Friday, April 19, 2024

हेमंत सोरेन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बेंच गठित की, फिर सुनवाई क्यों नहीं की: सिब्बल

नई दिल्ली। मशहूर शायर साहिर लुधियानवी के गीत की एक पंक्ति कुछ सी प्रकार से हैं- “रहने दे अभी थोड़ा सा भरम, ये जाने वफ़ा ये जुल्म न कर।” गीत के बोल भले ही किसी फिल्म में नायक-नायिका के बीच भरोसे के तार-तार होने के संदर्भ में रही हो, लेकिन आज जब देश के सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और राज्य सभा सांसद कपिल सिब्बल को एक न्यूज़ चैनल के साथ बात करते हुए कुछ ऐसी ही अपील सर्वोच्च न्यायालय से करते नजर आये तो ये बोल खुद-ब-खुद जुबां पर आ गये।

बता दें कि गुरूवार को पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी की खबर के साथ ही उनके वकील कपिल सिब्बल की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस मामले की सुनवाई की अपील की गई थी, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए एक स्पेशल बेंच का गठन भी कर दिया था। शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई होनी थी।

लेकिन मामले पर सुनवाई करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट को कहना था कि आप पहले सुप्रीम कोर्ट क्यों आ गये, आपको पहले उच्च न्यायालय जाना चाहिए था। इससे पहले हेमंत सोरेन के क़ानूनी सलाहकारों की ओर से झारखंड उच्च न्यायालय में अपील की गई थी, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया गया था, और सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई।

हालांकि, कल शाम हेमंत सोरेन द्वारा नए मुख्यमंत्री के तौर पर मनोनीत चंपई सोरेन के नाम पर आशंका को खत्म करते हुए राज्यपाल को आखिरकार उन्हें झारखंड राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इस मामले में आज देश के जाने-माने वकील एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने जो कुछ कहा वह पूरे देश को ध्यान से देखना और मनन करना चाहिए। सिब्बल कहते हैं, “मुझे लगता है कि भारत के इतिहास में शायद ही कभी ऐसा कुछ हुआ होगा जब किसी मुख्यमंत्री को अपने पद पर आसीन होने के बावजूद गिरफ्तार किया गया हो। सुप्रीम कोर्ट को हमें बताना चाहिए कि हम किस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की शरण में आ सकते हैं और किन मामलों में नहीं आ सकते?”

कपिल सिब्बल का कहना था, “मैं आपको ऐसे सैकड़ों उदाहरण दे सकता हूं। हिंदुस्तान के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई मौका हुआ हो जब एक सिटिंग मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी हुई हो। लेकिन इस मामले को आर्टिकल 32 के तहत उसे सुनवाई के लायक नहीं समझा गया। हां, इतना जरूर है कि यदि सुप्रीम कोर्ट कहती कि आप अपना केस हमारे सामने रखिये, और उसके बाद कहती कि हम इस मामले में दखल नहीं देना चाहते, आप उच्च न्यायालय जाइये, तो फिर भी बात समझ में आती।”

“लेकिन सुप्रीम कोर्ट कह रही है कि आप उच्च न्यायालय जाइए। फिर वही बताये कि आखिर किन मामलों में हम आपके पास आ सकते हैं?”

कपिल सिब्बल आगे कहते हैं, “आखिर इस सबका हुआ क्या? उनकी गिरफ्तारी हो गई, रिमांड हो गया। मैं आपको बताता हूं आगे क्या होने वाला है? ये सरकार चाहती है कि विपक्ष का कोई भी मुख्यमंत्री अपने पद पर कायम न रह सके। यही काम अब अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ होगा। इनका मकसद है कि सभी राज्यों में सिर्फ डबल इंजन सरकार हो, विपक्ष की एक भी सरकार न हो। डबल इंजन सरकार का तो मतलब ही यही है कि केंद्र में भी भाजपा और राज्य में भी इन्हीं की सरकार रहे। यही इनका मकसद है।”

