तेजपाल रेप केस: मोदी-दंगाई की पहचान उसके कपड़े, जज-रेप में विक्टिम का व्यवहार निर्णायक

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(तरुण तेजपाल रेप केस में जज के फैसले पर समाज के एक बड़े हिस्से में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। खास कर सेशन जज क्षमा जोशी के उस वक्तव्य को लेकर जिसमें उन्होंने कहा है कि रेप विक्टिम का व्यवहार घटना होने के बाद विक्टिम जैसा नहीं था। यहां तक कि तेजपाल के माफी मांगने के प्रकरण को भी उन्होंने दबाव में लिया गया निर्णय करार दिया है। और सारे सबूतों की अनदेखी कर तेजपाल को निर्दोष घोषित कर दिया है। इसी मसले पर विभिन्न कोणों से एपवा की राष्ट्रीय सचिव और सीपीआई एमएल की पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन ने जज के साथ एक काल्पनिक वार्तालाप तैयार किया है। पेश है पूरी वार्तालाप-संपादक) 

कविता कृष्णन: आरोपी के बेटी से शिकायतकर्ता ने क्यों कहा कि उसके पिताजी ने असाल्ट किया, उसके पास जाकर क्यों रोई?

जज साहिबा: अरे सब नाटक था, बॉस ने काम गलत करने के लिए डांटा था, तो उसे झूठ बना कर बोल दिया असाल्ट हुआ।

कविता कृष्णन: ओके, तो बॉस ने किस बात की माफ़ी मांगी?

जज साहिबा: अरे वो तो बेचारा जानता ही नहीं था कि ये अपसेट हो गई थी, उसने समझा था लड़की खुश है उसके उन सब हरकतों से लिफ्ट में। बाद में पता चला अपसेट है, तो उसे शांत करने के लिए माफ़ी माँग ली। बस!

कविता कृष्णन: पर फिर तो लड़की झूठ नहीं बोल रही थी ना, बना कर नहीं बोल रही थी- लिफ्ट में बॉस ने उसके साथ कुछ किया, वो परेशान होकर बॉस की बेटी से जाकर बोल दी, रो दी। लिफ्ट में आपके लिए क्या हुआ जज साहब, वो तो बता दो: 1) कुछ नहीं हुआ (यानी लड़की झूठ बोली) 2) बॉस ने वही किया जो लड़की कह रही है, पर यह समझ कर किया की उसकी मर्जी है 3) बॉस ने लिफ्ट में मर्जी के खिलाफ रेप किया।

जज साहिबा : अच्छा चलो नंबर 2 ही समझ लो, हालांकि मैं कुछ साफ लिखूंगी नहीं क्योंकि…

कविता कृष्णन: क्योंकि फिर यह सवाल तो बनेगा: अगर 2 हैं, जज साहिबा, तब फिर लिफ्ट में बॉस ने वही किया जो लड़की कह रही है, ना? और कानूनों के अनुसार तो रेप है या नहीं, वह तो महिला के हाँ या ना से तय होगा। महिला ने ना कहा इसका तो काफी सबूत है- घटना के बाद उसने इतने लोगों को बताया। कानूनों के बलात्कार के आरोपी को ये कहकर माफ नहीं किया जा सकता है कि वह समझ ही नहीं पाया कि हाँ है कि ना (क्योंकि भाई, समझ नहीं पा रहे थे, तो ना ही मान कर चल लेते, हाँ कौन मान लिया ?) कहीं आप भी वही फीब्ले नो वाले लॉजिक पर तो नहीं जा रहीं मैडम, कानून की धज्जियां उड़ाकर?

जज साहिबा: उफ्फ। अरे उस लड़की को देखो तो सही- रेप के बाद अच्छा खासा बॉस से एसएमएस पर काम को लेकर बात कर रही थी (और फिर, जजमेंट में तो लिख नहीं सकती पर आपने देखे तो होंगे ही वो फोटो जिसमें वह दूसरे ही दिन बीच पर बिकिनी पहन कर गयी थी एक गेस्ट को घुमाने)। रेप विक्टिम की तरह व्यवहार ही नहीं था उसका! और फिर वह रेप पर रिसर्च करके लिखती थी, रेप का कानून वानून सब जानती थी, मेडिकल जांच के लिए उस रात लिफ्ट से निकलते साथ गई क्यों नहीं?

कविता कृष्णन: ओह..। हमें तो पता था रेप कानून में है कि कंप्लेंट फाइल करने में देरी या हिचकिचाहट से आरोप झूठा नहीं साबित होता है। पीड़ित ने तो कहा ही था कि आरोपी मेरा बॉस था, मुझे डर था मेरी नौकरी चली जाएगी, इसलिये उसके साथ नॉर्मल बिहैव कर रही थी और सोच रही थी प्राइवेट में ही वे बात समझ कर मुझे परेशान करना छोड़ दे। उनकी वाइफ को भी मैं जनती हूं, उनको दुःख दूं पुलिस में जाकर मेडिकल कराके, कि नहीं, इसको लेकर मैं दुविधा में थी।

अब आप की बात से ये बढ़िया नई बात पता चली कि रेप विक्टिम को उसके अपने व्यवहार से पहचाना जा सकता है। (दंगाई/ आतंकी को कपड़े से पहचानो कहा था पीएम ने, लगता है वैसे ही, बलात्कार की पीड़िता को भी कपड़े से पहचान सकते हैं! तब तो इतने सब सबूत, लम्बे ट्रायल वगैरह की क्या जरूरत ? आरोपी माफ़ी भी मांग ले लिखित में, तब भी विक्टिम का व्यवहार, उसके कपड़े “विक्टिम मुताबित” नहीं तो आरोपी बरी। नौकरी के ही चलते बड़े एक्टर को गोवा में बीच पर ले जाओ कहा है बॉस ने, तो क्या हुआ – बीच पर बिकनी नहीं, सलवार कमीज लज्जा वस्त्र पहन कर जाती। चलो अच्छा है, अब आप हमें वो कानून बता दीजिये ना, जिसमें रेप विक्टिम का व्यवहार कैसा हो, कैसा ना हो , सब बताया हो?

जज साहिबा: हम्म् … देखो भाई, पीड़ित मर गई हो और मेडिकल में उसके शरीर पर ढेर सारे इंजरी हों, तब तो मामला ज्यादा आसान होता है, खासकर अगर आरोपी किसी स्लम में रहने वाला नालायक हो। अब ये इतना बड़ा एडिटर, भला रेप कानून उसके लिए थोड़े बना है! और ऐसी लड़कियों, जो दोस्तों से सेक्स के बारे में बात करती रहती हैं पर बॉस ने सेक्स के बारे में बात कर दिया तो आरोप लगा देती हैं, इनके लिए थोड़ी है रेप कानून बना हैं। (क्या कहा आपने, कंसेंट/ मर्जी, ये क्या बला है? दोस्तों के साथ सेक्स बतियाती हो तो बॉस से क्यों नहीं?) इनका बिहैवियर कभी रेप विक्टिम वाली लग ही नहीं सकती। मुझे तो लगता है, रेप कानून उन्हीं के लिए है जो मर गए, वहां तो मौत की सजा वजा दे सकते हैं। ये “कंसेंट वायलेट हो गया” कहने वाली जिंदा और जिंदादिल लड़की, रेप विक्टिम लगती ही नहीं!

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