लोकतंत्र शक्ति के दंभ या दंभ की शक्ति पर नहीं, सहयोग की संभावना पर जिंदा रहता है

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आज-कल भारत में शक्ति की बहुत चर्चा है। सामने आम चुनाव है। लोकतंत्र में चुनाव शक्ति संयोजन का अवसर होता है। चुनावी राजनीति में इतनी हलचल के पीछे शक्ति का ही तो खेल होता है। सभी राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर अपनी-अपनी क्षमताओं का उपयोग शक्ति पाने के लिए ही तो करते हैं! लेकिन शक्ति का खेल केवल चुनाव से सीमित नहीं होता है। जीवन में क्रिया का महत्व होता है। जब तक सांस है, तब क्रिया है। निष्क्रियता भी क्रिया है। निष्क्रियता को क्रिया शून्यता नहीं कहा जा सकता है। निष्क्रियता को अधिक-से-अधिक क्रिया की सुषुप्तावस्था कहा जा सकता है। क्रिया बिना शक्ति के संभव नहीं हो सकती है। तो जितनी तरह की क्रियाएं होती हैं, उतनी ही तरह की शक्तियां भी होती हैं। थोड़ा ठहर कर और थोड़ा समझकर शक्ति के संदर्भों पर बात करना जरूरी होता है।

संबंध कोई भी हो उस में किसी-न-किसी क्रिया का संदर्भ होता ही है। सारे संबंध शक्ति संबंध होते हैं। असल में सभ्यता विमर्श के मूल में शक्ति विमर्श ही होता है! एक बात यहीं टांक रखना जरूरी है। एक मामले में अपनी शक्ति को वह दूसरे मामले में भी लगा देता है, क्योंकि शक्ति ऐसा करने का अवसर बना देती है। जो अभिनय में, खोल आदि में सशक्त होता है, उसे राजनीति में भी शक्ति-सम्मान मिलता है। जो राजनीति में सशक्त होता है, वह कला, साहित्य, विज्ञान, अर्थशासस्त्र आदि से संबंधित सभी विषयों पर ज्ञान देने की शक्ति रखता है।

भारत में शक्ति ‘हस्तांतरणीय’ होती है। सब से बड़ी शक्ति तो पैसा होता है! इसीलिए तो पैसा के लिए इतनी मारा-मारी होती है। लोग कहते भी हैं, ‘बाप बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुप्पैया’। हरि अनंत, हरि कथा अनंता की तरह कहा जा सकता है कि शक्ति का रूप अनंत, शक्ति की कथा अनंत। बहुत हल्के तौर पर, लगभग ठिठोली की तरह कहा जाता है कि स्त्री का सौंदर्य उसकी शक्ति होती है और पुरुष की शक्ति उस का सौंदर्य होता है।

विद्वान लोग कहते हैं कि तर्क में अपनी शक्ति होती है। समझदार लोग यह जानते हैं कि शक्ति का अपना तर्क होता है। शक्ति का संबंध संतोष से भी होता है। शक्ति का संबंध न्याय से भी होता है। देवता अपनी शक्तियों के कारण पूजे जाते हैं। नेता अपनी शक्तियों के कारण पूछे जाते हैं। लोकतंत्र में देवता बन गये नेता पूजे भी जाते हैं और पूछे भी जाते हैं। भारत के लोकतंत्र में आज बड़ा जबरदस्त और खौफनाक सवाल यह है कि इस में कोई नेता देवता बन कैसे जाता है जबकि नागरिक इंसानी जिंदगी के लिए तबाह क्यों रहा करता है।

प्रसंगवश, हालांकि बहुत दिन बाद उन्होंने नकार दिया था, अटल विहारी बाजपेयी ने इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहा था। वह उतना ही आपत्तिजनक होना चाहिए था जितना आपत्तिजनक नरेंद्र मोदी को ‘विष्णु का अवतार’ कहा जाना है। इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहे जाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं की, लेकिन नरेंद्र मोदी को ‘विष्णु का अवतार’ कहे जाने पर कई लोग आपत्ति करते हैं। इस के कई कारण हैं। एक कारण तो यह है कि इंदिरा गांधी को विपक्ष के नेता ने ‘दुर्गा’ कहा था। नरेंद्र मोदी को उनके समर्थक ‘विष्णु का अवतार’ कहते हैं। इंदिरा गांधी ने अपने किसी हावभाव से कभी अपने को ‘दुर्गा’ न माना, न मनवाने की कोशिश की; नरेंद्र मोदी अपने हावभाव में लगातार अपने को ‘विष्णु का अवतार’ मनवाने की प्रतीति करवाते रहते हैं, लगता है खुद भी ऐसा ही मानने लगे हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए दोनों प्रसंग अपमानजनक ही हैं।

प्रकृति की शक्ति पर भी बात की जा सकती है, विज्ञान की शक्ति पर भी की जा सकती है। लेकिन यहां व्यक्ति की शक्ति पर बात करना अधिक जरूरी है। अकेला व्यक्ति बहुत कमजोर स्थिति में होता है। इस कमजोरी पर काबू पाने के लिए समूह बना, फिर समाज, फिर राज आदि। ‘योद्धा’ राजा बना गया और राजतंत्र की व्यवस्था शुरू हुई। ‘योद्धा’ में दूसरे व्यक्तियों की तुलना में युद्ध और संघर्ष की शारीरिक शक्ति उस ‎ में अधिक होती थी। अधिक होती थी, लेकिन पर्याप्त नहीं होती थी। राजा को “पर्याप्त शक्ति” की जरूरत थी।

महाभारत के प्रारंभ में ही संजय ने धृतराष्ट्र को शक्ति के ‘पर्याप्त-अपर्याप्त’ होने की सूचना दी, ‎‎“अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्⁠। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं ‎भीमाभिरक्षितम्⁠।⁠।” यहां पर्याप्त का अर्थ सीमित और अपर्याप्त का अर्थ असीमित ‎है। अभी पर्याप्त का अर्थ न कम, न ज्यादा, जरूरत भर होता है। पर्याप्त शक्ति के लिए वफादार, निष्ठावान व्यक्तियों की जरूरत राजा को हुई तो वफादारी, निष्ठा आदि नैतिक मूल्य बन गये! पर्याप्त और अपर्याप्त में संतुलन कायम करते-करते एक दिन राजतंत्र खुद असंतुलन का शिकार होकर गिर गया। राज्य व्यवस्था में संतुलन के लिए अकुलाते हुए मनुष्य ने लोकतंत्र का रास्ता अख्तियार किया।

लोकतांत्रिक नेता जब अपने को ‘बुनियादी रूप से समान लोगों के समूह में से ही एक या अगला’ होने से कुछ अधिक और इतर मानने लगे तो लोकतंत्र असंतुलन का शिकार हो जाता है। असंतुलन का शिकार लोकतंत्र अपने भीतर तानाशाह को छिपाये रखता है। लोकतंत्र का केवल ढांचा रह जाता है, समय पर चुनाव होते रहते हैं लेकिन लोकतंत्र कहां! लोकतंत्र के लिए चुनाव जरूरी है, लेकिन समय पर चुनाव का होना लोकतंत्र के होने की गारंटी नहीं है। चुनाव लोकतंत्र की प्रक्रिया है, परिणाम नहीं।

आज-कल चुनावी मौसम में तरह-तरह की गारंटियां दी जा रही है, फिर भी कोई लोकतंत्र की गारंटी नहीं दे रहा है। तरह-तरह से सुख-सुविधा, छूट-छपाट की बात हो रही है, इस-उस की गारंटी की बात हो रही है। बस लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की सतत और निर्बाध उपलब्धता की गारंटी कोई नहीं दे रहा है। महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन के दौरान क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को ‘फेल ‎होनेवाले बैंक का “पोस्ट-डेटेड चेक” कहा था। ‎दी जा रही सभी गारंटियों को ‘फेल ‎होनेवाले बैंक का “पोस्ट-डेटेड चेक”‎ ही समझना चाहिए।

लोकतंत्र में नेता की शक्ति उसकी व्यक्तिगत या वैयक्तिक शक्ति नहीं होती है। वह प्रातिनिधिक शक्ति होती है। अन्य उम्मीदवारों की तुलना में विश्वास योग्यता या ऐसे ही आधारों पर मिले मतदाताओं के मत से उसे संवैधानिक पद पर नियुक्ति की आधिकारिकता (Entitlement) से क्षमता प्राप्त होती है। शपथ ग्रहण एवं अन्य औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद संवैधानिक पद पर आसीन होने से संवैधानिक शक्ति मिलती है। यह शक्ति पद से मिलती है। पद और कद में निकट का संबंध होता है। लोकतंत्र में पद से बहुत बड़ा कद का होना कई बार अशुभ को आमंत्रित करता है। कई बार पद से कद का बहुत छोटा होना पद की गरिमा में गिरावट का कारण बन जाता है।

शक्ति को समझना जरूरी है। शक्ति दूसरों को अपनी इच्छा से कुछ भी करने से रोकने और खुद पर दूसरों की इच्छा को थोपने से रोकने में दिखती है। सवाल यह है कि लोकतंत्र में दूसरा कौन होता है! सभी तो अपने ही होते हैं। लोकतंत्र में संविधान की इच्छा और कानून की सहमति ही सर्वोपरि होती है। संविधान और कानून की सहमति के इतर या विरुद्ध कुछ भी करना पद का दुरुपयोग होता है। कई बार पद का आपराधिक दुरुपयोग भी होता है। आम नागरिक का संविधान और कानून की सहमति के इतर या विरुद्ध कुछ भी करना गैर-कानूनी और आपराधिक होता है। इन सब के इलाजों के समुचित प्रावधानों की व्यवस्था संविधान में होता है।

