Thursday, January 20, 2022

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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा राकेश अस्थाना का मामला, दायर हुई अवमानना याचिका

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राकेश अस्थाना को कथित तौर पर उच्चतम न्यायालय के प्रकाश सिंह मामले में दिए गये फैसले का उल्लंघन करते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त करने के लिए अधिवक्ता एमएल शर्मा ने उच्चतम न्यायालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि प्रकाश सिंह के फैसले के अनुसार, एक व्यक्ति के पास डीजीपी के रूप में अपनी नियुक्ति के लिए सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम तीन महीने की सेवा शेष होनी चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि अस्थाना, जिनकी सेवानिवृत्ति के लिए चार दिन शेष थे, को गृह मंत्रालय द्वारा अमित शाह की अध्यक्षता में और प्रधान मंत्री मोदी के कहने पर दिल्ली का पुलिस आयुक्त नियुक्त किया गया। यह कहते हुए कि नियुक्ति 3 जुलाई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जानबूझकर अस्वीकार करने के बराबर है।

याचिका में कहा गया है कि आपराधिक अवमानना को प्रधानमंत्री के कृत्यों के रूप में लागू किया जा सकता है और गृह मंत्री ने संविधान और संवैधानिक प्रणाली का एक गंभीर प्रश्न बनाया है और यह अदालत की संविधान पीठ द्वारा हल किए जाने के लिए उत्तरदायी है कि क्या इन दोनों व्यक्तियों को अपने शेष जीवन के लिए संवैधानिक पद पर बने रहने का कोई कानूनी और नैतिक अधिकार है। यह माना गया है कि चूंकि प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के प्रमुख हैं, अस्थाना को नियुक्त करने का निर्णय संयुक्त रूप से गृहमंत्री के साथ लिया गया था, और इसलिए, वे अवमानना के लिए उत्तरदायी हैं।

याचिका में कहा गया है कि अस्थाना की नियुक्ति प्रकाश सिंह जैसे विभिन्न निर्णयों में निर्धारित दिशानिर्देशों के विपरीत है, और निर्णय निर्माताओं ने जानबूझ कर और सोच समझकर उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ काम किया, इसलिए अदालत की गंभीर अवमानना के लिए दोनों प्रतिवादियों के विरुद्ध कार्यवाही किये जाने योग्य है।

याचिका में कहा गया है कि जो सवाल उठता है वह यह है कि क्या संविधान सरकारी कर्मचारियों की तानाशाही से बच जाएगा और क्या दोनों प्रतिवादियों को अपने पद पर बने रहने का कोई संवैधानिक अधिकार है। शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में निर्धारित निर्देशों का उल्लंघन करने के लिए प्रतिवादियों के खिलाफ अवमानना की शुरुआत के लिए प्रार्थना की है और अस्थाना की नियुक्ति को अवैध घोषित करने की मांग की है।

गुजरात कैडर के 1984 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी अस्थाना दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त होने से पहले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के महानिदेशक के रूप में कार्यरत थे।अस्थाना, जिन्होंने पहले सीबीआई के विशेष निदेशक के रूप में कार्य किया था, उनके और तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के बीच विवाद के बाद सुर्खियों में आए थे, जो अंततः शर्मा और अस्थाना दोनों को सीबीआई से हटाने में परिणत हुआ था।

राकेश अस्थाना तीन दिनों बाद रिटायर होने जा रहे थे कि अचानक उन्हें दिल्ली पुलिस आयुक्त बना दिया गया। केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना बताती है कि ऐसा लोकहित में विशेष मामले के तहत’ किया गया है। वैसे, सूरत के पूर्व पुलिस आयुक्त को भी एक साल का सेवा विस्तार दिया गया है। लेकिन अस्थाना का मसला थोड़ा ज्यादा टेढ़ा है। अभी जून, 2021 में दिल्ली पुलिस आयुक्त-पद पर नियुक्ति का मौका था, पर उन्हें यह पद नहीं दिया गया। उस वक्त एस एन श्रीवास्तव इस पद से रिटायर हुए थे और तब बालाजी श्रीवास्तव को इस पद का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। तो जून और जुलाई के बीच ऐसा क्या हो गया? यह पद आम तौर पर एजीएमयूटी (अरुचाणल-गोवा- मिजोरम-केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के आईपीएस अधिकारी को दिया जाता है। वैसे, इससे पहले एक बार इसी तरह अजय राज शर्मा को भी दिल्ली पुलिस आयुक्त बनाया गया था जबकि वह यूपी कैडर के थे।