आगे की राह के बारे में सिब्बल कहते हैं, “होगा क्या, हेमंत जब गिरफ्तार बने रहेंगे तो 10 केस इनके ऊपर और लगा दिए जायेंगे। और सब बनावटी केस होंगे। ये भी बोगस केस है। मकसद यही है कि हेमंत सोरेन जेल से निकलेंगे नहीं, ताकि 2024 का चुनाव हो तो फायदा भाजपा को हो जाये।”

उन्होंने कहा कि “हिंदुस्तान के इतिहास में शायद ही कभी किसी आदिवासी समुदाय से आने वाले व्यक्ति को ऐसा पद मिला हो। आपने उस आदिवासी को गिरफ्तार कर दिया, वो भी एक फर्जी मामले में? न कोई सुबूत है न इस मामले में उनका कहीं नाम है।”

उन्होंने कहा कि “और हेमंत सोरेन पर आरोप क्या हैं? 8.5 एकड़ की कोई जमीन है, 2009 में उन्होंने ये जमीन हड़प कर ली, जबकि रेवेन्यु रिकॉर्ड में इनका नाम नहीं है। जमीन किसी और के कब्जे में है, और यह जमीन ट्राइबल लैंड है जो किसी और के नाम ट्रांसफर हो ही नहीं सकती। जो इस भूमि के वास्तविक मालिक हैं, आज के दिन यह जमीन उन्हीं के कब्जे में है।”

उन्होंन कहा कि “हेमंत जी ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) को पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2007 के बाद से उन्होंने कोई संपत्ति की खरीद ही नहीं की है। उन्होंने 2007 के बाद से कोई जमीन या घर ही नहीं खरीदा है।”

सिब्बल इस बेबुनियाद मामले की असलियत को कुछ इस प्रकार स्पष्ट करते हैं, “यह मामला 2009 का है और 2024 में गिरफ्तारी हो रही है? और अगर इस बात को भी सुप्रीम कोर्ट नहीं सुनेगा तो हम कहां जायेंगे?”

उच्च न्यायलय में इस मामले को लेकर क्या कुछ होगा के बारे में खुलासा करते हुए वकील सिब्बल बताते हैं, “उच्च न्यायालय में पहले जवाब आएगा, फिर डेट लगेगी, इस सबमें 15-20 दिन बीत जायेगा, फिर बहस होगी, फिर फैसला आएगा। इस बीच तो 10 केस और ठोंक दिए जायेगे। क्या हो रहा है हिंदुस्तान में? किस किस्म की राजनीति हो रही है?”

उन्होंने कहा कि “आप यह ऐलान क्यों नहीं कर देते कि हम सारे मुख्यमंत्रियों को हटायेंगे और हर राज्य में अपनी सरकार बनायेंगे। कानून को तो यहां कोई मतलब ही नहीं रहा। और सुप्रीम कोर्ट भी हमें बता दे कि आप कुछ करना चाहते हैं कि नहीं करना चाहते।”

इसके साथ ही कपिल सिब्बल सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पहले मामले की सुनवाई करने और बाद में हाईकोर्ट की शरण में जाने को लेकर सवाल उठाते हुए पूछते हैं, “आखिर 3 जज बिठाने का फायदा ही क्या है, क्योंकि पहले जब सर्वोच्च न्यायालय को लगा कि एक मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी बेहद अहम मामला है, और उसके लिए तीन न्यायाधीशों की बेंच गठित कर दी गई, तो फिर यह सब क्यों?”

उन्होंने कहा कि “या तो सामान्य प्रक्रिया के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता। और अगर 3 जज बिठाए ही थे, तो हमारी थोड़ी सी सुनवाई तो कर लेते? जिस बात को मैं आपके सामने बयां कर रहा हूं, अगर इस बात को सर्वोच्च न्यायलय की खंडपीठ के समक्ष रख पाते तो शायद वे इस मामले में हमें कुछ राहत दे पाते। लेकिन आर्टिकल 32 के तहत वह कौन सी नीति है जो हमारी सुनवाई नहीं हो सकती?”

