Wednesday, April 17, 2024

मोदी जी अब राष्ट्रपति से भी ऊपर हो गए हैं!

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है। बीजेपी के बुजुर्ग नेता लाल कृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भारत रत्न दिए जाने की इस तस्वीर में आडवाणी कुर्सी पर बैठे हुए हैं और उनके बगल में पीएम मोदी भी कुर्सी पर विराजमान हैं। और दोनों के एक तरफ राष्ट्रपति मुर्मू अकेले खड़ी हैं। जबकि प्रोटोकाल यह कहता है कि राष्ट्रपति के सामने पीएम मोदी इस तरह से बैठे नहीं रह सकते हैं। यह पूरी हरकत न केवल राष्ट्रपति की गौरव और गरिमा को तार-तार करती है बल्कि संवैधानिक परंपरा और प्रोटोकाल का खुला उल्लंघन है। दरअसल पीएम मोदी तमाम संवैधानिक संस्थाओं और खासकर राष्ट्रपति को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।

इसके पहले जब नई संसद का उद्घाटन हो रहा था तो वहां भी राष्ट्रपति मुर्मू को आमंत्रित तक नहीं किया गया। जबकि इस देश के भीतर संसद, सेना और न्यायपालिका तीनों का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। लिहाजा इनसे जुड़ा कोई भी बड़ा काम राष्ट्रपति की बगैर भागीदारी के संपन्न ही नहीं कराया जा सकता है। लेकिन मोदी हैं तो मुमकिन है।

दरअसल मोदी जी की न तो संविधान में कोई आस्था है और न ही दूसरी संस्थाओं और संवैधानिक परंपराओं में कोई विश्वास। उन्होंने तो इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प ले रखा है। अगर संस्थाएं उनके इशारे पर काम कर रही हैं तो वाह-वाह। नहीं तो फिर उनकी किसी भी समय ऐसी की तैसी करने के लिए वह तैयार रहते हैं। अभी दो दिन नहीं बीते हैं जब उन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपने तरीके से विषवमन किया है। जब 600 ‘राष्ट्रवादी’ वकीलों ने जिनकी अगुआई पनामा वाले हरीश साल्वे कर रहे थे, न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर सीजेआई की घेरेबंदी की कोशिश की कड़ी में एक पत्र लिखा। इस पूरे पत्र का कोई और मकसद नहीं बल्कि मौजूदा सीजेआई डीवाई चंद्रचूड को अपने दबाव में लेना था।

और इसी पत्र की प्रति को पीएम मोदी ने भी रिट्वीट कर दिया है। इलेक्टोरल बॉन्ड संबंधी खुलासे के बाद संघ-बीजेपी कुनबा बौखलाया हुआ है। चंदे के नाम पर हफ्ता वसूली के इस धंधे का खुलासा होने के बाद पूरी बीजेपी कठघरे में खड़ी हो गयी है। देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग समय पर निरंतर चलने वाले ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स के छापों का राज अब जाकर खुला है। अब लोगों को पता चल रहा है कि इसके जरिये बीजेपी क्या गुल खिला रही थी। हजारों हजार करोड़ रुपये इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये बीजेपी की जेब में आए और यह सब कुछ ईडी और इनकम टैक्स जैसी एजेंसियों के मार्फत हुआ। पूरी क्रोनोलाजी देश के सामने आ गयी है। पहले छापा फिर वसूली। अच्छे ठेके लेने हैं तो ज्यादा बॉन्ड खरीदने होंगे।

अनायास नहीं इसे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि बोफोर्स महज 64 करोड़ रुपये का मामला था। और उसमें सरकार तक बदल गयी थी। यहां तो 8 हजार करोड़ रुपये से ऊपर का मामला है। और पूरी पार्टी सिर से लेकर पांव तक इलेक्टोरल बांड के घोटाले में डूबी हुई है। बावजूद इसके पीएम मोदी अपनी थेथरई से बाज नहीं आ रहे हैं। आज ही मेरठ की रैली में उन्होंने कहा कि घोटालेबाजों को छोड़ा नहीं जाएगा। और उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई होगी। लेकिन अभी तक इलेक्टोरल बॉ़न्ड का उन्होंने नाम तक नहीं लिया है। कोई उनसे पूछ सकता है कि आखिर इसको रोकने और उजागर करने वाले शख्स पर आप क्यों हमलावर हैं?

संस्थाओं का बेजा इस्तेमाल कैसे किया जाता है कोई इनसे सीखे। ईडी, इनकम टैक्स और सीबीआई तो पहले से ही इनके शिकारी जानवर बने हुए थे। अब इसी कतार में चुनाव आयोग भी शामिल हो गया है। जिस चुनाव आयोग को अंपायर की भूमिका में खड़ा होकर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना चाहिए था। वह बीजेपी के साथ मिलकर विपक्षी दलों का गला घोंटने पर लग गया है। कभी कांग्रेस को इनकम टैक्स के मसले पर नोटिस तो कभी उसके खाते ही सील करने की कार्रवाई। और इस तरह एकतरफा तरीके से पूरे विपक्ष को पंगु कर देने के काम में वह लग गया है। और यह सब कुछ हो रहा है सरकार द्वारा अपना मनचाहा आयोग गठित करके।

आपको याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आयोग के सदस्यों के चयन के लिए गठित होने वाली चयन समिति में पीएम और विपक्ष के नेता के साथ सुप्रीम कोर्ट के एक जज को भी रखने का निर्देश दिया था। लेकिन जब इस मसले पर सरकार ने संसद में कानून बनाया तो उसने उसे दरकिनार कर दिया और अपनी मनमर्जी के आयोग के गठन के लिए पीएम और विपक्ष के नेता के साथ चयन समिति के तीसरे सदस्य के लिए उसमें अपने कैबिनेट के किसी सदस्य को रखने का प्रावधान करवा दिया और इस तरह से उन्होंने चुनाव आयोग को अपनी जेबी संस्था में तब्दील कर दिया। और कानून बनते ही दो नये चुनाव आयुक्तों की उन्होंने नियुक्ति की। और वही आयुक्त इस समय विपक्ष का बंटाधार करने की हर संभव जुगत में जुट गए हैं। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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