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सीबीआई: साख पर सवाल

जनचौक ब्यूरो

यह कहानी मेरी नहीं है। ई-अख़बारों के कतरन से बटोरी गयी कहानियों से बनी इस कहानी को कहने का सिर्फ़ तरीक़ा अपना है। मगर इस कहानी का पात्र हमारा सिस्टम, हमारा क़ानून, हमारी नैतिकता और हम-आप सब हैं। इन्हीं पात्रों में से एक पात्र वह सीबीआई भी है,जहां आजकल संविधान-व्यवस्था और राजनीति का हड़कंप मचा हुआ है। यह कहानी इसी आम हड़कंप को रौशनी देती एक ख़ास कहानी है।

तेइस बरस पहले की बात है। साल था उन्नीस सौ पचानव्वे। तारीख़ थी 28 अगस्त। यानी देश का स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने वाली तारीख़ के ठीक 13 दिनों बाद की तारीख़। इस तारीख़ के दो सप्ताह पहले ही लाल क़िले के प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण हुआ था,जिसमें कई वादों के साथ महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार के मज़बूत इरादों की बात भी हुई थी।बहुत हद तक आज ही की तरह इस इरादे की गूंज़ दीवारों के बीच रहने वाली महिलाओं की बड़ी आबादी तक नहीं पहुंच पायी होगी,मगर दीवारों के बाहर मर्दानगी में ताल ठोकते मर्दों के कानों तक इस इरादे की बात,एक सर्राते झोंके की मानिंद गुज़र गयी होगी। पढ़ी लिखी महिलाओं को इस भाषण से आज ही की तरह एक ताक़त ज़रूर मिली होगी कि महिलाओं को लेकर कुछ बदलाव तो ज़रूर होंगे, मगर पंद्रह अगस्त के ठीक तेरह दिनों बाद हरियाणा के यमुनानगर में हुई एक हिला देने वाली वारदात ने शहर में खलबली मचा दी थी ।

अट्ठाइस अगस्त उन्नीस सौ पचानव्वे को यमुनानगर के रेलवे वर्कशॉप ट्रैक के पास एक गंदे नाले से मक्खियों के झुंड के बीच एक बजबजाती बोरी मिली थी। इसमें मरी हुई एक बच्ची ठूंसी हुई थी। शव की मेडिकल जांच करायी गयी।पता चला कि बच्ची की हत्या से पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। पुलिस जांच में जिन आरोपियों के नाम सामने आये थे,उनमें एक नाम था-रवि चौधरी-वह तत्कालीन केन्द्रीय वन एवं राजस्व मंत्री शेर सिंह का बेटा था। राजनीतिक रसूखदार के बेटे का नाम सामने आते ही हरियाणा सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल देने की पुरज़ोर कोशिश की थी। इस ख़बर को देश के बाक़ी हिस्सों ने भी पढ़ा-सुना। उस समय टेलीविज़न का दौर तो था नहीं कि ख़बरें ‘तान दी जातीं’,लेकिन उस हांफती ख़बर में तत्कालीन विपक्ष ने सड़क पर उतरकर इतनी जान ज़रूर डाल दी थी कि सरकार को मामला उसी सीबीआई के हवाले कर देना पड़ा, जिसका नाम लेकर राजनीति करने वाले भी पाक़-साफ़ न्याय की क़समें खाते रहे हैं,देश के नागरिक भी इन्हीं क़समों के भ्रम में सीबीआई के ज़रिये न्याय होने और न्याय पाने की दुहाई देते रहते हैं।

यह कहानी राजनीति के हाथ में खेलने वाली उसी सीबीआई की क़ायम की गयी साख़ का अफ़सासना या फ़साना-सा दिखता है,जिसमें  आजकल घमासान मचा हुआ है। इस घमासान में भीड़ में बदल दिये गये और अपने ही हितों के ख़िलाफ़ कर दिये गये आम नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा भी सरकार की तरफ़दारी में दिखता है। ।यह अफ़साना या फ़साना यह दर्शाता है कि सरकार का चाहे रंग जो भी हो,राजनीतिक-आर्थिक रसूख़ का रंग कभी बदलता नहीं।यह रंग,राजनीतिक पक्ष या विपक्ष में भेद बनकर नहीं उतरता,यह जाति,धर्म और यहां तक कि अधिकांश मामलों में समर्थक-विरोधियों तक में भी भेद नहीं करता। यह रसूख़ उन्नाव कांड में जितना वीभत्स नज़र आया था, उतनी ही कंपकपाहट इस कहानी में भी पैदा कर दी थी।

बहरहाल,सिस्टम से चलाये जाने वाली इस कहानी को आगे बढ़ाते हुए-सीबीआई इस मामले  की अपनी ही शैली में बरसों तक जांच करती रही। आरोपी बनाये गये चार लोगों में से एक आरोपी अचानक लापता हो गया।वह कभी नहीं मिल पाया।जहां छोटे से राज्य की पुलिस भी आरोपी को धर दबोच लेती है। यहां सीबीआई उस आरोपी के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं जुटा पायी,जिसका पता-ठिकाना सब कुछ पूरे शहर को मालूम था।  माना गया कि ख़ुलासे की आशंका से उस लापता आरोपी की भी हत्या करा दी गयी होगी। राजनीतिक रसूखदार चौधरी शेर सिंह का बेटा चौधरी रवि सिंह को भी गिरफ़्तार नहीं किया जा सका। धीरे-धीरे यह मामला सीबीआई की न्याय के दरवाज़े तक ले जाती सफल जांच करने वाली छद्म छवि की जकड़ में आता गया,जानबूझकर बरती गयी लापरवाही से मामले पर वक्त की धूल जमती गयी,शहर की यादों से भी यह मामला उतरता गया। सीबीआई के ज़रिये ‘टाइम इंटरवल’ का रसूखदार पिता ने एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया। आख़िरकार पुत्रमोह जीत गया ।पीड़ित परिवार ने भी अपने आप को समझा लिया कि बेटी किसी काल की शिकार हो गयी। मगर पीड़ित का ‘टाइम इंटरवल’ से समझा हुआ मन,आरोपी की जीत-जश्न और सीबीआई की राजनीतिक-आर्थिक रसूखदारी से बनायी गयी बारीक साख-तीनों को वारदात के बाइस साल गुज़र जाने के बाद पिछले साल आठ अक्टूबर को उस समय झटका लगा,जब चौधरी शेर सिंह की बेटी गीता चौधरी मीडिया के सामने आयीं,उनके एक-एक शब्द से उस कांड की ‘टाइम इंटरवल’ तले दबा दी गयी सचाई से धूल की परतें चिंदी-चिंदी होती गयीं, सिस्टम के धागे से सीबीआई द्वारा बुनी गयी उस कहानी की सियन भी एक-एककर उघड़ती गयी।

