दक्षिण भारतीय फिल्में बन रही हैं दुनियाभर में भारत की पहचान

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9 अप्रैल 2023 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा जारी दक्षिण भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग पर सीसीआई की एक रिपोर्ट का शीर्षक था, “क्षेत्रीय ही नया राष्ट्रीय है।” यह सांस्कृतिक उद्योग में वृहद स्तर पर प्रचलित प्रवृत्ति को बेहद सटीक ढंग से निरुपित करता है। इस “अखिल राष्ट्रवाद” के भीतर राजनीति और सांस्कृतिक मीमांसा इसके गौण पहलू भर हैं। यह प्रमुख रूप से बाजार की जरुरतों के हिसाब से संचालित होती है। बड़े कॉर्पोरेट पूंजी के प्रवेश के बाद से फिल्म निर्माण का काम एक बड़े व्यवसाय में तब्दील हो चुका है, और अखिल भारतीय बाजार ही नहीं बल्कि वैश्विक बाजार को ध्यान में रखते हुए फिल्म निर्माण अब एक सामान्य बात हो चुकी है।  

हाल ही में कुछ बड़े बजट की फिल्मों ने अखिल भारतीय बाजार को ध्यान में रखते हुए फिल्मों का निर्माण किया है। आइये एक नजर कुछ हालिया सुपर हिट ब्लॉकबस्टर फिल्मों के बॉक्स-ऑफिस कलेक्शन और उनके निर्माण की लागत पर डालते हैं:

राजामौली की तेलुगु फिल्म आरआरआर (जिसके नाटू नाटू गाने को ऑस्कर विजेता ख्याति प्राप्त हुई है) को 550 करोड़ रुपये के विशाल बजट के साथ निर्माण किया गया था। इस फिल्म ने 24 मार्च 2023 तक दुनियाभर में 1,236 करोड़ रुपये का कारोबार किया था, जिसमें से 936 करोड़ रुपये भारतीय बाजार से कमाए थे। लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि आंध्रप्रदेश और तेलंगाना जैसे तेलुगु राज्यों में इस फिल्म ने मात्र 365.8 करोड़ रुपये का ही कारोबार किया है। अपनी अखिल भारतीय पहुंच की बदौलत इस एक फिल्म ने 2022-23 में तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री के कुल राजस्व का लगभग 50 प्रतिशत इसी फिल्म की बदौलत हासिल कर लिया है।  

इसी प्रकार 2022 में रिलीज कन्नड़ फिल्म केजीएफ़ चैप्टर 2 के निर्माण में मात्र 100 करोड़ रुपये का खर्च आया था, लेकिन कमाई के मामले में इस फिल्म ने 1,230 करोड़ रुपये का कारोबार किया। लेकिन सबसे मजे की बात यह है कि कर्नाटक में इस कन्नड़ फिल्म से सिर्फ 137 करोड़ रुपये की ही कमाई हो सकी थी। 

जहां तक बॉक्स ऑफिस में अब तक का सबसे बड़ा धमाल दिखाने का प्रश्न है तो उसका श्रेय निश्चित रूप से आज भी राजामौली की 2015 में बनी फिल्म बाहुबली को ही जाता है; जिसे 250 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया था, और बाहुबली 1 और बाहुबली 2 की संयुक्त कमाई 1,810 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। वहीं तेलुगु राज्यों में इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 111.5 करोड़ रुपये (बाहुबली 1) और 198।7 करोड़ रुपये (बाहुबली-2) की ही कमाई की थी। 

इसकी तुलना में हिंदी फिल्मों की बात करें तो शाहरुख खान की फिल्म पठान के निर्माण में 225 करोड़ रुपये की लागत आई थी, जिसने मात्र 1,050 करोड़ रुपये का बिजनेस किया। इससे पहले दक्षिण भारत के फिल्म उद्योग में कोल्लीवुड की तमिल फिल्मों का ही बोलबाला हुआ करता था, लेकिन अब बॉक्स-ऑफिस में वे पीछे छूटती जा रही हैं।   

