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Categories: बीच बहस

कोरोना ने खोल दी सत्ता और व्यवस्था की कलई

कोरोना के बाद दुनिया की व्यवस्था नया स्वरूप लेगी। हर देश में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। क्या हम भारतीय भी सोच सकते हैं कि कोरोना के बाद भारत में जो स्थापित व्यवस्था है उसकी जगह कोई नया स्वरूप आ सकता है?

यह सवाल सिर्फ भारत का ही नहीं, दुनिया भर के देशों में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। अमेरिका में आक्रामक राष्ट्रवाद ध्वस्त होता नजर आ रहा है। कोरोना संकट से निपटने में लाचार रही ट्रम्प की आक्रामक राष्ट्रवादी सरकार के खिलाफ नया मॉडल जन्म ले रहा है। हो सकता हो तत्काल पूंजीवाद के घोड़े पर बैठे अमेरिका में बदलता न दिखे मगर लंबे समय के लिए सफर की दिशा बदल जाएगी।

वैश्वीकरण की गति पर कोरोना ने लगाम लगा दी है। संकट में दूसरों पर निर्भरता के दुष्परिणाम सामने आ चुके हैं। अमेरिका ने चीन से भारत भेजे जाने वाले 5 लाख टेस्ट किट चीनी कंपनी को ज्यादा पैसे देकर अपने यहां मंगा लिए तो छोटे लैटिन अमेरिकी देशों की निर्भरता की लाचारी दुनिया के सामने जाहिर हो गई। भारत ने भी अंत मे थक-हारकर पीपीई किट घरेलू स्तर पर बनाने पर जोर देना शुरू कर दिया। तात्पर्य यह है कि दूसरे देशों पर अति-निर्भरता वाली व्यवस्थाएं खुद के गिरेबाँ में झाँकना शुरू कर रही हैं।

प्रचंड बहुमत की सरकारें व सनकी राज्य व्यवस्था मनमाने तरीके से जनता पर पाबंदियां थोपना शुरू करेंगी अर्थात निरंकुश शासन को मजबूती देने वाले कदम उठाएंगी। कोरोना संकट के कारण सामने आई खामियों से कई जगह व्यवस्थाएं दुरुस्त करने की कोशिशें की जाएंगी तो कई जगह स्थापित व्यवस्थाओं को बरकरार रखने के लिए जनता पर सख्त निगरानी के साथ क्रूरतम फैसले लिए जाएंगे।

मानव सभ्यता कभी रुकती नहीं है और व्यापार सभ्यता का अनिवार्य हिस्सा रहा है।कोई भी देश हो, कोई भी समाज हो अपने संसाधनों के अतिरेक का दूसरे तरह के संसाधनों की कमी की पूर्ति के लिए उपयोग करता है। दुनिया की जो ताकतवर सभ्यताएं रही हैं उन्होंने अपने उपलब्ध संसाधनों का नियंत्रित उपयोग किया है व घरेलू निर्माण पर जोर दिया।

इतिहास में देखा गया है कि सामानों की आवाजाही के साथ स्पेनिश फ्लू से लेकर प्लेग तक की महामारियां भी साथ में आवागमन करती रहीं। महामारियों ने कई पुरानी मान्यताओं को तोड़ा व नई मान्यताओं को स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई।महामारियां धर्मसत्ता की नाकामियां जनता के सामने रखती हैं और जनता कुछ धारणाओं को छोड़कर नई धारणाएं स्थापित करती है। जहां महामारियों के तुरंत बाद वैज्ञानिक सोच व तर्क की व्यापकता पैदा हुई उन सभ्यताओं ने आगे चलकर दुनिया का नेतृत्व किया।

