क्या चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड एक समान है सबके लिए?

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आज 18 वीं लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान शुरू हो चुका है। मतदाता मतदान के लिए घर से निकल चुके और वे बूथों पर पंक्तियों में लगे हैं लेकिन क्या यह चुनाव भी निष्पक्ष और मुक्त तथा पारदर्शी होगा?

चुनाव आयोग सबके लिए लेवल फील्ड एक समान करने की बात करता है पर क्या यह एक समान है? क्या इसकी जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग की है या राजनीतिक दलों की भी है? यह सवाल हर चुनाव में उठाया जाता रहा है पर अब देश के मतदाताओं की ओर से भी चुनाव आयोग पर दबाव पड़ना चाहिए कि इस खेल के नियम सही हों और नियमों का पालन हो। जब जनता का दबाव बना तो आज उच्चतम न्यायालय भी vvpat की सुनवाई कर रहा है और उसने इलेक्टोरल बांड पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया लेकिन अब भी कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर  अदालत चुप है जनता भी चुप है और विधायिका भी।

अगर राजनीतिक दलों के खर्च पर अंकुश नहीं लगेगा उसकी सीमा तय नहीं होगी तो लेवल फील्ड एक समान नहीं होगा।

अभी लोकसभा उम्मीदवार के लिए अधिकतम 90 लाख की सीमा तय की गई है लेकिन राजनीतिक दलों के लिए कोई सीमा तय नहीं है यानी कोई उम्मीदवार अपनी पार्टी की ओर से मनमाना खर्च कर सकता है। स्टार प्रचारकों का खर्च भी उम्मीदवारों के खर्च में शामिल नहीं होता। प्रधानमंत्री मंत्री जब चुनावी दौरे पर जाता है तो उसकी सुरक्षा आदि का खर्च सरकार वहन करती है। इस तरह देखा जाए तो लेवल फील्ड एक समान नहीं है।

अगर कोई रेस शुरू होती है तो विकलांग या कमजोर बच्चा अन्य धावकों की तरह तेज नहीं दौड़ सकता। यहीं से रेस एक समान नहीं रह जाती है। भाजपा को सबसे आदिम पैसे इलेक्टोरल बांड से मिले। इस तरह वह अन्य पार्टियों से अधिक अमीर है। जिस तरह शिक्षा में एक अमीर बच्चा गरीब बच्चे से आगे बना रहता है उसी तरह एक अमीर राजनीतिक पार्टी हमेशा आगे रहेगी।

दूसरी बात कि चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के खर्च की अधिकतम सीमा तय करने के लिए सरकार के पास पहले भी प्रस्ताव भेजें हैं पर सरकार ने उसे नहीं माना है। राजनीतिक दलों ने भी इसे मुद्दा नहीं बनाया क्योंकि वे सभी अनाप-शनाप पैसा खर्चा करना चाहती हैं और इसलिए वे नहीं चाहतीं कि सीमा तय हो। अगर 543 सीटों पर एक पार्टी के लिए एक करोड़ अधिकतम राशि तय की जाए तो कुल 543 करोड़ रुपए एक पार्टी खर्च करेगी। सभी दल 543 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा नहीं करते। ऐसे में विपक्ष के साझा उम्मीदवार भी 543 होंगे। कुछ सीटों पर तिकोना-चौकोना चुनाव होते हैं। कुल मिलाकर खर्च को नियंत्रित किया जा सकेगा। सभी दल एक सीट पर एक करोड़ रुपए से अधिक खर्च नहीं करेंगे। प्रत्येक उम्मीदवार के लिए 90 लाख की सीमा है यानी एक दल एक सीट पर दो करोड़ खर्च कर पायेगा।

बेहतर होता कि इलेक्टोरल बांड के पैसे से चुनाव आयोग एक फण्ड बनाये और चुनाव की पब्लिक फंडिंग हो। बहरहाल लेवल फ़ील्ड एक समान नहीं है। दूसरी बात कि चुनाव से ठीक पहले सत्तारूढ़ दल अपने प्रधानमंत्री और मंत्रियों के जरिये मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापन देन लगते हैं। इससे भी मतदाताओं को सरकारी ख़र्च से प्रभावित करने के प्रयास होते हैं। क्या यह सरकारी मशीनरी का बेजा इस्तेमाल नहीं है?

क्या मतदाता मत डालते हुए इन बातों पर विचार करेगा या फिर वह इसे एक खयाली पुलाव मानकर अपने हिसाब से मत डालेगा?

