धीमी आवाज पर कान हो हाथ में वोटर कार्ड हो कि यह मुल्क हम सब का ‎है

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पूरी दुनिया भारत के लोकतंत्र के भविष्य पर भारत के निर्णय का बेकरारी से इंतजार कर रहा है। सब की नजर हिंदी पट्टी में भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति की ताकत और ध्रुवीकरण की मंशा पर लगी हुई है। जनादेश को जनता के न्याय का इंतजार है। यह वक्त मांगने का नहीं, देने का है, देकर जान बचाने का है। दे कर फंसने का नहीं है। किस को देने से जान फंसेगी, किस को देने से जान बचेगी यह समझने का है। सोच-समझकर वोट देने का वक्त है।

इतिहास की गलियों से, भविष्य के आकाश से, कर्कश वर्तमान के नजारों से आ रही है, धीमी-धीमी पुकार, उठो भारत। सामने संघर्ष है। पेट में भूख को ममोड़कर सपनों का मजा लेने का वक्त नहीं है। आंख खोलकर सपनों की लुटी हुई गठरी संभालने का वक्त है। आंख खोलकर देखने और मुंह खोलकर बोलने का समय है। नींद और मौत के फर्क को समझने का यही वक्त है। जागो, उठो, देखो, समझो, बोलो कुछ करो भारत! हमारा लोकतंत्र जनादेश की प्रतीक्षा में है। उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सभी दिशाओं में जनादेश का हाहाकार और जयजयकार का स्वर सघन, अधिक सघन होता जा रहा है। त्रिकाल की छाती पर कान धरकर सुनने का समय है। दैन्य हमारा भाग्य नहीं है। ‎पलायन हमारा पथ नहीं है।‎

ध्रुवीकरणों की बनाई जड़ता की कठिन जकड़न टूट रही है। विकलताओं और विफलताओं के विलाप का वक्त नहीं है यह, सामर्थ्य की सफलताओं से संलाप का समय है। समय के शोर में छिपे सुर को ताल देने का वक्त है। समस्या के समाने समाधान के लिए ताल ठोकने का वक्त है। मतपेटियों के दहाड़ने का वक्त है। भारत वैचारिक उथल-पुथल और राजनीतिक उबाल के दौर से गुजर रहा है। इस उथल-पुथल और उबाल के उत्ताप और उत्पीड़न को समझने का दौर है।

उत्तर-दक्षिण हो या पूर्व-पश्चिम चतुर्दिक बीच दुष्ट रेखाएं बिछाई जा रही हैं। जिन कई राजनीतिक नेताओं की भाव-भंगिमा भरोसा दिलाती रही है, वे भी इस या उस तर्क से दुष्ट रेखाओं के इधर-उधर हो रहे हैं। ‘इधर-उधर’ करनेवालों के दुष्ट इरादों के प्रति अपनी समझ और सहानुभूति के साथ हर पल ‘स्वाभाविक सावधानी’ बरतने की जरूरत है। वैज्ञानिक नियम है, क्रिया की प्रतिक्रिया का अटूट सिलसिला जीवन में जारी रहता है। यह वैज्ञानिक नियम राजनीतिक परिदृश्य पर भी लागू होता है। जब से इलेक्ट्रॉल बांड के जरिये भारतीय जनता पार्टी के नवकुबेर बनने की क्रिया का रहस्य सामने आया, ऐसा लगता है कि तब से कई सत्ताकांक्षी लोगों के मन के अंदर ‎‘लोभ-लाभ’ की तीव्र प्रतिक्रियाएं होने लगी है। इलेक्ट्रॉल बांड में दिख रहे भ्रष्टाचार से लड़ने के बदले लपकने की प्रवृत्ति तो ‘अर्थशास्त्री’ की समझ में अधिक आती है।

राजनीति लगातार धर्म और इतिहास की प्रतिशोधी व्याख्याएं कर रही है। लोकलुभावन राजनीति और की मनचली भ्रष्ट सत्ता आकांक्षा ने ज्ञान-संकाय को तहस-नहस कर दिया। यह सब होता रहा और बुद्धिजीवियों की ‘वेतनजीवी जमात’ अपने मन की हलचल को पूरी ताकत के साथ मन के भीतर सात तालों में बंद कर दिया है। यह ‘जमात’ मनगढ़ंत और जुबानी ज्ञान पर एक अंगुली उठाने के बदले, पांचों अंगुलियों को जोड़कर सिर झुकाये पंच ग्रास करती रही है। थाली को बिखरने से बचाने के लिए थाली बजानेवालों की भीड़ के पीछे जा लगी। बालबच्चेदार बुद्धिजीवियों का दल इस समय नव-वर्चस्वशाली लोगों से मिलते-जुलते रहने की सुख-सुविधा के जुगाड़ में लगा हुआ है।