उदहारण के लिए मणि रत्नम की पोंनियिन सेल्वन 1 और पोंनियिन सेल्वन 2 को लेते हैं। इन दोनों फिल्मों का कुल बजट 500 करोड़ था, लेकिन बॉक्स ऑफिस में दोनों की कमाई 850 करोड़ रुपये ही हो सकी। इसमें पोंनियिन सेल्वन 1 को 500 करोड़ रुपये और दूसरी फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 350 करोड़ रुपये था। तमिलनाडु में पोंनियिन सेल्वन 1 ने 222 करोड़ और पोंनियिन सेल्वन 2 ने 139 करोड़ रुपये की कमाई की। 

सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म जेलर अभी हाल ही में 10 अगस्त 2023 को रिलीज हुई है, जिसका बजट 240 करोड़ रुपये था, लेकिन अभी तक इस फिल्म ने मात्र 607 करोड़ रुपये ही बॉक्स ऑफिस से कमाए हैं। जहां तक तमिलनाडु से इस फिल्म की कमाई का सवाल है, तो यह मात्र 175 करोड़ रुपये है।    

इसके विपरीत रजनीकांत की फिल्म काला का बजट 140 करोड़ रुपये था। विश्व स्तर पर इस फिल्म ने मात्र 159.6 करोड़ रुपये की ही कमाई की, जबकि तमिलनाडु में इसने 60.30 करोड़ और देश के अन्य राज्यों से 37.5 करोड़ रुपये और अमेरिका, ब्रिटेन, मलेशिया, खाड़ी और श्रीलंका से 52.6 करोड़ रुपये की कमाई की थी।

लेकिन सवाल यह है कि तमिल में भी जो हिट फिल्में बनाई जा रही हैं उन्हें भी अखिल भारतीय बाजार को ध्यान में रखते हुए निर्मित किया जा रहा है, और तमिलनाडु के भीतर वे जितनी कमाई कर रही हैं उसकी तुलना में अखिल भारतीय और वैश्विक बाजार में होने वाली कमाई कहीं ज्यादा है। 

बॉक्स ऑफिस में किसी फिल्म की सफलता के लिए एक अच्छी स्टोरीलाइन जरुरी नहीं रह गई है। काला जैसी फिल्म भले ही मुंबई के धारावी जैसे झुग्गी बस्ती में दलितों के जीवन और संघर्ष के संवेदनशील निरूपण पर आधारित हो, लेकिन इस फिल्म को भी रजनीकांत की जेलर जैसी मसाला फिल्म की तरह ही समान सफलता के साथ देखा जायेगा 

बॉक्स ऑफिस सफलता के लिए आज भी सुपरस्टार और लब्ध-प्रतिष्ठ हीरो (और बेहद कम मामलों में हीरोइनों) का मुहताज रहना पड़ता है। 1990 के दशक के अंत तक अमिताभ बच्चन ही एकमात्र अखिल भारतीय स्तर पर सुपरस्टार की भूमिका में छाए हुए थे, लेकिन आज के दिन ओटीटी स्ट्रीमिंग और टीवी चैनलों का ही कमाल है, जिनमें हिंदी डब संस्करण में प्रभाष, अल्लू अर्जुन, महेश बाबू, पवन कल्याण, विजय देवराकोंडा, जूनियर एनटीआर और आरआरआर की सफलता के बाद राम चरण जैसे दक्षिण भारतीय कलाकारों को हिंदी पट्टी में भी युवाओं द्वारा व्यापक पैमाने पर पहचान हासिल है। जबकि तमिल से आज भी रजनीकांत और कमल हासन जैसे पुराने नामों को ही व्यापक पैमाने पर पहचान मिल सकी है। जहां तक कन्नड़ और मलयालम फिल्म उद्योग का प्रश्न है, वहां से यश और मोहन लाल ही अकेले नाम हैं। यह दर्शाता है कि अखिल भारतीय स्तर पर सफलतापूर्वक संक्रमण को किसी ने अंजाम दिया है तो वह तेलुगु फिल्म उद्योग है। 

तेलुगु फिल्म उद्योग के सुनहले संसार में सामंती परिवार का प्रभुत्व  

ओटीटी स्ट्रीमिंग ने तेलुगु फिल्म संसार में जिस एक गुणात्मक परिवर्तन को साकार किया है, वह यह है कि इसने एक्टिंग और निर्देशकीय प्रतिभा के स्थान को पहले की तुलना में लोकतांत्रिक बनाया है। लेकिन यह भी सच है कि कुछ फ़िल्मी परिवारों ने आज भी फिल्म निर्माण और यहां तक कि तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री की ब्लॉक-बस्टर फिल्मों में एक्टिंग के स्थान पर अपना आधिपत्य बनाये रखा है।

