Saturday, January 22, 2022

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किसान आंदोलन और कृषि क़ानूनों की वापसी का यूपी और उत्तराखंड के चुनावों पर क्या होगा असर?

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में संभावित नुकसान की आशंका के मद्देनज़र केंद्र सरकार ने तीनों केंद्रीय कृषि क़ानूनों को रद्द करने का फैसला किया और कैबिनेट द्वारा कृषि क़ानूनों को रद्द करने वाले बिल को मंजूरी देने के साथ ही संसद से उनकी वापसी की प्रक्रिया शुरू भी हो गई है। लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में एक साल से चल रहे किसान आंदोलन और कृषि क़ानूनों को रद्द करने के फैसले के क्या फायदे नुकसान हो सकते हैं इसको समझने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने इस आंदोलन से जुड़े और समाज की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने वाले तमाम लोगों से बात की।

इस कड़ी में समाजिक कार्यकर्ता-नेशनल फोरम ऑफ फॉरेस्ट पीपल एंड फॉरेस्ट वर्कर्स नामक संस्था के लिये काम करने वाली समाजिक कार्यकर्ता रोमा मलिक से भी बात हुई। किसान आंदोलन के संभावित असर पर वह कहती हैं कि भले ही सरकार ने कृषि क़ानून वापस लेने का एलान कर दिया है, पर जब तक एमएसपी पर ख़रीद की गारंटी समेत अन्य मुद्दों पर सरकार सारे फैसलों को नहीं ले लेती है तब तक ये मामला चलेगा। 

रोमा मलिक आगे कहती हैं कि किसान आंदोलन का एक साल का सफ़र काफी अच्छा रहा है। दिल्ली में भले तीन चार राज्यों के किसानों का दिख रहा हो लेकिन ये आंदोलन देश के दूर दराज गांवों तक फैल चुका है। ये चारों तरफ बढ़ रहा है। राजीनीतिक रूप से ये बड़ा असर डालेगा। यूपी चुनाव में गहरा असर डालेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हालत खराब है इनकी। जहां ये लोग काफ़ी सीटें जीतकर आते हैं। 

उन्होंने आगे कहा कि कार्पोरेट घरानों के हित में ये सरकार मार्केट ओरिएंटेड नीतियां ला रही है। उसके ख़िलाफ़ किसान पीछे नहीं हटेगा। जल-जंगल-ज़मीन किसी भी क़ीमत पर कार्पोरेट के हाथों में नहीं जाने चाहिये। लोगों की आजीविका का ये स्रोत हैं। इससे लोगों का भरण पोषण होता है। किसान आंदोलन जल-जंगल-ज़मीन की नहीं, रोजी-रोटी की भी लड़ाई लड़ रहा है लोगों को ये बात समझ में आ चुकी है। इसीलिये देश भर में लोग किसान आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं।

इलाहाबाद के समाजिक कार्यकर्ता डॉ कमल उसरी कहते हैं, “ देश का ऐसा कोई गांव नहीं होगा जहां किसान आंदोलन की चर्चा न हुई हो। डॉ कमल कहते हैं कि किसान आंदोलन ने सरकार के दमन की प्रक्रिया को थामा है। सरकार जिस तेजी के साथ लगातार नागरिक अधिकारों का हनन कर रही थी उसकी वो गति धीमी पड़ गई है। निजीकरण और निगमीकरण की प्रक्रिया में भी थोड़ा ठहराव आया है किसान आंदोलन के चलते।

डॉ कमल उसरी कहते हैं कि इलाहाबाद, प्रतापगढ़, कौशांबी, जौनपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र जिलों में लगातार किसान आंदोलन के अंतर्गत संयुक्त किसान मोर्चा के कार्यक्रम हुये हैं। मिर्जापुर में संयुक्त किसान मोर्चा की रैली में राकेश टिकैत आये थे। प्रतापगढ़ में वर्मा जी लगातार लगे हुये हैं। इलाहाबाद में डॉ आशीष मित्तल संयुक्त किसान मोर्चा का मोर्चा संभाले हुए हैं।  