यह कोई बिल्कुल नई बात नहीं है। आजादी के आंदोलन के दौरान कुछ वर्चस्वशाली भोगविलासी लोगों को लगता था कि जिन अंग्रेजों के राज में सूरज नहीं डूबता है, उन अंग्रेजों का राज भारत में हमेशा बना रहेगा। ऐसे लोगों को आजादी के आंदोलन का कोई सवाल कभी परेशान करता था! इसे सवाल की तरह पेश किया जा सकता है और वर्णन की तरह पढ़ा जा सकता है। इधर बालबच्चेदार वेतनजीवी बुद्धिजीवियों की मुसीबत ‎और मुश्किल की एक और कहानी है। हालांकि, इधर-उधर होने और करनेवाले अर्थशास्त्री नहीं बतायेंगे। हां, कोई सच्चा अर्थशास्त्री निश्चित ही बेहतर बता सकता है। ‎यहां तो बस इशारा ही किया जा सकता है।

1990 के बाद वैश्विक राजनीति और राष्ट्रीय अर्थनीति में रणनीतिक बदलाव आया। भारत में नया उपभोक्ता बाजार दैत्याकार विस्तार लेने लगा। बाजार की सर्वग्रासी भूख बहुत तेजी से बढ़ने लगी। इस भूख के मिटाये जाने को लुटोन्मुखी विकासवादी अर्थनीति की जरूरत बनाकर पेश किया गया। इस जरूरत को पूरा करने के लिए मध्य वर्ग को तैयार किया जाना ही बेहतर विकल्प लगा। नियमित आय स्रोतवाले मध्य वर्ग की हालत बहुत पतली थी। कृत्रिम जरूरतों को पैदा किया गया। इन कृत्रिम जरूरतों को पूरा करने में मध्य वर्ग को सक्षम बनाने के लिए बेखौफ लोन बाजार खोल दिया गया।

यह लोन बाजार बहुत बेखौफ था। मध्य वर्ग के घर में आक्रामक उपभोक्ता बाजार की वस्तुओं की तेजी से घुसपैठ होने लगी। इस प्रक्रिया में घर तो भर गया, लेकिन नियमित आय का बहुत बड़ा हिस्सा ऋण-शोध में लगने लगा। घर में आनेवाली रकम लगातार कम होती चली गई। कट-पिटकर घर में ‎आनेवाली कटप्पा रकम की रूई तकिया में बहुत कम हो गई। बालबच्चेदार वेतनजीवी बुद्धिजीवियों की गरदन कांटों से भर गई। हिलना-डुलना मुश्किल, एकदम मुश्किल! इन परिस्थितियों में संपूर्ण ज्ञान-संकाय तहस-नहस होता चला गया उस जमात ने कोई वास्तविक चुनौती नहीं दी! लेकिन चुनौती दी गई! चुनौती देनेवाले कम नहीं रहे, हां नाकाफी जरूर रहे। भारतीय तर्कवादी और महाराष्ट्र के लेखक डॉ नरेंद्र दाभोलकर (हत्या 20 अगस्त 2013) और पत्रकार गौरी लंकेश (हत्या 05 सितंबर 2017) को तो चुनौती की कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी!

कुछ ही दिनों में, देश की आबादी का बड़ा इलाका बाजार में घुसने के काबिल नहीं रह गया। अधिकतर लोगों के हाथ पैसा आता ही नहीं था। जिनके हाथ ‘कटप्पा पैसा’ आता था, वह घर टिकता ही नहीं था। बाजार की तरफ मुंह करे इसके पहले हाथ का पैसा गर्म तवे पर पड़नेवाले पानी के फुहारे की तरह छन्न से छन्नाक्क! छछनता हुआ मध्य वर्ग बाजार की रौनक लौटाने में अक्षम और यथा-स्थिति का रक्षक बन गया। मध्य वर्ग मन की ‘प्रतिशोधक शांति’ के लिए नये-नये और अजब-गजब शब्द-दृश्य का शरणागत होने लगा।

