Friday, April 19, 2024

ग्राउंड से चुनाव: गहलोत की लोक लुभावन गारंटियों के बाद भी विधायकों-मंत्रियों से नाराजगी कांग्रेस को पड़ रही भारी

जयपुर। पच्चीस लाख रुपये की चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना की बहाली, लड़कियों को मोबाइल व स्कूटी और 42 लाख महिलाओं को गृहलक्ष्मी गारंटी योजना के तहत 1000 की पेंशन समेत 10 गारंटियों के बाद भी गहलोत सरकार का अलोकप्रिय होना इस चुनाव में अपने आप में अजीब पहेली बनी हुई है।

यहां यह बात आमतौर पर मानी जा रही है कि लोगों की शिकायत सीएम गहलोत से नहीं बल्कि उनके मंत्रियों, विधायकों, सरकार के करीबी बिचौलियों व नौकरशाही की लालफीताशाही से है। आखिर उनके इन कामों को आम जनता तक पहुंचाने के काम में विधायक, मंत्री और सरकारी अमला क्यों फिसड्डी साबित हुआ?

दौसा मुख्य बाजार, रेलवे स्टेशन के पास युवा कारोबारी रविकिशन कहते हैं, “पुलिस विभाग में ट्रांसफर पोस्टिंग पहले महकमे के भीतर से ही किये जाते थे, कोई सरकारी दखल नहीं होता था। काबिल और ईमानदार थानेदारों की पृष्ठभूमि देखकर उन्हें थाने सौंपे जाते थे। लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही अशोक गहलोत पर विधायकों और उनके करीबी बिचौलियों का दबाव बढ़ता गया।”

रविकिशन आगे कहते हैं, “यह शायद पहली बार देखने को मिला है कि विधायक और मंत्री पुलिस थानों से लेकर शिक्षा विभाग में बाबू और टीचरों की ट्रांसफर पोस्टिंग में मोटी कमाई कर रहे हैं। पीडब्ल्यूडी, बिजली व जलदाय विभाग में दुर्गम स्थानों से सुगम शहरों में एक एक पोस्टिंग के बदले रिश्वत का कारोबार कई कई लाख तक पहुंचा हुआ है।”

बिजली विभाग के एक युवा ठेकेदार से भरतपुर-दौसा रोड के टी स्टॉल पर बात हुई। नाम ना छापने की शर्त पर उसने कहा, “सरकारी काम बिना कमीशन के नहीं मिल सकता। हां पहले की तुलना में अब कमीशन का रेट बढ़ा है।”

आश्चर्य तो यह है कि सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना की गारंटी देने के बावजूद सरकारी कर्मचारियों में गहलोत सरकार को वापस सत्ता में लाने का जो उत्साह दिखना चाहिए था, वैसा उल्लास नहीं दिखता।

लोगों का मानना है कि अशोक गहलोत ने पांच साल एक अल्पमत सरकार को बड़ी मुश्किलों से चलाया। एक कमजोर सरकार को मजबूत विपक्ष के बावजूद पांच साल तक खींचना बहुत ही मुश्किल काम था। ऐसे में विधायकों और मंत्रियों को खुश रखने में ही उनका ज़्यादा वक्त बीता और ये सारे लोग मुख्यमंत्री के नियंत्रण से बाहर होते गए।

अल्पमत सरकार में मुख्यमंत्री चौतरफा दबाव के चलते विधायकों और निर्दलियों और कई बदनाम मंत्रियों के दबाव में काम करने को विवश होते गए। दौसा के पास खेड़ली मोड़ के पास होटल व्यवसायी धर्म सिंह गुर्जर कहते हैं, “जिस सरकारी कर्मचारी का बाड़मेर या जोधपुर जितनी दूर से पूर्वी राजस्थान में ट्रांसफर होगा उसका रेट उसी हिसाब से ज़्यादा होगा।”

राजस्थान के हर जिले में पेयजल की भारी किल्लत है। टोंक जिले के पास विशलपुर बांध से दौसा और आसपास के जिलों के पीने के पानी को तरस रहे लोगों को अभी लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है। यहां आसपास के गांवों में लोगों को कई कई दिनों तक टैंकरों के पानी का इंतज़ार करना पड़ता है। बांदी कुई विधानसभा के निवासी रूप सैनी कहते हैं, “पाइप लाइनें कई जगह आ चुकी हैं लेकिन लेकिन पीने के लिए पानी कब आएगा अभी किसी को कुछ नहीं पता।

(राजस्थान से वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत लखेड़ा की ग्राउंड रिपोर्ट।)

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