में चर्चा का कारण अनुसूया का विलक्षण व्यक्तित्व एवं कृतित्व है।

अनुसूया जनता के बीच “सीतक्का” के नाम से लोकप्रिय हैं। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी उन्हें प्यार से अपनी बहन कहते हैं। लेकिन उनके सुर्खियों में रहने का कारण मंत्री पद पा लेना या सीएम की मुंहबोली बहन होना नहीं है। बल्कि उनकी चर्चा उनके जीवन-संघर्षों और हौसले के कारण हो रही है। वह नक्सली सशस्त्र आंदोलन से निकल कर लोकतांत्रिक तरीके से मंत्री पद तक पहुंची है। मंत्री पद तक पहुंचने के क्रम में व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक रूप से उनके खाते में ऐसा बहुत कुछ है जो एक सफल व्यक्ति के लिए ईर्ष्या का कारण हो सकता है।

फिलहाल हम सीतक्का के जीवन एवं संघर्षों के बारे में बात करते हैं। तेलंगाना के मुलुगु जिले के जग्गनगुडेम गांव में 9 जुलाई, 1971 को जन्म अनुसूया का जन्म हुआ। आदिवासी कोया जनजाति परिवार में लेने वाली दंसारी अनुसूया का शुरूआती जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण था। राजनीति में आने से पहले वह एक सक्रिय नक्सली कार्यकर्ता थीं। एक दशक तक भूमिगत सशस्त्र संघर्षों मे रहने के बाद उनका नक्सली आंदोलन से मोहभंग हो गया और उन्होंने सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण कर नई जिंदगी को फिर से शुरू किया।

नक्सल आंदोलन में शामिल होने के समय वह कक्षा-9 तक की पढ़ाई की थी। शिक्षा के प्रति उनका उत्साह इतना प्रबल था कि उन्होंने जेल से दसवीं कक्षा की परीक्षा दी और सशस्त्र आंदोलन से निकलने पर उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा किया और वकील बन गईं। 2022 में उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में अपनी पीएचडी पूरी की।

शिक्षा और राजनीति में हासिल हुई उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए 11 अक्टूबर, 2022 को उन्होंने लिखा था  कि “बचपन में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं नक्सली बनूंगी। जब मैं नक्सली थी, तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं वकील बनूंगी। जब मैं वकील हूं, तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं विधायक बनूंगी। जब मैं विधायक निर्वाचित हुई तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपनी पीएचडी करूंगी। अब आप मुझे डॉ. अनुसूया सीताक्का, पीएचडी, राजनीति विज्ञान कह सकते हैं।”

सीतक्का अब 52 वर्ष की हैं और तेलंगाना सरकार में मंत्री हैं। 1987 में जब वह 14 साल की थीं, तब वह जनशक्ति नक्सली समूह में शामिल हुई थीं। एक दशक तक नक्सल आंदोलन में सक्रिय रहने के बाद उनका आंदोलन से मोहभंग हो गया। 1997 में उन्होंने सामान्य माफी योजना के तहत पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सीताक्का ने नक्सलवाद छोड़ दिया था, हालांकि उनके पति सक्रिय रहे और अंततः एक मुठभेड़ में मारे गए।

तीसरी बार विधायक बनी अनुसूया सीतक्का ने 7 दिसंबर को मंत्री पद का शपथ लिया। कांग्रेस ने बेहद लोकप्रिय पूर्व नक्सली कमांडर, जो हमेशा न्याय की तलाश में सक्रिय रहीं को मंत्री पद देकर साहस और दूरदर्शिता दिखाई है। कांग्रेस ने सामाजिक सेवा और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करते हुए विभिन्न राज्यों में संगठन का दायित्व दिया और चुनाव लड़ाया। सीतक्का को भारत जोड़ो यात्रा के दौरान तेलंगाना में राहुल गांधी के साथ चलते हुए देखा गया।

कांग्रेस की वफादार

तेलंगाना के मुलुगु से विधायक सीतम्मा कांग्रेस की कट्टर समर्थक और वफादार हैं। पिछले विधानसभा कार्यकाल में जब कांग्रेस के आधे विधायक दबाव या प्रलोभन में टीआरएस (अब बीआरएस) में शामिल हो गए, तब भी उन्होंने पार्टी में रहने का फैसला किया। बीआरएस के लोगों ने राज्य में कांग्रेस के कमजोर होने की बात कही, लेकिन उन्होंने कमजोर कांग्रेस को मजबूत करने का फैसला किया।

राजनीतिक कैरियर में उतार-चढ़ाव

जेल से बाहर आने के बाद अनुसूया तेलुगु देशम पार्टी में शामिल हुईं और 2004 में मुलुग विधानसभा से चुनाव लड़ीं लेकिन असफल रहीं। 2009 में उन्होंने फिर मुलुग से चुनाव लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार पोडेम वीरैया को भारी अंतर से हराया। वह 2014 में बीआरएस उम्मीदवार अजमीरा चंदूलाल से चुनाव हार गईं।

2017 में, अनसूया ने टीडीपी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गईं, जल्द ही अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की महासचिव और बाद में छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस की राज्य प्रभारी बन गईं। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 2018 और 2023 में मुलुग निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव जीता।

लॉकडाउन में राहत कार्य

अनुसूया ने 2020 में लॉकडाउन के दौरान तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा के पास 400 से अधिक गांवों के लोगों को राहत प्रदान की थी, जरूरतमंद लोगों को चावल, दाल आदि सामान और मास्क वितरित किए थे। उनके प्रयासों को सोशल मीडिया पर जबरदस्त समर्थन मिला था।  

प्रदीप सिंह https://www.janchowk.com

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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