राजनीतिक दल मतदाताओं को रिझाने के लिए धन शराब मादक पदार्थ का इस्तेमाल करते हैं। इस बार मतदान से पूर्व 4650 करोड़ रुपए के मादक द्रव्य शराब गहने साड़ी धोती और नगदी ज़ब्त की गई जो आज़ाद भारत का एक रिकॉर्ड है। आखिर कोई न कोई पार्टी यह काम करती होगी लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि चुनाव आयोग ने पार्टियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई की। आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में हर्जाना 500 रुपए है। क्या यह संज्ञेय अपराध नहीं होना चाहिए।

कल पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव में राजनीतिक दलों के खर्चे पर अंकुश लगाने के लिए अधिकतम खर्च की एक सीमा तय करने और उन्हें आरटीआई के दायरे में लाने की वकालत की है।

लवासा ने कल यहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित अपने व्याख्यान में यह बातें कहीं। केंद्र में वित्त सचिव रह चुके लवासा ने अपने व्याख्यान में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों के मद्देनजर चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति का विस्तार किये जाने और उसे अधिक स्वतंत्र बनाये जाने की भी वकालत की।

उन्होंने यहां तक कहा कि चयन समिति में सरकार ही नहीं बल्कि न्यायपालिका के  भी किसी सदस्य को शामिल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि कई बार चुनाव आयोग के मामले को उच्चतम न्यायालय भी सुनता है इसलिए मुख्य न्यायधीश को  उसमें शामिल किए जाने से हितों का टकराव हो सकता है।

लवासा चुनाव आयोग की कार्यप्रणालियों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।गौरतलब है कि पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन के मामले में नोटिस ना जारी किए जाने पर अपनी असहमति दर्ज की थी जिसको लेकर काफी विवाद खड़ा हुआ था और उनकी आपत्ति भी रिकार्ड में दर्ज नहीं की गई। अंत में उन्होंने चुनाव आयोग से इस्तीफा देकर एशियाई विकास बैंक ज्वाइन कर लिया था ।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को एक रेफरी बताते हुए कहा कि टीएन शेषन जैसा मजबूत व्यक्ति भी कभी चुनाव आयुक्त हुआ करता था। इस का मतलब इस सिस्टम में कोई व्यक्ति असरदार भूमिका निभा सकता है पर कोई नहीं निभाता।यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। उन्होंने संकेत दिया कि अगर रेफरी मजबूत हो तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता जनता की नजरों में बरकरार रह सकती है।

लवासा ने अपने व्याख्यान के प्रारंभ में कहा कि देश जब आजाद हुआ था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की थी कि 1950 में लोकसभा के चुनाव होंगे लेकिन देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने कहा कि पहले मतदाता सूची को पूरी तरह ठीक कर लिया जाए उसके बाद ही चुनाव करना उचित  होगा। इसके बाद प्रधानमंत्री ने मतदाता सूची पूरा होने के बाद दोबारा चुनाव की घोषणा की थी ।

लवासा का इशारा इस बात की तरफ था कि कभी चुनाव आयुक्त इतना महत्वपूर्ण होता था कि प्रधानमंत्री को उसकी बात माननी पड़ती थी लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं रह गई है।

 उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान कई श्रोताओं  के प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कहा कि चुनाव में सबके लिए एक समान मैदान नहीं रह गया है क्योंकि राजनीतिक दलों के खर्च की अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है। चुनाव आयोग ने पहले भी सिफारिश की थी लेकिन सरकार ने इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाया जिसके कारण आज राजनीतिक दल बेतहाशा चुनाव में पैसे खर्च करते हैं। अभी केवल प्रत्याशियों के चुनाव खर्च की ही अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है।

उन्होंने राजनीतिक दलों के चुनाव में होने वाले खर्च की जांच सीएजी से करने की मांग की। अभी राजनीतिक दल के चुनावी खर्च की ऑडिट की जाती है और राजनीतिक दलों को हर साल अपना चुनाव खर्च का बयान आयोग के सामने पेश करना पड़ता है लेकिन सीएजी की जांच से अधिक पारदर्शिता आएगी। उन्होंने कहा कि एक समय था कि चुनाव आयोग के कार्यों की बड़ी तारीफ भी होती रही है लेकिन बाद में जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप चुनाव आयोग खरा नहीं उतरा ।

लवासा ने भी वीवी पैट के मसले पर कहा कि 100% मतों का मिलान वीवी पैट से किया जाना चाहिए ताकि जनता को मतदान पर भरोसा हो सके।

उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग आदर्श चुनाव संहिता के मामले में स्वतः संज्ञान नहीं लेता क्योंकि अगर किसी मामले में उसने संज्ञान नहीं लिया तो उस पर भेदभाव का आरोप लगा सकता है, इसलिए चुनाव आयोग शिकायतों के आधार पर ही संज्ञान लेता है।

उन्होंने यह भी कहा कि किन शिकायतों के आधार पर क्या कार्रवाई हुई ,इसे भी पारदर्शी बनाया जाना चाहिए और इसकी सारी जानकारी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दी जानी चाहिए ताकि जनता को पता चल सके कि  किस मामले में चुनाव आयोग ने क्या कदम उठाया।

उन्होंने चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों को एक समान दर्जा दिए जाने की मांग की।उन्होंने चुनाव प्रक्रिया की लंबी अवधि को भी कम करने का सुझाव दिया।

क्या आज मतदान कर रहे मतदाताओं को यह पता है कि देश का एक पूर्व चुनाव आयुक्त लेवल फील्ड को एक समान बनाने के लिए वर्षों से सवाल उठा रहा है। वे अकेले नहीं हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी भी यह सवाल उठाते रहे हैं।

मतदाता का काम केवल वोट देना नहीं उसका सवाल उठाना भी एक काम है।

(अरविंद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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