सिब्बल ने कहा कि “हमें स्पष्ट होना चाहिए कि अगर हम आर्टिकल 32 के तहत नहीं आ सकते हैं तो ईडी कैसे इसके तहत आ सकती है? इसका मतलब तो यही हुआ कि जहां आप चाहते हो, वहां आप इजाजत दोगे और जहां मर्जी नहीं होगी वहां इजाजत नहीं दोगे। कानून के मुताबिक यह सही नहीं है।”

इस मुद्दे पर अब वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल कुछ गंभीर सवाल उठा रहे हैं, और उनका सवाल सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट से बेहद स्पष्ट और तीखा है, जिसका जवाब दे पाना संभवतः काफी कठिन होने जा रहा है। यह मामला अब देश की राजनीति से होते हुए न्यायपालिका की निष्पक्षता से जुड़ गया लगता है, जिसको लेकर पिछले कुछ समय से देश उहापोह की स्थिति में है।

अनुच्छेद 32 का हवाला देते हुए कपिल सिब्बल सर्वोच्च न्यायालय के अब तक के इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में एक स्पष्ट नीति तैयार करे, ताकि जनता को भलीभांति पता हो कि वह किन मामलों में सीधे उसके पास अपील कर सकती है, और किन मामलों में उसे ऐसी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।

उन्होंने इस संदर्भ में कुछ उदाहरण देते हुए अनुच्छेद 32 के हवाले से सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई का इतिहास सर्वसाधारण के समक्ष पेश किया।

कपिल सिब्बल ने कहा, “अर्णव गोस्वामी के मामले में अनुच्छेद 32 का सहारा लिया गया था, और तत्काल सुनवाई हुई, और राहत मिली। बिल्किस याकूब और विनोद दुआ के मामले में भी ऐसा हुआ। इसके अलावा मधु लिमये बनाम महाराष्ट्र सरकार, केरल पत्रकार संघ, अमिश देवगन, मीना बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई की।”

उन्होंने कहा कि “सबसे मजे की बात तो यह है कि ईडी तक ने अनुच्छेद 32 का सहारा लिया है। ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की ओर से केरल और छत्तीसगढ़ सरकार से राहत पाने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया है, और मामला पेंडिंग है। मुख्तार अंसारी मामले में इसका इस्तेमाल किया गया। नूपुर शर्मा मामले के साथ मैं आपको ऐसे सैकड़ों उदाहरण दे सकता हूं, जब आर्टिकल 32 का सहारा लिया गया और सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इन मामलों में सुनवाई की।”

कपिल सिब्बल जोर देते हुए आगे कहते हैं, “हिंदुस्तान के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा मामला हो कि सिटिंग मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी हुई हो। लेकिन इस मामले में सुनवाई को जरूरी नहीं समझा गया।”

पत्रकारों द्वारा कपिल सिब्बल से जब यह सवाल किया गया कि क्या वे इसे पक्षपातपूर्ण व्यवहार की श्रेणी में रखते हैं तो उन्होंने असहमत होते हुए इसे नीतिगत प्रश्न करार दिया। उनका साफ़ कहना था कि आर्टिकल 32 का उपयोग हमारे संविधान में देश के सभी नागरिकों के मूल अधिकार का प्रश्न है।

उन्होने कहा कि कोर्ट को मामले की सुनवाई करने के बाद तय करना चाहिए कि किसी मामले की उसे सुनवाई करनी चाहिए या नहीं। यदि सर्वोच्च न्यायालय मामले की सुनवाई करने के बाद कहता कि आप इस मामले को उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए ले जाएं, तो हमें कोई आपत्ति नहीं होती।

सवाल गंभीर हैं। मोदी सरकार और सर्वोच्च अदालत दोनों की विश्वसनीयता का प्रश्न है। झारखंड में नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के साथ राज्यपाल के जरिये झारखंड में सत्ता-परिवर्तन की कोशिश को विराम दिया जा चुका है, लेकिन सभी के लिए संविधान के तहत समान न्याय की गारंटी का प्रश्न, अनुत्तरित रह जाता है। आज यह सवाल स्वंय एक बेहद वरिष्ठ वकील के द्वारा उठाया गया है, जिसका जवाब सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय के ही पास है।   