अस्थाना गुजरात कैडर के विवादास्पद आईपीएस अधिकारी तो हैं ही। वह सीबीआई में थे और वहां सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा के साथ उनका मतभेद इस कदर सार्वजनिक हो गया था कि नरेंद्र मोदी सरकार को दोनों को ही अवकाश पर भेज देना पड़ा था। वर्मा ने व्यवसायी सतीश साना की इस शिकायत पर प्रारंभिक जांच (पीई) के आदेश दिए थे कि विवादास्पद मीट निर्यातक मोईन कुरैशी के खिलाफ हवाला से धन लेने के मामले में जांच के दौरान अस्थाना ने 3 करोड़ रुपये रिश्वत लिए।

अस्थाना का नाम तब भी चर्चा में रहा था जब सीबीआई ने संदेसरा बंधु के स्वामित्व वाली गुजरात की फार्मास्युटिकल कंपनी- स्टर्लिंग बायोटेक के परिसर से एक डायरी बरामद की थी। उस वक्त संदेसरा बंधु बैंकों को 5,000 करोड़ रुपये चूना लगाने के मामले में फरार थे। अस्थाना 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाए जाने की घटना की जांच करने वाले अधिकारियों में भी रहे हैं।

टीवी- फिल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत ने जब ‘आत्महत्या’ कर ली, उसके बाद बॉलीवुड के लोगों के खिलाफ नशीले पदार्थों को लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने जांच की थी। अस्थाना ही उस वक्त एनसीबी प्रमुख थे। यह भी महत्वपूर्ण  है कि पेगासस प्रोजेक्ट ने यह भी बताया है कि अस्थाना की उस वक्त जासूसी की गई जब वह सीबीआई में थे।

पुलिस में वरिष्ठ पदों पर रहे कई अधिकारी भी अस्थाना की इस तरह नियुक्ति को अस्वाभाविक मानते हैं। मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त और पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक जूलियो रिबेरो तो साफ कहते हैं कि किसी गैर-एजीएमयूटी कैडर अधिकारी को दिल्ली पुलिस आयुक्त बनाना और वह भी उसके रिटायरमेंट से महज चार दिनों पहले बहुत- बहुत अस्वाभाविक है। निश्चित तौर पर यह राजनीतिक निर्णय है।

पुलिस सुधारों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी के प्रमुख रहे और यूपी तथा असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह, अजयराज शर्मा की नियुक्ति का उल्लेख तो करते हैं लेकिन यह भी कहते हैं कि ऐसे पद पर किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति जिसकी सेवानिवृत्ति की अवधि छह महीने से कम हो, के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश संदेहास्पद विषय हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि दिल्ली केंद्र शासित क्षेत्र है और तकनीकी तौर पर कहें, तो ये दिशा निर्देश राज्यों के लिए थे इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मसले पर आदेश देना होगा।

प्रकाश सिंह ने कहा कि मैं उम्मीद कर रहा हूं कि अस्थाना की नियुक्ति से प्रभावित हुए किसी एजीएमयूटी कैडर अधिकारी को स्पष्टीकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का साहस दिखाना होगा।

 डॉ. मीरा चड्ढा बोरवांकर को भी अस्थाना की नियुक्ति से आश्चर्य हुआ है। वह पुणे की पूर्व पुलिस आयुक्त और ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की पूर्व महानिदेशक हैं। वह कहती हैं कि अस्थाना की नियुक्ति इस वजह से की गई हो सकती है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निकट हैं। मैं भी उन्हें जानती हूं लेकिन यह तो है ही कि उनकी नियुक्ति एजीएमयूटी कैडर के अफसरों को निश्चित तौर पर हतोत्साहित करेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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