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आंदोलन से मोदी सरकार ‘नरम-गरम’ क्यों? जानिए असली वजह

केंद्र सरकार ‘गरम’ है। आंदोलनकारी किसानों से बातचीत को ‘होल्ड’ कर दिया है। अब बातचीत तब तक नहीं होगी जब तक कि आंदोलनकारी किसान ‘गरम’ हो चुकी मोदी सरकार को ‘नरम’ न कर दे। तभी बातचीत के लिए अगली तारीख मिलेगी। 10वें दौर की बातचीत में तीनों कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक होल्ड पर डालने का प्रस्ताव केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने दिया था। तब माना गया था कि केंद्र सरकार आंदोलनकारियों के प्रति ‘नरम’ है।

‘नरम’ से ‘गरम’ होने में नरेंद्र मोदी सरकार को बस दो दिन लगे। खुद ‘नरम’ दिखी, खुद ही ‘गरम’ भी दिखने लग गई। इस बदले हुए रुख से आंदोलनकारी हैरत में पड़ गए। पांच घंटे की बातचीत में महज 34 मिनट बात हो सकी। आंदोलनकारी नेताओं को साढ़े तीन घंटे विज्ञान भवन में इंतज़ार कराया गया। यह सब केंद्र की ओर से ‘सख्त रुख’ का संकेत देने के लिए था- ऐसा मीडिया में शोर है।

चौंकाते हैं सरकार के बदले हुए तेवर
20 जनवरी से 22 जनवरी आते-आते यानी 10वें दौर की बातचीत से 11वें दौर की बातचीत के दौरान केंद्र सरकार का मिजाज बिल्कुल बदल गया। मोदी सरकार के ये बदले हुए तेवर चौंकाते हैं। सरकार के तेवर बहुत कुछ दिल्ली के मौसम की तरह नज़र आते हैं जो क्षण भर में बदल जाता है। वैसे दिल्ली का अपना कोई मौसम नहीं होता। यह हिमाचल से लेकर कश्मीर तक बर्फीली हवाओं के चलने या पंजाब-हरियाणा में पराली के जलने भर से बदल जाता है।

पहले कानूनों को होल्ड करने की बात और फिर वार्ता को होल्ड पर डालने की बात कहकर केंद्र सरकार ने होल्ड की जो ड्रिबलिंग (हॉकी की भाषा) की है उससे वार्ता का विषय यानी गेंद से नज़र ही हट गई है। ऐसे में वास्तव में गेंद किस पाले में है यह दोनों में से किसी पक्ष को दिख नहीं रहा है। दर्शक जरूर देख पा रहे हैं कि गेंद ड्रिबलिंग करने वाली केंद्र सरकार के लिए ‘आत्मघाती गोल’ की वजह बन सकती है।


क्या है ‘डबल होल्ड’ के मायने
यह समझना जरूरी है कि ‘डबल होल्ड’ के मायने क्या हैं। कृषि कानूनों को होल्ड करने से क्या किसानों की मांग पूरी हो जाती है? इस होल्ड से तो उल्टा केंद्र सरकार खुद के लिए वक्त पैदा कर रही है। अब तक आंदोलन के कारण दो महीने का वक्त बीत चुका है। केंद्र सरकार फैसला नहीं ले पाई। अब आगे भी वह फैसला लेने के मूड में नहीं है। इसलिए डेढ साल तक कानून को होल्ड करने के प्रस्ताव के साथ सामने आ गई है। उस पर आरोप ये है कि आंदोलनकारी इस नरम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

बीजेपी की रणनीति डेढ़ साल के दौरान होने वाले चुनावों पर भी है। 11 राज्यों में चुनाव होने हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। इनमें से सात राज्यों में बीजेपी की सरकार है। बाकी राज्य हैं पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी। किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी को यूपी में बड़ा नुकसान हो सकता है। तो क्या कानूनों को होल्ड करने का प्रस्ताव इसी नुकसान से बचने के लिए है? और, इन प्रस्तावों को मान लेने या फिर अगली बातचीत को होल्ड कर लेने का गरम रुख क्या इसीलिए है?

गेंद किसके पाले में?
केंद्र सरकार की ‘डबल होल्ड’ रणनीति के बाद सबका ध्यान अब इसी बात पर है कि गेंद किसके पाले में है और कौन गोल करने में कामयाब होता है। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकालने और परेड करने की घोषणा कर रखी है। ऐसे में उस दिन टकराव की स्थिति क्या रूप लेती है उसके अनुसार ही केंद्र सरकार अगला कदम उठाना चाहती है।

11वें दौर की बातचीत में 10वें दौर में दिए गए प्रस्तावों को मान लेने की शर्त आंदोलनकारी किसान नेताओं के सामने आई है। अब अगले दौर यानी 12वें दौर की बातचीत (जो होल्ड पर है) की शर्त है कि 11वें दौर की बातचीत में रखी शर्त को आंदोलनकारी मानें। फर्क यह है कि 11वें दौर की वार्ता करने पहुंचे किसान नेताओं को शर्त का पता नहीं था, लेकिन अब उन्हें मालूम है कि अगली वार्ता तभी होगी जब 11वें दौर में रखी गयी शर्त वे मान लेंगे। इसे ही कहा जा रहा है कि गेंद अब ‘आंदोलनकारियों के पाले’ में है।

इस अर्थ में गेंद हमेशा आंदोलनकारियों के पाले में रही है कि आंदोलन खत्म करके किसान अपने-अपने घरों को चले जाएं। सवाल यह है कि आए ही क्यों वे आंदोलन करने! गेंद के इस पाले में या उस पाले में होने का सवाल ही पैदा नहीं होता!

कौन बदलेगा माहौल?
आंदोलनकारियों से अगली बातचीत वैसे भी 26 जनवरी के बाद ही संभव थी। 23 तारीख को सुभाष चंद्र बोस की जयंती, 24 को शनिवार, 25 को रविवार और 26 को गणतंत्र दिवस है। लगातार छुट्टियों वाले हैं ये दिन। नेता भी वार्ता आदि से दूर रहना चाह रहे थे। संभवत: वे गणतंत्र दिवस की तैयारियों में भी जुटे रहना चाहते हों, लेकिन, अगर केंद्र सरकार आंदोलनकारी किसानों को भी गणतंत्र दिवस से जोड़ने की पहल करती, सद्भाव दिखलाती तो क्या किसान इनकार कर पाते? इससे जो माहौल बदलता वह गतिरोध को दूर करने वाला हो सकता था।

केंद्र सरकार के नरम-गरम वाले ताजा रुख के बाद आंदोलनकारी किसानों ने भी आंदोलन को तेज करने का फैसला किया है। अब किसानों के सामने अपने कार्यक्रमों को सफल बनाना आंदोलन की सफलता की शर्त बन चुका है। ऐसे में गणतंत्र दिवस का दिन किसान और सरकार के बीच ज़ोर-आजमाइश का दिन बनता दिख रहा है। यह कह पाना मुश्किल है कि 26 जनवरी के बाद माहौल वार्ता के कितना अनुकूल रह जाता है।

(प्रोफेसर प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार और टीवी पैनलिस्ट हैं।)

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This post was last modified on January 23, 2021 4:42 pm

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