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

जनचौक से जुड़े

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Latest Updates

Latest

वामपंथी हिंसा बनाम राजकीय हिंसा

सुरक्षाबलों ने बस्तर में 29 माओवादियों को मुठभेड़ में मारे जाने का दावा किया है। चुनाव से पहले हुई इस घटना में एक जवान घायल हुआ। इस क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय माओवादी वोटिंग का बहिष्कार कर रहे हैं और हमले करते रहे हैं। सरकार आदिवासी समूहों पर माओवादी का लेबल लगा उन पर अत्याचार कर रही है।

शिवसेना और एनसीपी को तोड़ने के बावजूद महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं

महाराष्ट्र की राजनीति में हालिया उथल-पुथल ने सामाजिक और राजनीतिक संकट को जन्म दिया है। भाजपा ने अपने रणनीतिक आक्रामकता से सहयोगी दलों को सीमित किया और 2014 से महाराष्ट्र में प्रभुत्व स्थापित किया। लोकसभा व राज्य चुनावों में सफलता के बावजूद, रणनीतिक चातुर्य के चलते राज्य में राजनीतिक विभाजन बढ़ा है, जिससे पार्टियों की आंतरिक उलझनें और सामाजिक अस्थिरता अधिक गहरी हो गई है।

केरल में ईवीएम के मॉक ड्रिल के दौरान बीजेपी को अतिरिक्त वोट की मछली चुनाव आयोग के गले में फंसी 

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को केरल के कासरगोड में मॉक ड्रिल दौरान ईवीएम में खराबी के चलते भाजपा को गलत तरीके से मिले वोटों की जांच के निर्देश दिए हैं। मामले को प्रशांत भूषण ने उठाया, जिसपर कोर्ट ने विस्तार से सुनवाई की और भविष्य में ईवीएम के साथ किसी भी छेड़छाड़ को रोकने हेतु कदमों की जानकारी मांगी।

Related Articles

वामपंथी हिंसा बनाम राजकीय हिंसा

सुरक्षाबलों ने बस्तर में 29 माओवादियों को मुठभेड़ में मारे जाने का दावा किया है। चुनाव से पहले हुई इस घटना में एक जवान घायल हुआ। इस क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय माओवादी वोटिंग का बहिष्कार कर रहे हैं और हमले करते रहे हैं। सरकार आदिवासी समूहों पर माओवादी का लेबल लगा उन पर अत्याचार कर रही है।

शिवसेना और एनसीपी को तोड़ने के बावजूद महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं

महाराष्ट्र की राजनीति में हालिया उथल-पुथल ने सामाजिक और राजनीतिक संकट को जन्म दिया है। भाजपा ने अपने रणनीतिक आक्रामकता से सहयोगी दलों को सीमित किया और 2014 से महाराष्ट्र में प्रभुत्व स्थापित किया। लोकसभा व राज्य चुनावों में सफलता के बावजूद, रणनीतिक चातुर्य के चलते राज्य में राजनीतिक विभाजन बढ़ा है, जिससे पार्टियों की आंतरिक उलझनें और सामाजिक अस्थिरता अधिक गहरी हो गई है।

केरल में ईवीएम के मॉक ड्रिल के दौरान बीजेपी को अतिरिक्त वोट की मछली चुनाव आयोग के गले में फंसी 

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को केरल के कासरगोड में मॉक ड्रिल दौरान ईवीएम में खराबी के चलते भाजपा को गलत तरीके से मिले वोटों की जांच के निर्देश दिए हैं। मामले को प्रशांत भूषण ने उठाया, जिसपर कोर्ट ने विस्तार से सुनवाई की और भविष्य में ईवीएम के साथ किसी भी छेड़छाड़ को रोकने हेतु कदमों की जानकारी मांगी।