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Saturday, September 25, 2021

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नहीं रहे प्रोफेसर अली जावेद

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बिछड़े सभी बारी बारी

महान साहित्यकार प्रेमचंद और अन्य द्वारा लखनऊ के अमीनाबाद की एक धर्मशाला में 1936 में कायम किए प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के कार्यकारी अध्यक्ष अली जावेद हमारे बीच नहीं रहे। वे हमारे मरहूम दोस्त खुर्शीद अनवर के बड़े भाई थे। दोनों ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के स्कूल ऑफ लेंग्वेजेस के भारतीय भाषा केंद्र में ऊर्दू के छात्र रहे थे। अली जावेद बाद में दिल्ली विश्विद्यालय में उर्दू के प्रोफेसर रहे।

उन्हें कुछ बरस पहले दिल का दौरा पड़ा था। बावजूद इसके वह जन संघर्षों का साथ देने सड़क पर उतरने से गुरेज नहीं करते थे। वह हालिया दिनों में बहुत अस्वस्थ हो गए थे।

अली जावेद के फोन नंबर से एक फेसबुक ग्रुप में देर रात मिली खबर के मुताबिक उनकी अंत्येष्टि को दिल्ली में किए जाने की संभावना है। निश्चित दिन और समय का निर्णय एक सितंबर 2021 की सुबह तक उनकी पत्नी और छोटे भाई परवेज से सलाह मशविरा कर किया जाएगा।

प्रलेस

प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भारत में ब्रिटिश हुक्मरानी के प्रतिरोध में 1935 में लंदन में सज्जाद ज़हीर और अन्य की पहल पर की गई थी। उसी बरस अपनी शिक्षा पूरी कर लंदन से हिंदुस्तान लौटे सज्जाद ज़हीर ने अलीगढ़ में डॉ. अशरफ, इलाहबाद में अहमद अली, मुम्बई में कन्हैया लाल मुंशी, बनारस में प्रेमचंद,  कलकत्ता में प्रो. हीरन मुखर्जी और अमृतसर में रशीद जहाँ के अलावा प्रो. एजाज़ हुसैन, रघुपति सहाय फिराक, एहतिशाम हुसैन, विकार अजीम , शिवदान सिंह चौहान, नरेन्द्र शर्मा, प्रो. ताराचंद , अमरनाथ झा , सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ. अब्दुल हक़, गंगा नाथ झा, जोश मलीहाबादी, अब्दुस्सत्तार सिद्दीकी आदि से संपर्क करने के बाद प्रगतिशील लेखक संघ का घोषणापत्र तैयार किया जिस पर उपरोक्त सभी ने हस्ताक्षर किए थे।

इस घोषणा पत्र पर डॉ. अशरफ, अली सरदार जाफरी, डॉ. अब्दुल अलीम, जाँनिसार अख्तर मंज़ूर अहमद आदि ने भी जब दस्तख़त कर दिए तो 9 -10  अप्रैल 1936 को लखनऊ में अमीनाबाद की एक धर्मशाला में मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया गया।

इस अधिवेशन में हसरत मोहानी ने साम्यवाद के विचार बुलंद कर कहा था: हमारे साहित्य को स्वाधीनता आन्दोलन की सशक्त अभिव्यक्ति करनी चाहिए और साम्राज्यवादी, अत्याचारी तथा आक्रामक पूंजीपतियों का विरोध करना चाहिए। उसे मजदूरों, किसानों और सम्पूर्ण पीड़ित जनता का पक्षधर होना चाहिए। उसमें जन सामान्य के दुःख-सुख, उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को इस प्रकार व्यक्त करना चाहिए कि इससे उनकी इन्क़लाबी शक्तियों को बल मिले और वह एकजुट और संगठित होकर अपने संघर्ष को सफल बना सकें। केवल प्रगतिशीलता पर्याप्त नहीं है। नए साहित्य को समाजवाद और कम्युनिज्म का भी प्रचार करना चाहिए।

अधिवेशन के दूसरे दिन गोष्ठी में जय प्रकाश नारायण, यूसुफ मेहर अली, इन्दुलाल याज्ञिक, कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि ने भी भाग लिया। अधिवेशन में प्रलेस का संविधान अपना कर सज्जाद ज़हीर को संगठन का महामंत्री चुना गया।

प्रलेस का दूसरा अखिल भारतीय अधिवेशन 1938 में कोलकाता में हुआ। उसके बाद भारत की आजादी के पहले के बरसों में इसके अखिल भारतीय अधिवेशन दिल्ली और मुंबई में भी हुए। अली जावेद को 2011 में जयपुर में प्रलेस के 17 वें राष्ट्रीय अधिवेशन में इसका कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया था।

व्यक्तिगत

अली जावेद मेरे लिए बड़े भाई थे। उन्होंने खुर्शीद अनवर के गुजर जाने के बाद हमें बहुत सहारा दिया। भारत की आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर देश में समाचारों के स्वतंत्र प्रवाह के लिए अखबार मालिकों की बनाई विशेष कंपनी यूएनआई न्यूज एजेंसी को तिकड़म से जब क्रोनी कैपिटलिस्ट सुभाष चंद्रा ने खरीद लेने की गैर कानूनी कोशिश की तो उसके खिलाफ ट्रेड यूनियन संघर्ष में केंद्रक होने के कारण मुझे निशाना बना तरह तरह से प्रताड़ित किया गया।

हम मुंबई में तैनात थे और उस लड़ाई के सिलसिले में अक्सर दिल्ली आकर खुर्शीद अनवर के साथ ही ठहरते थे। खुर्शीद के इंतकाल के बाद अली जावेद ने हमारा लगातार हौसला बढ़ाया। उन्होंने हमें उर्दू अदब की तमीज भी दी। वे फेसबुक पर लिखे हमारे साहित्यिक पोस्ट में बेहिचक सुधार कर दिया करते थे।

अली जावेद को लाल सलाम।

(सीपी झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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