लाज़िम है जब भी कोई संकट आता है तो हुक्मरान उससे निपटने के तरीके ढूंढने लग जाते हैं और कुछ सनक में खतरे को कमतर आंकने की भूल कर बैठते हैं। स्पेनिश फ्लू को लेकर भी यूरोप ने शुरुआत में जानकारियां छिपाई व कोरोनो को लेकर भी चीन पर जानकारी छुपाने का आरोप है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस खतरे को शुरू में मानने से इनकार कर दिया था और भारतीय प्रधानमंत्री ने बिना व्यवस्था किये लॉकडाउन थोप दिया था। भारत के गरीब मजदूरों पर किया गया यह दुनिया का क्रूरतम मजाक है। सत्ता की सच्चाई जनता के सामने आई है यह महामारी द्वारा भारतीय जनता को भविष्य के सोचने को मजबूर करने का महत्वपूर्ण सबक दिया गया है।

भारत की जनता दुनिया की सबसे ज्यादा पाखंड व अंधविश्वास में लिपटी जनता है क्योंकि यहां दुनिया के कई धर्मों का जमावड़ा है। कोरोना ने दुनिया भर में धर्म के नाम पर जो धंधा चल रहा था उसके साथ-साथ हुक्मरानों की नाकामियों व दूरदृष्टि के अभावों को उजागर करके रख दिया है।

भारत की जनता क्या सबक ले सकती है? कोरोना संकट के बीच तेल के दाम दुनियांभर में गिरे मगर भारत सरकार ने टैक्स बढ़ा दिया।

लाखों लोगों को विदेशों से हवाई जहाज में मुफ्त में लाया गया और करोड़ों मजदूरों को घर जाने से रोका, रहने-खाने की व्यवस्था तक का भरोसा नहीं दिला पाई और जब घर जाने की जिद्द की गई तो पहले तो लाठियां बरसाईं फिर घर भेजने की आधी-अधूरी व्यवस्था की मगर किराया मजदूरों के ऊपर थोप दिया।

अमीरों के लिए राहत पैकेज की घोषणा और गरीबों को खाने के लिए लाइनों में खड़ा कर दिया। किसान को किसान सम्मान निधि की घोषित किश्त देकर पल्ला झाड़ लिया।

संकट के बीच सरकार ने हजारों नौकरियों के पद समाप्त कर दिए और न्यायपालिका ने आरक्षण पर कैंची चलानी शुरू कर दी। अमीरों के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये इंसाफ का दरवाजा खुला रखा और दर्जनों मजदूरों की मौत व इलाज के अभाव में मरती जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया।

किसान संकट में लड़ने के लिए एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा। इनको भावी संकट के लिए और मजबूत करने के बजाय कोरोना संकट के बीच किसानों की लाखों हेक्टेयर जमीन विदेशी कंपनियों को देने की तैयारी कर ली।

जिस मंदिर-मस्जिद के झगड़े के लिए जनता लड़ रही थी वो सब बंद पड़े हैं। जिन निजी हाथों को बेहतर बताकर देश के संसाधन लूटने की इजाजत दी थी वो संकट के समय देश को कुछ देने के बजाय सबसे पहले भिखारी बनकर खड़े हो गए।

जिन निजी अस्पतालों को बेहतर चिकित्सा के स्थल बताकर महिमामंडित किया जाता रहा उन्होंने संकट में इलाज करने से इनकार कर दिया और संकट से जूझने के लिए सरकारी अस्पतालों को अकेले छोड़ दिया।

इससे सिद्ध होता है कि भारत की व्यवस्था चोर लुटेरों द्वारा, चोर लुटेरों की, चोर लुटेरों के लिए ही है। यहां सरकारों से उम्मीद करना, अदालतों में इंसाफ तलाशना, धर्मों में संतुष्टि खोजना भारत की जनता का मतिभ्रम है। भारत में एक बड़ी क्रांति की जरूरत है। कोरोना संकट से सबक लेकर सत्ता परिवर्तन के बजाय व्यवस्था परिवर्तन की जंग शुरू होनी चाहिये। भारत के बुद्धिजीवियों को चाहिए कि इस तरफ सोचना, बोलना व लिखना शुरू करें ताकि कोरोना बाद के बदलावों में भारत की जनता अपना स्थान तय कर ले।

(मदन कोथुनियां वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on May 9, 2020 7:47 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi