‘रोटी-रोजी छीन भूखा मारने से अच्छा गला ही काट लेते’

Estimated read time 2 min read

प्रयागराज के झूंसी वर्कशॉप में खड़ी 119 सिटी बसें इतनी बढ़िया कंडीशन्स में हैं कि चाभी घुमाते ही स्टार्ट हो जाती हैं। बॉडी, शीशा, इंजन सब एकदम चकाचक। लेकिन प्रयागराज आरटीओ का डंडा चला और सभी बसों के चक्के थम गये। इन बसों के साथ ही इन पर काम करने वाले लगभग 400 ड्राइवर, कंडक्टर और 200 मेंटिनेंस वर्कर्स के हाथों से रोजी-रोटी छीन ली गयी।

पिछले 47 दिनों से लगातार ‘योगी बाबा काम दो’, ‘मोदी जी हमारी रोटी-रोजी मत छीनों’ की रट लगाये हुए ये लोग भूखे प्यासे झूंसी वर्कशॉप में बैठे हुये हैं। बारिश ओला सब झेलते हुए। होली पर जब देश रंग गुलाल और गुझिया की मिठास में सराबोर था तब भी ये लोग भूखे पेट बेरंग चेहरा लिये यहां बैठे रहे।

इनके घर परिवारों में भी होली पर काम छीने जाने का मातम पसरा रहा। पांच कर्मचारी 24 घंटे भूख प्यासे अनशन पर रहते हैं। फिर 14 घंटे दूसरे 5 लोग उनकी जगह ले लेते हैं। पिछले डेढ़ महीने से यही रूटीन चला आ रहा है।    

अपनी पीड़ा बयां करते हुए कंडक्टर रविपाल सिंह रो पड़ते हैं- “पूरा साल बर्बाद हो गया। फ़ीस न दे पाने के कारण बेटे को बीएससी की परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया। उसे कॉलेज से बाहर कर दिया गया।” गीली आंखों और टूटे मन से रविपाल बताते हैं कि “पिछले 47 दिनों से हम लोग धरने पर बैठे हैं। जेब में फूटी कौड़ी नहीं है। सरकार न काम दे रही है न वेतन। अब सपरिवार आत्महत्या कर लेने के सिवा और कोई चारा नहीं नज़र आता”।

एक और कर्मचारी अपनी पीड़ा बताते हुए भावुक हो जाते हैं। वो बताते हैं कि बेटे-बेटी की आवाज़ अभी तक कानों में गूंज रही है। यहां रोटी-रोजी की मांग लेकर बैठने के बाद ही उन्होंने वीबी बच्चों को वापस गांव भेज दिया। बेटे-बेटी रो रहे थे, कह रहे थे, उन्हें यहीं पढ़ना है, इलाहाबाद शहर में। लेकिन क्या करता, दो महीने से कमरे का किराया नहीं दिया है।

आंदोलन पर सिटी बस के कर्मचारी

वो बताते हैं कि “दूधवाले, राशन वाले सबकी उधारी बढ़ती जा रही है। काम काज छूट गया है। कौन नहीं चाहता कि वीबी बच्चे साथ रहें, बच्चों को शहर की बढ़िया शिक्षा मिले। लेकिन जब रोटी-रोजी का ही कोई ठिकाना नहीं है, क्या करता, सबको भेज दिया”।  

एक अन्य कर्मचारी अमित कुमार बताते हैं कि एडमिशन का समय है। बच्चों की परीक्षा होने और रिजल्ट आने के बाद अगली कक्षा में उनका एडमिशन होना है। तीन महीने की फीस और कॉपी किताब सब लेना है। कई महीनों से न काम मिल रहा है न वेतन। कहां से, कैसे, क्या करके बच्चों का एडमिशन करायें, कैसे पढ़ायें, कैसे घर चलायें, कुछ समझ नहीं आ रहा है। अमित बताते हैं कि कभी इतना वेतन भी नहीं मिला कि कुछ बचाकर हारे-गाढ़े वक़्त के लिए बचाकर रखते।

कर्मचारी पवन कुमार सिंह बताते हैं कि घरों में अनाज है तो तेल, सब्जी, दाल नहीं है। बच्चों को भी आधे पेट खिला रहे हैं। कई दिनों से तो केवल खिचड़ी खिलाकर बच्चों को जिला रहे हैं। कई बार बच्चे बिना खाये सो जाते हैं।