उदाहरण के लिए, तेलुगु सुपरस्टार चिरंजीवी के विस्तारित परिवार से ही कम से कम 8 एक्टर्स मौजूद हैं। रामचरण स्वयं चिरंजीवी के बेटे हैं, पवन कल्याण उनके भाई हैं, जबकि अल्लू अर्जुन उनके भतीजे हैं। इसी तरह एनटीआर के परिवार में एनटीआर जूनियर उनके पोते हैं, जबकि उनके पिता हरिकृष्ण और चाचा बालकृष्ण भी एक्टर हैं। प्रभाष स्वंय एक प्रमुख भाजपा नेता और पूर्व सांसद और धन्नासेठ कृष्णम राजू के पुत्र हैं, और बाहुबली जैसे बड़े तमाशाई फिल्म के निर्माण के पीछे इतना अधिक फंड जुटाने में कामयाब हो सके। इसी तरह नागेश्वर राव के वंश में उनके पुत्र नागार्जुन और पौत्र नागा चैतन्य हैं।   

तेलुगु ब्लॉकबस्टर फिल्मों का भविष्य आज भी जहां कुछ स्थापित फिल्म परिवारों के बिग-टिकट हीरो पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो, ज़ी5, हॉटस्टार, सोनी लिव, ईटीवी विन और ‘अहा’ पर नई तेलुगु फिल्मों को हर दिन हर पखवाड़े के भीतर 10-15 नई तेलुगु फिल्मों को जारी करने की बाध्यता ने बदलकर रख दिया है। इसके अलावा फिल्म निर्माता को किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म से मात्र 40-50 करोड़ रुपये की ही कमाई संभव है, और सिर्फ बड़े बजट की ब्लॉकबस्टर के लिए 70-80 करोड़ रुपये कमाना संभव है।

इतने बजट में अपनी जरूरतों को संभव बनाने के लिए ओटीटी प्लेटफार्म के लिए कई छोटे और मझौले बजट की फिल्में रोमांटिक और सामाजिक थीम पर निर्मित की जा रही हैं। इसके चलते आर्यन और विजय देवरकोंडा जैसे एक्टर और निर्देशकों को स्थान मिला है। हालांकि विजय देवरकोंडा के मामले में परिवार की भूमिका भी अहम है, क्योंकि उनके पिता गोवर्धन राव पहले ही टीवी फिल्मों के निर्देशक रहे हैं। इसके बावजूद कहा जा सकता है कि फ़िल्मी परिवारों के माफियाराज के दायरे से बाहर भी युवा अभिनेताओं की एक नई फसल तैयार हो रही है।   

फिल्म निर्माण का अर्थशास्त्र 

सीआईआई की रिपोर्ट के अनुसार तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम की चार भाषाओं में दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग के पास समूचे मीडिया और मनोरंजन उद्योग जिसमें फिल्म, टीवी-ओटीटी और डिजिटल मीडिया चैनल्स भी शामिल हैं, के 35 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा है। जहां तक फिल्म उद्योग का सवाल है तो कुल भारतीय फिल्मों में से लगभग 50 प्रतिशत फिल्में अकेले दक्षिण भारत में निर्मित की जा रही हैं। 

2022 में भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग जिसमें फिल्म, टेलीविजन, ओटीटी प्लेटफार्म, रेडियो, एनीमेशन, संगीत, गेमिंग, डिजिटल एडवरटाइजिंग और प्रिंट माध्यम शामिल हैं, का मुल्यांकन 2.1 लाख करोड़ रूपये है और 2025 तक इसके 4.0 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की उम्मीद है। विश्व में भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन का कारोबार पांचवे स्थान पर है। यह करीब 800 सेटेलाइट टीवी चैनल, 6000 मल्टी-सिस्टम ऑपरेटर्स, 60,000 लोकल केबल ऑपरेटर्स, 7 डीटीएच ऑपरेटर्स, 40 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स एवं विभिन्न आईपीटीवी सर्विस प्रदाताओं एवं अन्य से मिलकर बना है।