डॉ कमल का कहना है कि भले ही सरकार ने कृषि क़ानूनों को रद्द कर दिया है लेकिन फिर भी इन जिलों में भाजपा को किसान आंदोलन का नुकसान होना तय है। क्योंकि लोगों को यह बात समझ आ चुकी है कि चुनाव के चलते ही सरकार ने अपने कदम पीछे खीचें हैं।  

पूर्वांचल की राजनीति, समाजिक व्यवस्था, कृषि संस्कृति पर गहरी नज़र रखने वाले समाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार मनोज कुमार सिंह बताते हैं किसान आंदोलन का तराई या पश्चिम में जिस तरह का प्रभाव है उतना प्रभाव पूर्वांचल में नहीं है। पूर्वांचल में लोगों तक ये बात ज़रूर पहुंची है कि किसान आंदोलन चल रहा है किसानों की मांग क्या है। सहानुभूति भी है किसानों के प्रति। लेकिन दिक्कत यह है कि पूर्वांचल में कोई किसान संगठन नहीं है। मनोज सिंह आगे बताते हैं कि भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) एक समय यहां मजबूत ज़रूर था। बस्ती गोरखपुर, देवरिया जिले में एक समय किसान संगठन था। लेकिन ध्यान नहीं देने से यह कमजोर हो गया। 

मनोज सिंह बताते हैं कि बस्ती जिले में जनवरी महीने में किसानों का कार्यक्रम हुआ था। नरेश टिकैत आये थे। सभा ठीक हुई थी। 5-6 हजार लोग आये थे। फिर बलिया में कार्यक्रम हुआ , उसमें राकेश टिकैत आये थे। यह कार्यक्रम सीपीआई माले के किसान संगठन ने आयोजित किया था। लेकिन पूर्वांचल में किसान संगठन उतने ग्रास रूटेड (ज़मीनी) नहीं हैं। जैसा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में या पंजाब में है। 

मनोज सिंह बताते हैं कि गन्ना किसान यहां ज्यादा हैं। और पिछले एक दशक में गन्ना किसानों के कई आंदोलन इस क्षेत्र में हुये हैं। गन्ना किसानों का अलग संगठन, अलग समस्या है। एग्रो इंडस्ट्री नहीं है पूर्वांचल में। एक समय यहां 28 चीनी मिलें थीं जिसमें से 16 बंद हो गई हैं। चीनी मिलों के दोबारा चालू कराने और गन्ना कीमतों के भुगतान को लेकर कई आंदोलन हुये हैं यहां एक दशक में। मुंडेरवा में आंदोलन हुआ था पुलिस फॉयरिंग में 3 किसान मरे, फिर रामकोला में हुआ वहां 2 किसान पुलिस फॉयरिंग में मरे। पडरौना में गन्ना कीमतों के भुगतान को लेकर आंदोलन हुआ 1 किसान पुलिस फॉयरिंग में मरा। और तत्कालीन सरकारों को नुकसान हुआ। ये मुद्दा अब भी है लेकिन संगठन नहीं है। छोटे किसान गन्ना की खेती से हट गये। बड़ी पूंजी लगती है। पैसा फँसता है। तो बड़े और मजबूत किसान ही खेती कर रहे हैं गन्ने की। कई किसान केले की खेती की ओर जा रहे हैं। तो बड़े किसान संगठन नहीं हैं जो किसान आंदोलन को पूर्वांचल में मोबिलाइज करें। 

मनोज सिंह बताते हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा के ऑल इंडिया कॉल पर कुछ छिटपुट कार्यक्रम हुये हैं देवरिया गोरखपुर में। कुछ बढ़ रहा है। तो किसान आंदोलन की धमक तो है लेकिन उतना मजबूत तरीके से नहीं है कि वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरह एंटी-बीजेपी में कन्वर्ट हो सके। 

लखीमरपुपर खीरी तिकुनिया कांड के असर पर मनोज सिंह कहते हैं भाजपा-आरएसएस ने अंदरखाने उस पूरे मसले को हिंदू बनाम सिख बना दिया है। पहले दिन से ही। लखीमपुर, पीलीभीत के कई इलाकों में सिख समुदाय का दबदबा है किसानी में। तो एक लोकल कन्फ्लिक्ट है। इसे ब्रेक करने के लिये यहां से निहासन तक पदयात्रा और सभा की योजना बनी थी लेकिन सरकार और प्रशासन ने पदायात्रा की अनुमति नहीं दी थी। सभा हुई लेकिन राकेश टिकैत उसमें नहीं आये। बाइनरी बन रही है उस क्षेत्र में और अगर संयुक्त किसान मोर्चा ने उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया तो नुकसान होने के बजाय भाजपा को फायदा हो जायेगा। लखीमरपुर खीरी कांड से। क्योंकि वो सिख बनाम हिंदू हो जायेगा। और ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा ले जायेगी। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित और मजदूर समुदाय के लिये काम करने वाले समाजसेवी धर्मेंद्र आज़ाद कहते हैं – मुज़फ्फ़रनगर सांप्रदायिक दंगे से भाजपा ने जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके सियासी ज़मीन तैयार की थी किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की उस ज़मीन को खत्म कर दिया है। कृषि क़ानूनों को वापस लेने का सरकार का फैसला भी अब उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता है। बल्कि कृषि क़ानून वापस लेने के फैसले ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि भाजपा अपनी सियासी ज़मीन खो चुकी है। 

धर्मेंद्र आज़ाद कहते हैं कि जो ‘56 इंची’ एक मस्कुलिन छवि कार्पोरेट मीडिया ने गढ़ी थी उसको भी किसान आंदोलन ने ध्वस्त कर दिया है। किसान आंदोलन ने जनचेतना का प्रसार किया है कि केंद्र की भाजपा सरकार के फैसले गलत हैं। और किसानों से उनका खेत खलिहान छीनने वाला है। उनकी थाली से दाल, सब्जी, रोटी छीनने वाला है। लोगों को समझ में आ गया है कि महंगाई कुछ कार्पोरेट लोगों के मुनाफे के लिये आम जन पर थोपा गया आर्थिक आपातकाल है।

समाजवादी लोक मंच के संस्थापक सामाजिक कार्यकर्ता मुनीष कुमार उत्तराखंड विधानसभा चुनाव और किसान आंदोलन पर प्रकाश डालते हैं। वो बताते हैं कि किसान आंदोलन का असर उत्तराखंड के 3-4 जिले में पड़ेगा। तराई क्षेत्र के ऊधमनगर (8), हरिद्वार, रामनगर जिला, में पड़ेगा। कुल मिलाकर 25-30 सीटों पर किसान आंदोलन का असर रहेगा। वो बताते हैं कि संयुक्त किसान मोर्चा के कई कार्यक्रम हुये हैं। सिख समुदाय पूरा मोर्चा खोले हुये है। पूरे आंदोलन पर सिखों का प्रभाव ज़्यादा है। वो कहते हैं सिख डोमिनेटेड होने के नाते किसान आंदोलन उत्तराखंड में दूसरे समुदायों के साथ जुड़ नहीं पा रहा है।

मुनीश कुमार आगे बताते हैं कि तेजेंदिर विर्क का तराई किसान संगठन है। और उनका ही संगठन लखीमपुर खीरी में काला झंडा दिखाने का कार्यक्रम कर रहा था। उस घटना में तेजेंदिर विर्क भी गंभीर रूप से घायल हुये थे। रुद्रपुर क्षेत्र में इनके संगठन का प्रभाव है और तराई भी कुछ क्षेत्रों में है। इसके अलावा माले का किसान संगठन सक्रिय है। राकेश टिकैत के भाकियू का संगठन है हाल में किसान आंदोलन के दौरान प्रभावी हुये हैं। 

मुनीश कुमार बताते हैं कि पहाड़ों पर कार्यक्रम नहीं हुआ संयुक्त किसान मोर्चे का। स्थानीय संगठनों ने कुछ कार्यक्रम ज़रूर किये हैं पर वो किसान आंदोलन को मोबिलाइज करने लायक नहीं थे।

मुनीश कुमार बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में सिख समुदाय भाजपा के साथ था। लेकिन किसान आंदोलन के बाद ये समुदाय भाजपा से नाराज़ है। सिख समुदाय के लोगों ने कह दिया है कि अब भाजपा की दरी नहीं उठाना है। तो चुनाव प्रभावित कर सकने लायक तराई में किसान आंदोलन का असर है लेकिन पहाड़ में किसान आंदोलन का असर नहीं है। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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