मनुष्य निर्मित ‎ होने के कारण संविधान हो या कानूनी प्रावधान हों, इन्हें यांत्रिकता की यातनाओं से यथासंभव मुक्त रखा जाता है, कम-से-कम ऐसी अपेक्षा की जाती है। वैश्विक मानदंडों की अनुकूलता में संवैधानिक प्रावधानों में मानवीय लचक और लोच का सम्मान रहता है। ‎‘दुष्ट शक्ति’ इस ‎‘लोच और लचक’‎ का दुरुपयोग करती रहती है। इसी ‎‘लोच और लचक’‎ ‎के दुरुपयोग से लोकतंत्र की व्यथा कथा शुरू होती है। उदाहरण के लिए कम-से-कम एक प्रसंग का उल्लेख जरूरी लग रहा है। भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति को इस ‎‘लोच और लचक’‎ के कारण आघात लगता रहता है।

व्यक्ति की कोई भी इच्छा संविधान के बाहर जायज नहीं हो सकती है। हां, अपनी इच्छाओं को संविधान की इच्छाओं में शामिल करवा लेने के लिए आग्रह और आंदोलन का अधिकार आम नागरिकों के पास होता है। सरकार चलाने वाले स्वयं-सक्षम जनप्रतिनिधियों के पास भी संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए अपनी इच्छाओं को संविधान की इच्छाओं में शामिल करने का अधिकार तो होता ही है। अपनी-अपनी इच्छाओं को संविधान में शामिल करवाने, करने की इस प्रक्रिया में वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों और घरेलू स्थितियों का महत्व स्वयं-सिद्ध है। शक्ति की साधना में पहली समस्या अपनी इच्छा को पहचानना, इच्छाओं की चढ़ा-उतरी में प्राथमिकताओं के क्रम-निर्धारण का भी महत्व कम नहीं होता है। इच्छाओं के ज्ञान के बाद तदनुसार क्रिया और आचरण का मामला तो अपनी जगह है ही। कहने का आशय यह है कि शक्ति हासिल करने का इच्छा, ज्ञान और क्रिया से बहुत गहरा संबंध होता है।

इस समय आम चुनाव का माहौल है। तरह-तरह से शक्ति प्रदर्शन करने और शक्ति विमर्श करने का दौर है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और सत्ता से बाहर के राजनीतिक दल के नेतागण इस में लगे हुए हैं। आगे और अधिक जोरदार ढंग से इस काम में लगेंगे। जोर आजमाइश संवैधानिक परिसर और परिधि से बाहर न निकल जाये इसलिए केंद्रीय चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन पर कड़ी नजर रखेगा, यह आयोग का संवैधानिक दायित्व है। न रखे तो संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में अक्षम होने के जनमत का सामना करेगा। लोकतंत्र का प्राथमिक और आत्यंतिक हित-ग्राहक आम नागरिक, मतदाता और देशवासी होते हैं। वे क्या करेंगे!

यह ठीक है कि कुछ न करना भी कुछ करना होता है। जब तक जिंदा हैं, क्रिया करते रहते हैं; चाहे ऐच्छिक क्रिया हो अनैच्छिक क्रिया। बिना शक्ति के क्रिया नहीं, क्रिया नहीं तो जीवन नहीं। इसलिए जरूरी है इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, क्रिया-शक्ति और क्रय-शक्ति भी। इतनी बड़ी बेरोजगारी, उफनती हुई महंगाई, उर्ध्वमुखी व्यय, निम्नमुखी आय, बचत-खपत दोनों में गिरावट, सामाजिक अन्याय, संस्थागत और नीतिगत भ्रष्टाचार, लटपटिया पूंजीवाद (Crony Capitalism) आशंकित ‘दे चंदा, ले धंधा’ (Quid Pro Quo), पेपर लीक, अग्निवीर और अगिया वेताल, तरह-तरह के उन्माद और झूठी गारंटियों का रौरव, छीजती क्रय-शक्ति के दबाव से निःशक्त मतदाताओं में कहां बचती है, “इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, क्रिया-शक्ति”! बचना है तो, बचाना होगा लोकतंत्र! लोकतंत्र को बचाने के लिए हर हाल में जोगाये रखना होगा “इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति, क्रिया-शक्ति” को‎!

बाद की बात बाद में। फिलहाल झूठ लबर-फांस से बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष, अभय, दबाव एवं पूर्वाग्रह मुक्त मन-मस्तिष्क के हौसले और हुलास को संजोकर, शोर में शांति के साथ लोकतांत्रिक पर्व में शामिल होना नागरिक कर्तव्य है। देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करनेवाले पुरखों का सम्मान करने के लिए लोकतंत्र के प्रति अपना-अपना नागरिक कर्तव्य निभाने के लिए अधिक-से-अधिक संख्या में सही-सही अपना-अपना मतदान करना जरूरी है। ध्यान रहे, लोकतंत्र शक्ति के दंभ या दंभ की शक्ति पर नहीं, ‎सहयोग की संभावना पर जिंदा रहता ‎है। लोकतंत्र में चुनाव अपनी ही संभावनाओं का शक्ति-पर्व होता है। सावधान रहना है कि लोकतंत्र के शक्ति पर्व का प्रसाद ‎‘दुष्ट शक्ति’ किसी भी तरह की युक्ति-प्रयुक्ति से उड़ा न ले जाये!

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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