Tuesday, October 19, 2021

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अमेरिकी राष्ट्रपति के कटाक्ष को भी अपनी तारीफ मान रहा है बेशर्म भारतीय मीडिया

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पहली बार द्विपक्षीय बातचीत के दौरान चुटकी लेते हुए मजाकिया अंदाज में भारतीय मीडिया की जो ‘तारीफ की है, वह दरअसल भारतीय मीडिया के चाल, चेहरे और चरित्र पर बेहद गंभीर टिप्पणी है। बाइडेन ने व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत के दौरान कहा कि अमेरिकी मीडिया की तुलना में भारतीय मीडिया का व्यवहार कहीं ज्यादा बेहतर है।

बाइडेन ने यह तंज भरी टिप्पणी मीडिया की मौजूदगी में मोदी से बातचीत शुरू करने से पहले की। उनके कहने का सीधा मतलब था कि हमारे देश के मीडिया की तुलना में आपका मीडिया कहीं ज्यादा आज्ञाकारी और स्वामिभक्त है, जबकि अमेरिकी मीडिया खूब सवाल पूछता है, जो असहज करने वाले होते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी न सिर्फ भारतीय मीडिया की रसातल में जा चुकी साख और विश्वसनीयता की ओर इशारा करती है बल्कि उसे अपने गिरेबां में झांकने की नसीहत भी देती है।

लेकिन भारतीय मीडिया की बेशर्मी और मक्कारी भरी मासूमियत देखिए! वह अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी में छिपे कटाक्ष को या तो समझ नहीं रहा है या न समझने का नाटक कर रहा है। वह कूल्हे मटकाते हुए बाइडेन की टिप्पणी को अपनी तारीफ के तौर पर पेश करते हुए चहक रहा है, जश्न मना रहा है। उसका ऐसा करना भी इस बात की तसदीक करता है कि वह पूरी तरह बदचलन हो चुका है।

बाइडेन की टिप्पणी फौरी तौर पर तो मीडिया को लेकर ही की गई लगती है, लेकिन इसी टिप्पणी में प्रधानमंत्री मोदी पर भी कटाक्ष छिपा हुआ है, जिनकी सरकार ने या तो मीडिया को उसके मुंह में विज्ञापन ठूंस-ठूंस कर या डंडे के जोर पर उसे अपना पालतू बना रखा है- इतना पालतू कि मीडिया प्रधानमंत्री से किसी भी मसले पर कभी कोई सवाल ही नहीं करता। मीडिया का जो हिस्सा सवाल पूछने का साहस रखता है, वह भी सवाल नहीं कर सकता, क्योंकि प्रधानमंत्री कभी मीडिया से मुखातिब होते ही नहीं हैं।

बहरहाल मीडिया समझे या न समझे पर हल्के-फुल्के अंदाज में किए गए बाइडेन के इस कटाक्ष का मर्म मोदी निश्चित ही समझ गए होंगे, क्योंकि वे खुद भी कॉरपोरेट नियंत्रित भारतीय मीडिया की इस चारित्रिक दुर्बलता को 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भांप चुके थे और यह भी समझ चुके थे कि इस मीडिया को कैसे नाथना है। उन्होंने उस समय विभिन्न टीवी चैनलों को दिए इंटरव्यू के दौरान ही नहीं बल्कि अपनी कई चुनावी रैलियों में भी मीडिया के प्रति आक्रामक रवैया अपनाते हुए बिकाऊ, न्यूज ट्रेडर्स, दलाल आदि विशेषणों से नवाजा था।

एक तरह से मीडिया पर दबाव बनाने का यह मोदी का अपना अंदाज था, जिसमें वे पूरी तरह कामयाब भी रहे। अधिकांश मीडिया घराने हवा का रुख भांपते हुए चुनाव के दौरान ही उनके आगे समर्पण कर चुके थे। उस दौरान जो थोड़े से मीडिया समूह अपनी कमर को जरा सीधे रखे हुए थे, वे भी चुनाव के बाद कीर्तन करने लगे। मीडिया के प्रति मोदी की तल्खी भी प्रधानमंत्री बनते ही खत्म हो गई और वे मौके-मौके पर मीडिया की भूमिका की सराहना करने लगे।
बहरहाल यही कहा जा सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय मीडिया और सरकार के साथ उसके रिश्तों पर कटाक्ष करके दोनों को ही आईना दिखाया है। यह और बात है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणी का भारत के कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया और भारत सरकार पर कोई सकारात्मक असर होने वाला नहीं है।
(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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