कुल मिलाकर ऑपटिक्स ज्यादा और ऑप्शन कम; करप्शन ज्यादा और करेक्सन कम! टाइट गवरमेंट और लूज गवर्नेंन्स! जिस के अंदर बस चाहिए, चाहिए ही चाहिए, और चाहिए, और चहिए की चाह बढ़ती जाये उस के ‘गुलाम’ बनते क्या देर लगती है! किसी को वश में करना हो तो, उस के अंदर असीम चाह भर देना सब से कारगर उपाय होता है। ऋण फांस में फंसा लेना सब से करामाती तरकीब होती है। रहीम कह गये हैं, जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे साहन के साह! मतलब साफ है, समझने में तकलीफ नहीं होनी चाहिए कि जिनको सब कुछ चाहिए वे क्या हो जाते हैं! महात्मा गांधी याद आते हैं! समझ में न आया कि क्यों कहते थे, अपनी जरूरतों को कम करना आजाद जिंदगी की जरूरत होती है।

देश के लोगों की वर्तमान दुर्दशा न एक दिन में हुई, न किसी एक कारण से हुई है। जो समझदार ‘करदाता’ देश की अनपढ़ और नासमझ पचकेजिया लोगों पर जवाबदेही का बोझ डालकर मोदीमुखी हो रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि यह देश गरीबों के खून की तासीर से बना और बचा हुआ है। जिस दिन इस सूखते हुए खून में उबाल आयेगा, पता नहीं क्या होगा। खैर! विभिन्न विश्वविद्यालयों, चिंतन शिविरों के साथ बुद्धिजीवियों की एक बहुत बड़ी जमात मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय रहती है। आज की मीडिया के बारे में क्या कहा जाये! इनकी भी यह ‘उत्तम दशा’ एक दिन में और एक कारण से नहीं हुई है।

अधिकतर मीडियाकर्मी किसी सरकारी हमले की चपेट में नहीं, लोभ-लाभ में फंसते गये। घोषित आपातकाल ने मीडिया का चरित्र ढीला कर दिया तो घोषित अमृतकाल ने चरित्र के सवाल को ही बेमतलब बना दिया। बात हिंदी मीडिया की हो रही है। घोषित आपातकाल के दौरान पत्रकारों को सच ‎बोलने, छापने से रोकने के लिए इंतजाम किया गया था, वे रुक गये। घोषित अमृतकाल आपातकाल में पत्रकारों को झूठ ‎बोलने, झूठ छापने में लगाने के लिए इंतजाम किया गया, वे लग गये। इस काल हुआ या उस काल हुआ, ‘सहर्ष’ हुआ! ‎उस दौरान हो या इस दौरान मीडिया और मीडियाकर्मी ने सत्ता के कब्जा को कंठहार बना लिया। यह सब मीडिया को पालतू बनाने के लिए किया गया। जो पालतू ‎बन जाते हैं, आराम से रहते हैं। पालतू बनने के अपने फायदे हैं, इस बात से इनकार नहीं ‎किया जा सकता है। जो पालतू बनने से इनकार करते हैं उन्हें जबरदस्त हमला ‎झेलना पड़ता है। क्षति उठानी पड़ती है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आज स्वेच्छा और लाचारी का फर्क ही समाप्त हो गया है।

साधारण नागरिक का मन बहुत घबड़ाया हुआ है। आज सोशल मीडिया के ‎विभिन्न पटल न होते तो, क्या हाल होता यह सब सोचकर, मन और भी घबड़ा जाता है। पता नहीं, सोशल मीडिया के विभिन्न पटल कितने दिन नागरिक पहुंच में बने ‎रहेंगे। कब तक कोई मुंहतकी पर जिंदा रहे! मुंहजोरों की बस्ती में मुंहजोही का दुख क्या होता है, इसे वही समझता है जो भुगतता है। निश्चित ही स्थिति दुखद है, लेकिन इसी दुख में अपना घर है। दुख के बाहर द्वार पर जीवन दस्तक दे रहा है। दस्तक की आवाज बहुत धीमी है तो क्या! जरूरी नहीं कि जिसे जोर से बोला जाये वही सही हो। वक्त का तकाजा है, धीमी आवाज पर कान हो हाथ में वोटर कार्ड हो। यह मुल्क हम सब का है। किसी एक का नहीं है मुल्क।

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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