2022 में दक्षिण भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग का मुल्यांकन 70,000 करोड़ रूपये था। इसकी तुलना में भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग वित्त वर्ष 2023 में करीब 8.7 लाख करोड़ का है। इसी प्रकार संपूर्ण टेक्सटाइल उद्योग के बाजार का आकार (कारखाने, पॉवरलूम्स और हैण्डलूम्स को मिलाकर) 14.12 लाख करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2023 में भारतीय ई-कामर्स उद्योग का आकार 6.81 लाख करोड़ रूपये है। ये आंकड़े भारत में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के तुलनात्मक वजूद को बयां करते हैं।  

रेटिंग एजेंसी डेलोइट के विश्लेषण के अनुसार भारतीय फिल्म उद्योग में कुल रोजगार की उपलब्धता 5.93 लाख है, जिसमें थिएटर कर्मियों के अप्रत्यक्ष रोजगार को भी शामिल किया गया है। तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ की चार दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग इसके करीब 50 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार है। लेकिन इसकी तुलना में टेलीविजन उद्योग भारत में दुगुने से भी अधिक रोजगार मुहैया कराता है। भारत में टेलीविजन उद्योग एवं केबल टीवी ऑपरेटर्स 12.89 लाख श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। 

जैसा कि पूर्व में जिक्र किया गया है कि भारतीय फिल्मों में कमाई के मामले में अब तक की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्म बाहुबली रही है, जिसने 1,810 करोड़ रुपये का कारोबार किया है। इसके बावजूद हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर जैसे कि बार्बी जिसने 1.2 बिलियन डॉलर या 8,360 करोड़ रुपये की कमाई की है, के साथ कोई मुकाबला नहीं है। हॉलीवुड की बिग-टिकट फिल्मों का निर्माण करने वाली कंपनियां विशालकाय हैं, जिनके पास अकूत वित्तीय पूंजी आधार मौजूद है और वे लंबे समय तक भारतीय फिल्मों को अपने आसपास भी नहीं फटकने देंगी। जहां तक ओपनहाइमर फिल्म का प्रश्न है, इसने दुनियाभर में सिर्फ 65 करोड़ डॉलर की ही कमाई की है, लेकिन भारत में इसने 150 करोड़ रुपये की कमाई कर बार्बी के 100 करोड़ के कलेक्शन को पीछे छोड़ दिया है। 

ओटीटी के बढ़ते प्रभाव ने बड़ी पूंजी के आक्रमण का मार्ग प्रशस्त किया है 

जहां तक ओटीटी स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म के बाजार का प्रश्न है, इस बारे में ओटीटी दर्शक आकार रिपोर्ट 2022 की रेटिंग एजेंसी ओर्मक्स का कहना है कि भारत में 42.4 करोड़ ओटीटी उपभोक्ता हैं। इनमें से कई लोगों ने एक से अधिक ओटीटी प्लेटफार्म की सदस्यता ले रखी है, और औसतन एक दर्शक के पास 2.4 ओटीटी चैनल्स की सदस्यता है। वास्तव में देखें तो टाटा प्ले जैसे केबल टीवी सेवा प्रदाता ने अपने टीवी चैनल पैकेज के उपभाक्ताओं को अतिरिक्त 99 रुपये शुल्क में 10 ओटीटी प्लेटफार्म की पेशकश प्रदान कर रखी है। विभिन्न भाषाओं में 40 से अधिक ओटीटी प्लेटफार्म मौजूद हैं और स्वाभाविक रूप से उनके बीच में भारी प्रतिस्पर्धा जारी है।

प्रमुख ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स, डिज्नी हॉटस्टार, अमेज़न प्राइम एवं सोनी पिक्चर्स जिसके पास सोनी लिव का मालिकाना है, में से अधिकांश अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं।  

अब इन्होंने फिल्मों के निर्माण का काम शुरू कर दिया है और इन्होंने अपने प्लेटफार्म के लिए फिल्म प्रोडक्शन का वित्तपोषण कर रही हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि क्ल्पथी अगोरम जैसे पारंपरिक तौर पर व्यक्तिगत रूप से फिल्म निर्माण करने वाले, या सत्या ज्योति फिल्म या लयका प्रोडक्शन जिसने पोंनियिन सेल्वन सहित 2022 में 14 फिल्मों का निर्माण किया था, तक के लिए जगह मुश्किल पड़ती जा रही है, और उन्हें अमेज़न प्राइम जैसे अमेरिकी दिग्गजों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इन दिग्गज कंपनियों के पास वित्तीय संसाधनों का अथाह भंडार है।

उदाहरण के लिए अमेज़न प्राइम ने हाल ही में घोषणा की है कि वह प्रति वर्ष 12-15 फिल्मों को जारी करने जा रही है। आईटी दिग्गज एप्पल ने फिल्मों के निर्माण के लिए प्रति वर्ष 1 बिलियन डॉलर का आवंटन किया है। एप्पल पहले सिनेमाघरों में इन फिल्मों को जारी करेगा और बाद में ओटीटी प्लेटफार्म पर ये फिल्में उपलब्ध होंगी क्योंकि ओटीटी चैनलों पर एक बार जारी करने के बाद सिनेमाघरों में ये फिल्में कम दर्शकों को आकर्षित कर पाती हैं।  

लेकिन सवाल यह है कि ओटीटी युग में, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के साथ मिलकर वैश्विक बड़े कॉर्पोरेट घराने लगभग समूचे फिल्म निर्माण के व्यवसाय के साथ फिल्म की स्क्रीनिंग को ही अपने कब्जे में करने जा रहे हैं। इसी प्रकार सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या और सिनेमाघरों की संख्या में लगातार गिरावट हो रही है। यह एक वैश्विक परिघटना है। अमेरिका में हुए एक सर्वेक्षण में पता चला है कि 70% से अधिक दर्शक अब सिनेमाघरों के बजाय अपने घरों में ओटीटी पर फिल्म देखने को प्राथमिकता दे रहे हैं। भारत में भी स्थितियां इसी अनुपात में इसी प्रकार के आंकड़ों की ओर इशारा कर रही हैं।

जनचौक से अपनी बातचीत में विजयवाड़ा की एक कंप्यूटर टेकी लेकिन फिल्मों की शौक़ीन किरण ने बताया कि 90 के दशक के दौरान विजयवाड़ा जैसे मझौले आकार के शहर में 100 से अधिक सिनेमाघर हुआ करते थे। इनमें से करीब 30-40 अब बंद हो चुके हैं, और 10 सिनेमाघरों को मॉल में तब्दील कर दिया गया है, जिनमें से हर मॉल में 4-5 मल्टीप्लेक्स चल रहे हैं। अपने निष्कर्ष में उनका कहना था कि ओटीटी एक हद तक सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखने को सीमित कर सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से ठप नहीं कर सकते। युवा आज भी समूह में सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देखना पसंद करता है। 

कुल मिलाकर एक मिश्रित प्रभाव 

तुलनात्मक रूप से देखें तो ओटीटी स्ट्रीमिंग ने मध्यम एवं छोटे बजट की गुणवत्तापूर्ण फिल्म निर्माण के लिए भी गुंजाईश बनाई है। ये फिल्में कलात्मक रूप से संपन्न हो सकती हैं और साथ ही व्यावसायिक दर्शकों को भी लक्षित कर सकती हैं। इस ट्रेंड को सबसे बेहतरीन ढंग से मलयालम फिल्म उद्योग ने प्रदर्शित किया है।

उदाहरण के लिए, फिल्म जय जय जय जय हे एक पित्रसत्तात्मक मुर्गी पालक किसान में बढ़िया व्यंग्यबाण के रूप में देखी जा सकती है। इसी प्रकार, जन गण मन फिल्म एक आम राजनीतिक नाटकीय फिल्म है जिसमें पुलिस दमन, छात्रों और महिलाओं पर अत्याचार, जातिवाद और सांप्रदायिकता पर जोर दिया गया है, जो कि मणिरत्नम के बॉम्बे की तुलना में कम जटिल है। इन दोनों फिल्मों के निर्माण में 6 करोड़ रुपये से कम का बजट लगा, लेकिन बॉक्स ऑफिस में वो भी मुख्यतया केरल में इन फिल्मों ने 50 करोड़ रुपये का कारोबार किया।

हालांकि खास स्थानीय मार्केट के लिहाज से स्थानीय स्वाद में परोसना इन फिल्मों के लिए लाभकारी साबित हुआ है, लेकिन तेलुगु या तमिल ब्लॉकबस्टर या कान्तारा या केजीएफ़ जैसी कन्नड़ फिल्मों की तरह इन फिल्मों को अभी भी अखिल भारतीय स्तर पर प्रेरित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नए डिजिटल तकनीक ने दक्षिण भारत में फिल्म निर्माण को मिले-जुले रूप में प्रभावित किया है। 

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