रमेश चंद्र निषाद वर्कशॉप में मिस्त्री हैं। भूख और तड़प उनकी आंखों से साफ झलकती है। भूखे पेट की मरोड़ दबाते हुये वो बताते हैं कि “दो महीने से सिटी बसें बंद होने से वर्कशॉप में भी काम बंद हो गया है जिसके चलते उनके बच्चों के सामने भुखमरी के हालात पैदा हो गये हैं।” 55 साल के रमेशचंद्र कहते हैं कि अब इस उम्र में कहां जायें।

मेंटिनेंस वर्कर रमेश चंद्र निषाद

डायबिटीज और हाई बल्ड प्रेशर से जूझते बृजेश भारतीया को अब भुखमरी से भी जूझना पड़ रहा है। न उनके पास अपनी ज़रूरी दवाओं के लिए पैसा है, न परिवार का पेट भरने के लिए नून-तेल-लकड़ी जुटाने का।

सिटी बस के ड्राइवर बृजेश अपनी बेबसी का इज़हार करते हुए बताते हैं कि ” मैं घर का इकलौता कमाने वाला हूं। मेरे पास न तो पुश्तैनी खेत ज़मीन है न कोई मजबूत आर्थिक आधार। न ही कोई दूसरा वैकल्पिक साधन। मेरे चार बच्चे हैं। परिवार में माता पिता और वीबी है। काम बंद होने से जीवन संकटमय हो गया है”।

वो अपनी पीड़ा सुनाते हुए कहते हैं कि “13-14 साल से यहीं पर काम करते आ रहे हैं। कानपुर, लखनऊ, बनारस सब जगह यही बसें चल रही हैं, अभी यहां क्यों बंद कर दी गयीं। इससे हम लोगों की माली हालत खराब हो गयी है”।

आदित्य कुमार यादव अपने गुस्से का इज़हार करते हुए कहते हैं कि योगी बाबा दावा करते हैं हर साल एक लाख नौकरी देने का और उनसे उनकी 13 साल की नौकरी छीन ले रहे हैं। कंडक्टर लवकुश जेब में पड़े पिता की दवाई का पर्चा दिखाते हुए बताते हैं कि उनके पिता के लीवर में इन्फेक्शन और सीने में सूजन है। 27 तारीख को किसी तरह डॉक्टर को दिखा तो दिया लेकिन अब दवा नहीं ख़रीद पा रहा क्योंकि न जेब में पैसा है न दुकान पर क्रेडिट।

वो बताते हैं कि उनके पिता की हालत इतनी खराब है कि वो अपने से चल फिर तक नहीं पाते हैं, लेकिन पिता को असहाय बीमारी से कलझते देखने के सिवाय और कोई चारा नहीं है। काम छूटने के बाद बच्चों के भूखे सोने से लेकर पिता का कलझना तक सब सहना पड़ रहा है।

कंडक्टर लवकुश अपने पिता की दवा की पर्ची दिखाते हुए

ड्राइवर रणजीत जायसवाल कहते हैं कि धरने पर बैठे हर साथी के साथ समस्या है। क्योंकि सब साधारण परिवारों से आते हैं। जब पैसा न आएगा तो न तो घर का ख़र्चा चल पाता है, न बच्चों की पढ़ाई सही हो पाती है। न तो आदमी कायदे से खा पी पाएगा, न बच्चों को पढ़ा पाएगा, न दवा इलाज करवा पाएगा। भूखे मरने के अलावा। वो आरोप लगाते हैं कि न विभाग वाले कोई सूचना दिये न नोटिस यकायक फिटनेस रोककर गाड़ियों को खड़ा करवा दिया। 

इन लोगों को परिवहन निगम में क्यों समायोजित नहीं किया जा रहा

विकास कुमार मिश्रा सिटी बस में ड्राइवर हैं। वो बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के सात महानगरों में केंद्र सरकार की योजना के तहत सिटी बसें चलायी गयी थीं। इसमें आगरा, वाराणसी, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, प्रयागराज शामिल थे। हर जगह संचालन बहाल है केवल प्रयागराज में ही संचालन बंद कर दिया गया है।

विकास बताते हैं कि वो लोग परिवहन निगम के कर्मचारी थे और जब साल 2009 में सिटी बस सेवा शुरू हुई तो उन लोगों का ट्रांसफर सिटी बस में कर दिया गया। कर्मचारी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम में वापस जाना चाहते हैं लेकिन निगम यह कहकर वापस नहीं ले रहा है कि आप मेरे कर्मचारी नहीं हो।

जबकि पिछले 13-14 सालों से अब तक सिटी बस के कंडक्टर और ड्राइवर का वेतन परिवहन निगम ही अदा करता आया है। जिन सिटी बसों को वो लोग 12-13 सालों से चलाते आ रहे हैं उन पर भी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम लिखा हुआ है। 

ड्राइवर विकास कुमार मिश्र बस में उत्तर प्रदेश परिवहन निगम लिखा दिखाते हुए

कंडक्टर आदित्य कुमार यादव कहते हैं कि साल 2009 में जब सिटी बस का संचालन शुरू हुआ उसके साथ ही यूपीएसआरटीसी के अंतर्गत कर्मचारियों की भर्ती हुयी। लेकिन फिटनेस के अभाव में गाड़ियां खड़ी कर दी गयीं और कर्मचारियों को भी निकाल दिया गया। रोटी रोजी के लाले पड़ गये। 45-50 साल सबकी उम्र हो गयी है। 12-13 साल यहां देने के बाद अब कहां जायें काम मांगने।

आदित्य व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि आज ये लोग कह रहे हैं गाड़ियों का फिटनेस नहीं हो पा रहा है आप लोग घर जाइए। 120 बसों के खड़े होने से 400 ड्राइवर-कंडक्टर और लगभग 150-200 मेंटिनेस वर्कर के परिवार प्रभावित हो रहे हैं।  

सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेस लिमिटेड में शोषणकारी व्यवस्था

साल 2009 में सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड प्रयागराज की स्थापना के समय इसे संचालित किये जाने हेतु उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के ड्राइवर और कंडक्टरों को इसमें ट्रांसफर किया गया था। जिन्हें कार्य और वेतन देने की जिम्मेदारी सिटी ट्रांसपोर्ट सिर्विसेज लिमिटेड प्रयागराज के साथ साथ उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की भी है। यदि सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड प्रयागराज में कार्य नहीं मिल रहा है तो उन्हें तुरन्त ही उत्तर प्रदेश परिवहन निगम में समायोजित किया जाना चाहिए।

गौरतलब कि सिटी बसों के कंडक्टर और ड्राइवर उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के अधीन संविदा पर साल 2008-2015 के दौरान नौकरी पर रखे गये। इन कर्मचारियों को तीन महीने पहले तक 2.25 रुपये प्रति किलोमीटर की दर से भुगतान किया जाता रहा है। इसके अलावा उन्हें हर माह 22 हाजिरी और 2800 किलोमीटर पर 2000 रुपये की प्रोत्साहन राशि तथा 25 हाजिरी और 3000 किलोमीटर पर 2500 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती रही है। मोटी-मोटी हर महीने ये कर्मचारी 12-14 हजार रुपये कमा लेते थे।

डिपो में खड़ी सिटी बसें

इसके अलावा इन्हें किसी भी समाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जाती थी। यहां तक कि हर साल 533 रुपये वेतन से काटने के बाद इन कर्मचारियों को कंडीशनल एक्सीडेंटल इंश्योरेंस दिया जाता था। कंडीशनल का आशय यह है कि केवल नौकरी पर होने के दौरान अगर एक्सीडेंट होता है तभी एक्सीडेंटल इंश्योरेंस का लाभ मिलेगा।

क्या नये सिरे से इलेक्ट्रिक बसें और सीएनजी बसें आने के बाद आप लोगों को काम पर रखा जाएगा। इस सवाल के जवाब में कर्मचारी बताते हैं कि यही आश्वासन तो उन्हें नहीं दिया जा रहा है। कर्मचारी बताते हैं कि अब जो नये सिरे से सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसें आएंगी वो थर्ड पार्टी के अंतर्गत आएंगी। परिवहन निगम के अंतर्गत नहीं।

कर्मचारी बताते हैं कि उन लोगों से कहा गया है कि जिन लोगों के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट में 80% अंक होंगे और ट्रिपल सी यानि ‘CCC’ की डिग्री होगी केवल उन्हें ही और बिल्कुल नये सिरे से रखा जायेगा। यानि जो अब तक उन लोगों ने 12-13 साल सेवायें सिटी बस में दी हैं वो काउंट नहीं होगा।    

कर्मचारी आक्रोश व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जाहिर है जो अर्हता रखी गयी है उसे वो लोग पूरा नहीं कर सकते। एक तरह से उन लोगों को छांटने के उद्देश्य से ही यह क़दम उठाया गया है। कर्मचारी कहते हैं कि अब उन्हें कहां काम मिलेगा। वो लोग विभाग, व्यवस्था और सत्ता की हठधर्मिता के शिकार हुए हैं। वो लोग यहां रोज़गार के लिए बैठे हैं, हड़ताल पर नहीं। 

वहीं मेंटिनेंस कर्मचारी थर्ड पार्टी के अंतर्गत श्यामा श्याम कंपनी के ठेका अन्तर्गत काम करते आ रहे हैं। बसें खड़ी होने के बाद उनके पास भी अब कोई काम नहीं है। जबकि मेंटिनेंस में भी 150-200 लोग काम करते रहे हैं। ये लोग मेंटिनेंस, बॉडी, इंजन, लाइट, मोबिल ऑयल आदि से जुड़े सभी मेंटिनेंस का काम करते हैं। इन लोगों को भी प्रति किलोमीटर की दर से पैसा दिया जाता है। इन लोगों के पास 15 फरवरी को सिटी बसों के चक्के थमने के बाद से कोई काम नहीं है।

क्रमिक अनशन पर कर्मचारी

स्क्रैपिंग नीति के मापदंड के अनुसार बाकी है इन बसों की उम्र

केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने जो स्क्रैपिंग नीति लागू की है उसके तहत 15 साल चल चुकीं सभी गाड़ियों को रिटायर करके कबाड़ में बदल दिया जाएगा। लेकिन जिन 119 सिटी बसों को मेंटिनेंस देने से इन्कार करके खड़ा कर दिया गया है वो बसें अभी केवल 12 साल ही चली हैं। फिर इन बसों को रिटायर करने का क्या तुक बनता है ये नहीं समझ आ रहा।

आन्दोलनरत कर्मचारी आरटीओ प्रयागराज की हठधर्मिता पर सवाल खड़े करते हुए कहते हैं कि शहर की सड़कों पर हजारों ऑटो और निजी बसें बिल्कुल धुंआ उड़ाती शहर को प्रदूषित करते हुए चल रही हैं। लेकिन उनसे आरटीओ की अवैध कमाई होती है इसलिए 15 साल क्या 18 साल पुरानी निजी बसों और ऑटो आदि पर कभी उनकी नज़र नहीं जाती। कार्रवाई के नाम पर वो सभी दिशा-निर्देश, नियम-कायदा पूरा कर रही परिवहन निगम की बसों को ही बलि का बकरा बनाते हैं। 

ग़रीब लोग मारे जाएंगे

सिटी बस शहर की लाइफ लाइन है। कर्मचारी बताते हैं कि सिटी बस के अंतर्गत साल 2021 से ही 100 इलेक्ट्रिक और सीएनजी बसें संचालित हो रही हैं। लेकिन डीजल से चलने वाली सिटी बसों और सीएनजी व इलेक्ट्रिक बैटरी से चलने वाली सिटी बसों के किराये में बहुत भारी अंतर है। दूसरी बात गैर-डीजल से चलने वाली सिटों बसों में एमएसटी और मासिक पास भी अलाऊ नहीं है।

इलाहाबाद उच्च शिक्षा और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की कोचिंग का हब है। यहां आस पास और दूर दराज के गावों से रोज़ाना हजारों बच्चे कोचिंग करने और तमाम यूनिवर्सिटी कॉलेजों में पढ़ने आते हैं। लेकिन डीजल से चलने वाली सिटी बसों के बंद होने के बाद हजारों छात्रों ने कोचिंग छोड़ दिया है।

शहर में काम करने रोज़ाना हजारों लाखों मज़दूर व निम्न वर्ग के लोग सिटी बस से आते जाते रहे हैं। रेहड़ी पटरी पर जीने खाने वाले लोग आते हैं। महंगी निजी बसों और ऑटो से तो वो रोज़ाना नहीं आ जा सकते। तो सिटी बसों के संचालन से उनका भी काम काज और जीवन प्रभावित हुआ है।

सिटी बस कर्मचारियों का विरोध जुलूस

सबके पास गये लेकिन किसी ने नहीं सुनी इनकी पीड़ा

47 दिन से भूखे प्यासे धरना दे रहे सिटी बस कर्मचारी, प्रशासन से लेकर शासन तक, सांसद-विधायक से लेकर मंत्री, परिवहन मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री सबके पास कई, कई बार गये। लेकिन कहीं से भी उन्हें उम्मीद नहीं मिली, छीनी हुयी रोटी रोजी वापस नहीं मिली।

समाजवादी पार्टी के स्नातक एमएलसी मानसिंह यादव इस मामले को विधान परिषद भी मामला उठा चुके हैं लेकिन यूपी सरकार के कानों में जूं नहीं रेंगी। सिटी बस कर्मचारी योगी दरबार में दो बार अपनी पीड़ा लेकर जा चुके हैं, उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या के पास भी ये लोग गये। राज्य परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह से तो 3 बार मिल चुके हैं लेकिन कोरे आश्वासनों के झांसे के सिवाय और कुछ नहीं मिला।

कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को भी ये लोग ज्ञापन दे चुके हैं। यूपी के मंत्री नंदगोपाल नंदी, महापौर अभिलाषा गुप्ता नंदी, राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह, इलाहाबाद की सांसद रीता बहुगुणा जोशी, फूलपुर की सांसद केसरी देवी पटेल, कौशाम्बी के सांसद विनोद सोनकर, सपा विधायक संदीप पटेल, बीजेपी विधायक प्रवीण पटेल और हर्षवर्धन वाजपेयी से भी मिलकर अपना दुखड़ा सुना चुके हैं।

आदित्य कुमार कहते हैं कि कुल मिलाकर थाने और एसडीएम से लेकर डीएम व सत्तादारी दल के सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री सबके कानों तक अपनी आवाज़ वो लोग पहुंचा चुके हैं लेकिन इनकी सारी सदायें उनके कानों से टकरा टकराकर वापस लौट आ रही हैं।   

वर्कशॉप कर्मचारी संघ ने लिखा पत्र

सेन्ट्रल रीजनल वर्कशॉप कर्मचारी संघ उत्तर प्रदेश ने भी इस आशय से एक पत्र भारत सरकार, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश,  प्रयागराज आयुक्त, सिटी ट्रांसपोर्ट के अध्यक्ष और प्रबन्धक तथा प्रबन्ध निदेशक उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम को लिखा है। पत्र में लिखा है कि यह हालात अचानक नहीं उपजा है। बल्कि सभी सक्षम स्तर के संज्ञान में था। लेकिन प्रबंध तंत्र ने समय रहते उचित क़दम नहीं उठाया। जिसके चलने यह हालात पैदा हुआ।

क्रमिक अनशन पर आंदोलनकारी

गौरतलब है कि सम्भागीय परिवहन प्राधिकरण ने कई महीने पहले जिले में सीएनजी नीति लागू की है। जिसके तहत पीसीटीएसएल की डीजल संचालित नगर बसों को सीएनजी संचालित नगर बसों से प्रतिस्थापित करने हेतु निश्चित समय सीमा का निर्धारण किया गया है। निर्धारित समय सीमा से यह कार्य न होने पर सम्भागीय परिवहन प्राधिकरण प्रयागराज ने अपनी विभिन्न बैठकों में लगातार प्रतिस्थापन का निर्देश देते हुए कई बार समय सीमा का विस्तार भी किया। किन्तु पीसीटीसीएल ने समय रहते सार्थक कार्यवाही नहीं की।

नतीजा यह हुआ कि सम्भागीय परिवहन विभाग प्रयागराज ने 13 मई 2022 की बैठक की संकल्प संख्या एक में इन बसों के प्रतिस्थापन कराने हेतु पुनः कोई समय सीमा न बढ़ाये जाने का निर्णय लिया गया। जिसके बाद से पीसीटीएसएल की डीजल बसों का सम्भागीय परिवहन विभाग ने फिटनेस प्रमाण पत्र ज़ारी नहीं किया। जिसके कारण बसें संचालित नहीं हो पा रही हैं और न ही सीएनजी बसों का कोई इंतजाम किया गया है। जिससे कारण सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड प्रयागराज कार्मिकों को कार्य व वेतन न मिलने से भयावह स्थिति पैदा हो गयी है।

(प्रयागराज से सुशील मानव की रिपोर्ट)     

You May Also Like

More From Author

+ There are no comments

Add yours