चौंकाती कहानी,गीता की ज़ुबानी

आरोपी रवि चौधरी की बहन गीता चौधरी ने कहा कि इस मामले को राजनैतिक दबाव के चलते ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। गीता ने उसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था-इसके लिए पुलिस,सीबीआई और जजों को करोड़ों रुपये दिए गए थे। अपने पिता के बारे में गीता चौधरी ने बताया कि उसके पिता को पुत्रमोह था और वह अपने बेटे को बचाने की ख़ातिर  किसी भी हद तक जा सकते थे और वो उस हद तक चले भी गये,जिसकी ज़द में उन्होंने पुलिस सहित जजों और सीबीआई तक को ख़रीद लिया था। गीता ने कहा था कि आरोपी चार लोगों को बनाया गया था,जिसमें उनका भाई चौधरी रवि सिंह, बुआ का लड़का सुनील गुप्ता (मुख्य आरोपी) और सिब्बी नामक युवक था। ऊपर जिस आरोपी के ग़ायब होने की बात कही गयी है,वह यही सुनील गुप्ता था।मगर गीता चौधरी के बयान देने तक एक भी आरोपी अरेस्ट नहीं हो पाया था।

आख़िर दो दशक बाद ही क्यों खुली ज़ुबान

लगभग दो दशक बाद गीता चौधरी ने आख़िर अपने ही भाई और पिता की सचाई सामने लाते हुए न सिर्फ़ अपने मंत्री पिता के ज़रिये राजनीतिक रसूख को बेपर्द कर दिया,बल्कि रसूख के हाथों सिस्टम के हथियार बनते पुलिस,जज और सीबीआई के चेहरे से भी साख की नक़ाब उतार दी। मगर,इस क़दम को उठाने में गीता चौधरी को बाइस बरस क्यों लगे ? इस सवाल का जवाब उसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में गीता चौधरी ने देते हुए कहा था-मेरी बेटी बड़ी हो गयी है,अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर जब-तब चिंतित होती रहती हूं, तो बलात्कार की शिकार हुई उस लड़की के परिवार की पीड़ा मुझे सालने लगती है।उस ज़ुल्म की बर्बरता का अहसास बेचैन करने लगता है। इस बेचैनी ने कुछ समय से मेरे भीतर हाहाकार मचा दिया था और मुझे लगा कि इससे मुक्ति का एक ही मार्ग है-सबके सामने पूरी हक़ीक़त को खोलकर रख दूं। गीता चौधरी आख़िरकार पीड़ित परिवार के पक्ष में खड़ी हो गयी।

सियासत,लोकतांत्रिक संस्थायें और लोकतंत्र का कॉमेडी ऑफ़ एरर

यह जांच-पड़ताल की उस्ताद माने जाने वाली सीबीआई के स्याह चरित्र पर रौशनी डालती एक ऐसी प्रतिनिधि कथा है,जिसका लेखक आम तौर पर राजनीतिक और आर्थिक रुप से कोई रसूखदार ही होता है,उसकी पटकथा ऐसी धुंधली शैली में लिखवायी जाती है,जिसे पढ़-समझ पाने की कुव्वत सिर्फ़ उन्हीं कथा-पटकथा लेखकों की होती है।आम लोग तो सिर्फ़ कहानी सुनते-पढ़ते हैं। मगर सीबीआई की इस अबूझ कथा-पटकथा पर सवाल उठाते हुए गीता चौधरी ने एक बरस पहले रौशन हुए अपने मानवीय अहसास में इस कहानी को पूरी साफ़गोयी के साथ कह डाला था,वह सीबीआई की साख़ को न सिर्फ़ बेपर्द करती है,बल्कि उस पूरी व्यवस्था को भी नंगा खड़ा कर देती है।

जब कभी बात सीबीआई,जजों और पुलिस की हो,तो इस कहानी को याद रखने की ज़रूरत है,क्योंकि यह कहानी लोकतंत्र के शीशे में दिखता एक ऐसा नज़ीर है,जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं के बेज़ा इस्तेमाल किये जाने की गंदी सूरत हमें याद दिलाती रहेगी कि सत्ता आम तौर पर नागरिक के ख़िलाफ़ होती है और सत्ता की हरक़तों पर नागरिकों की निगेहबानी ज़रूरी है। वर्ना राजनीतिक-आर्थिक रसूख की ऊंगलियों पर नाचती सीबीआई जैसी संस्थाओं की ‘कॉमेडी ऑफ़ एरर’ रोज़-रोज़ दिखती रहेगी।

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This post was last modified on December 3, 2018 7:56 am

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