मीरा-भाईंदर में सेना के नहीं लोकल दादागीरी के पैर उखड़े हैं

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इस साल फरवरी में बीएमसी (ब्रह्न्न मुंबई कार्पोरेशन) चुनाव नतीजों के ठीक अगले दिन, मुंबई की एक लोकल ट्रेन में, कुछ सब्जी वाले स्थानीय मुंबईकरों और भय्यों यानी मराठियों और हिंदी बोलने वालों के बीच होने वाली तू-तू–मैं-मैं का मैंने राजनीतिक विश्लेषण करते हुए सोशल मीडिया में एक पोस्ट लिखी थी, जो करीब-करीब वायरल हो गयी थी। इस पोस्ट में मैंने यही दर्शाने की कोशिश की थी कि कैसे भाजपा के लोकल उभार के बाद सामाजिक वर्चस्व के स्थानीय समीकरण बदल रहे हैं। इसमें मैंने यह भी भविष्यवाणी की थी कि शीघ्र ही होने जा रहे मीरा-भाईंदर महानगरपालिका चुनावों में भी भाजपा बहुमत के साथ जीतेगी और कल यही हुआ।

भाजपा को 61, शिवसेना को 22

मीरा-भाईंदर की 95 सीटों में से भाजपा ने अकेले अपने दम पर 61 सीटें जीतकर शिवसेना के खेमे में हडकंप मचा दिया है। शिवसेना इस बेहद प्रतिष्ठा की लड़ाई में 22 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही जबकि कांग्रेस को केवल 10 और 10 सालों तक उसकी सहयोगी रही नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी तथा मुंबई को कंपकंपाने का दावा करने वाले एमएनएस या महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना (राज ठाकरे) को तो एक भी सीट नहीं मिली।

शिवसेना के लिए यह वाकई बड़ा झटका है। दरअसल मुंबई के इस उपनगर के लोगों को बस कागजी तौर पर ही यह याद रखना पड़ता है कि वे मुंबईवासी नहीं बल्कि इसके उपनगर मीरा रोड या भाईंदर के निवासी हैं, जो मिलकर मीरा-भाईंदर शहर बनाते हैं, नहीं तो कभी यह पता नहीं चलता की मीरा रोड मुंबई से अलग है।

शिवसेना के लिए यह वाकई बड़ा झटका है। दरअसल मुंबई के इस उपनगर के लोगों को बस कागजी तौर पर ही यह याद रखना पड़ता है कि वे मुंबईवासी नहीं बल्कि इसके उपनगर मीरा रोड या भाईंदर के निवासी हैं, जो मिलकर मीरा-भाईंदर शहर बनाते हैं, नहीं तो कभी यह पता नहीं चलता की मीरा रोड मुंबई से अलग है।

झूठा हाइप

…और अगर मुंबई है तो वह शिवसेना की है उसने ऐसा मनोविज्ञान बना दिया है। यह कोई अपने आप नहीं बन गया बल्कि शिवसेना ने खुद कोशिश करके इस किस्म का मानसिक माहौल बनाया है। वह अपने बारे में हमेशा हाइप क्रियेट करके रखती है। मीरा-भाईंदर चुनाव के नतीजों पर अगर लोग इस तरह की हैरानी दिखा रहे हैं तो वास्तव में शिवसेना का यही हाइप है। शिवसेना ने मीडिया और किसी हद तक राजनीतिक गलियारे में लोगों के दिलो-दिमाग में यह भर दिया था कि मीरा-भाईंदर महानगर पालिका में तो वही चुनाव जीतने जा रही है। हालाँकि वह पहले से यहाँ कोई अकेले सत्ता में नहीं थी, न ही लीड कर रही थी। संख्या में अब के पहले भी भाजपा ही आगे थी और महानगर पालिका में उनके गठबंधन का ही प्रशासन था। लेकिन संख्या में छोटी होकर भी अगर वह अपने बारे में इस किस्म का माहौल बना पाने में सफल रहती है तो इसके पीछे स्थानिक आक्रमकता में उसका एकछत्र वर्चस्व होना है।

मराठावाद के नाम पर

शिवसेना खुद को मराठावाद की प्रवर्तक और बिना किसी आधार के मराठी अस्मिता की ठेकेदार समझती है। वास्तव में उसके इसी मनोविज्ञान को मीरा-भाईंदर में पटखनी मिली है। हालांकि पांच साल पहले 2012 में जब मीरा-भाईंदर महानगर पालिका में चुनाव हुए थे तब भी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ही थी। उसे तब 31 सीटें मिली थीं और शिवसेना को 16 लेकिन शिवसेना का रवैया हमेशा बड़े भाई वाला था। तकनीकी रूप से मुंबई में अपना मेयर बनाकर और  ठाणे नगर निगम में चुनावी सफलता हासिल करके तो शिवसेना मानकर ही चल रही थी कि मीरा-भाईंदर महानगर पालिका उसकी जेब में है। इस बार दोनों में यानी भाजपा और सेना में गठबंधन नहीं था। इस पर शिवसेना पूरे समय इसी सोच के साथ व्यवहार कर रही थी की महानगर पालिका में तो उसी का कब्जा होना है। यहाँ तक कि चुनाव नतीजे आने के पहले ही मेयर पद की आंतरिक लड़ाई भी शुरू हो गयी थी। सवाल है सेना के इस मजबूत विश्वास को निर्णायक रूप से झटका किसने दिया? स्वाभाविक रूप से भाजपा यही कहेगी उनके मुख्यमंत्री का दिन-रात एक कर देना और भाजपा के स्थानीय आमदार नरेंद्र मेहता का सचमुच इलाके के विकास के लिए बहुत काम करना।

स्थानीय दादागीरी की हार

ऐसा नहीं है कि इन दो बातों का कोई महत्व नहीं है। ये बातें भी महत्वपूर्ण भूमिका में रही हैं लेकिन जिस एक बात ने शिवसेना को निर्णायक झटका दिया है वह है उसकी लोकल दादागीरी। हो सकता है शिवसेना वाले इसे न स्वीकारें लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक फायदे के लिए मराठियों और गैर-मराठियों के बीच इतना जबर्दस्त सामाजिक बंटवारा कर दिया है कि अब चाहकर भी यह बंटवारा रातो-रात खत्म नहीं हो सकता। मीरा रोड और भाईंदर जिनसे मिलकर करीब 17 लाख आबादी वाला यह शहर यानी मीरा-भाईंदर बनता है, में बड़ी तादाद बाहरी लोगों की है। यहाँ करीब 45% से ज्यादा लोग बाहरी हैं और 70% से ज्यादा हिंदी भाषी। बाहरी लोगों में पूर्वी-उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और बिहार के लोग क्रमशः सबसे ज्यादा हैं। यहाँ बड़ी तादाद में गुजराती भी हैं, जिनमें भले 90% मराठी भी बोल लेते हों लेकिन स्थानीय मराठी लोग उन्हें बाहरी ही मानते हैं, इस मानने में सबसे बड़ी भूमिका शिवसेना की है।

शिवसेना ने सालों से स्थानीय दादागीरी का जो माहौल बनाया है वह चाहकर भी अब न तो उसके कार्यकर्ताओं की भाव-भंगिमाओं से बाहर निकल पाता है और न ही उसके बड़े नेताओं की बॉडी लैंग्वेज से। मीरा-भाईंदर में जनगणना के हिसाब से 70 फीसदी लोग पूरी तरह से हिंदी-भाषी हैं जबकि व्यवहारिक सच्चाई यह है कि करीब करीब 99% लोग हिंदी भाषी हैं इसके बाद भी शिवसेना बार-बार यह क़ानून लाने की कोशिश करती है कि ऑटो का लाइसेंस सिर्फ उसे मिलेगा जो मराठी भाषी होगा। स्थानीय नौकरियों में उसके दबाव के चलते 90% मराठियों को रखा जाता है। यहाँ की हर पांचवी-छठवी सोसायटी में शिवसेना का ऑफिस है, लेकिन कोई छोटा बच्चा भी समझ सकता है कि ये ऑफिस उसने खरीदे नहीं हैं, बिल्डर को डरकर देना पड़ता है। अभी गणपति का त्योहार शुरू हो गया है, अब शिवसेना के कार्यकर्ता टोली बनाकर निकल जायेंगे और नींबू-धनिया बेचने वाले तक को भी 500 रुपये की पर्ची पकड़ा देंगे फिर वह चाहे अपनी बदहाली का जितना रोना रोये। 

दरअसल इसी सब दादागीरी ने शिवसेना को पटखनी दी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)

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