राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द किया पूर्व मुख्यमंत्रियों के आन-बान-शान वाला कानून

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राजस्थान हाईकोर्ट।

देश की जनता जनप्रतिनिधि चुनती है कि राजा महाराजा ? चुनाव जीतने के बाद ये जनप्रतिनिधि अपने को मालिक और जनता को गुलाम समझने लगते हैं और जो सरकार के मुखिया बन जाते हैं वे टैक्सपेयर्स के पैसे से आजीवन अपनी सुख सुविधा का क़ानूनी तौर पर प्रबंध कर लेते हैं। मामले जब जागरूक लोगों द्वारा न्यायपालिका के संज्ञान में आता है तब जाकर इस पर अंकुश लगता है। तब तक कई साल लग जाते हैं। फिर पिछली तारीख से बाजार मूल्य से आज तक इन सुख सुविधाओं की वसूली जनप्रतिनिधियों से नहीं की गयी है क्योंकि राजनीति के हमाम में सभी नंगे हैं। पहले उत्तर प्रदेश फिर उत्तराखंड और अब राजस्थान में न्यायपालिका ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिल रही तमाम सुख सुविधाओं पर कानून की तलवार चला दी है।

राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब पूर्व मुख्यमंत्रियों को न सरकारी बंगला मिलेगा, न कार और न स्टाफ। राजस्थान हाईकोर्ट ने बुधवार को राजस्थान मंत्री संशोधन वेतन अधिनियम 2017 को अवैध करार दे दिया। इस अधिनियम में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला, आईएएस रैंक का प्राईवेट सेक्रेट्री समेत स्टाफ और कार जैसी सुविधाएं दी गई हैं। अब हाईकोर्ट ने इस अधिनियम को रद्द कर कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री  को कोई सुविधा नहीं दी जा सकती है, न ही सरकारी बंगला। इसका सबसे अधिक असर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे पर पड़ेगा। राजे ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ने से पहले दिसंबर 2018 में खुद के लिए मुख्यमंत्री अवास को ही पूर्व मुख्यमंत्री  बंगले के रूप में आंवटित कर दिया था। राजे अब उसी बंगला में रह रही हैं जिसमें वे बतौर मुख्यमंत्री रह रही थीं। वसुंधरा राजे के पास पीएस समेत 10 कर्मचारियों का स्टाफ भी है। 

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राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान के मंत्रियों के वेतन संशोधन अधिनियम 2017 को रद्द कर दिया जिसके तहत आजीवन सरकारी आवास और पूर्व मुख्यमंत्रियों को 10 कर्मचारियों की सेवा हासिल करने जैसी अतिरिक्त सुविधाओं का प्रावधान था। यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश एस रवींद्र भट की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनाया। न्यायालय में यह याचिका पत्रकार मिलाप चंद डांडिया और विजय भंडारी ने दायर की थी। खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा 2017 में मंत्रियों के वेतन संशोधन अधिनियम के जरिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी निवास की सुविधा और 10 व्यक्तिगत कर्मचारियों की सेवा देने की सुविधाओं को रद्द कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाले सरकारी सुविधाओं का लाभ फिलहाल वसुंधरा राजे और जगन्नाथ पहाड़िया ले रहे हैं। 

खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों, चाहे उनका कार्यकाल एक वर्ष के लिए हो या पांच साल से कम का हो, के लिए आजीवन आवासों के आवंटन का कोई सवाल नहीं हो सकता है। खंडपीठ ने धारा 7 बी और 11-2 के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपने जीवन के शेष समय के लिए एक सरकारी निवास, उनके परिवार के सदस्यों के लिए एक कार, टेलीफोन और ड्राइवर सहित 10 कर्मचारियों की सुविधा को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत असंवैधानिक करार दे दिया है।

वसुंधरा राजे के नेतृत्व में तत्कालीन भाजपा सरकार के दौरान राजस्थान के मंत्रियों के वेतन संशोधन अधिनियम 2017 के तहत बिना व्यवधान के पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा करने पर पूर्व मुख्यमंत्री को उसी तरह का निवास, कार, फोन की सुविधा, चालक सहित दस कर्मचारियों की सुविधा प्रदान की गई थी। संशोधित अधिनियम 2017 में राजस्थान के मंत्रियों के वेतन अधिनियम 1956 को संशोधित किया था।

याचिकाओं में उच्चतम न्यायालय की ओर से पहले ही उत्तर प्रदेश के मामले में इस तरह के विधेयक को अवैध ठहराने का हवाला भी दिया गया। वहीं कुछ दिन पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी ऐसा ही आदेश दिया था। उस आदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगला नहीं दिए जा सकने की बात थी। याचिका में यह तर्क दिया गया था कि आर्थिक रूप से पिछड़े होने के कारण, राजस्थान राज्य पूर्व मुख्यमंत्रियों को अधिनियम द्वारा सुनिश्चित की गई सुविधाएं प्रदान करने का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि यह राज्य के खजाने पर एक अतिरिक्त बोझ होगा।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। कानूनी मामलों की विशेष जानकारी रखने वाले सिंह आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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