मतदाताओं की विवेक-सम्मत रणनीतिक समझदारी ‎महत्वपूर्ण है

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लोकतंत्र में चुनाव से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं होता है। जीवन की तरह चुनाव में भी महत्वपूर्णता का आधार सत्य से बनता है। मुश्किल यह है कि चुनाव प्रचार में सबसे अधिक अवहेलना सत्य की ही होती है। व्यवस्था चाहे जितना भी जोर लगाये, प्रयोग और पराक्रम का जितना भी कमाल दिखा ले अंततः सत्य को नाकारा नहीं बनाया जा सकता है। मंच पर हवा में लेट सकने का जादू दिखानेवाले जादूगर को भी अपने वास्तविक बिछावन पर ही लेटना और सोना पड़ता है। भारत की राजनीतिक परिस्थिति में इस समय सत्य की नहीं विश्वास और आस्था का अधिक बोलबाला है। सत्य का विश्वास और आस्था से कैसा संबंध होता है! यह संबंध अच्छा हो सकता है, यदि विश्वास और आस्था सत्य को विस्थापित करने की नीयत से मुक्त रहे! चुनाव प्रचार में भाषायी उलझावों, भाषा में समाधानों, कह लें बस जुबानी जंग का महत्व बढ़ना लोकतंत्र के लिए कम दुखदायी नहीं होता है।     

सत्य का संघर्ष असत्य और झूठ से नहीं होता है। झूठ सत्य की परछाई ‎होती है। छाया से युद्ध और संघर्ष नहीं किया जा सकता है। छाया के ‎विरुद्ध जाना प्रकाश के विरुद्ध जाना है। सत्य का युद्ध और संघर्ष ‎विस्थापनकारी विश्वास और आस्था से होता है। सत्य सत्यापन के अधीन और वास्तविक होता है। विश्वास और आस्था ‎की स्थिति आभासी होती है। सभ्यता में सत्य का विस्थापनकारी विश्वास और आस्था ‎से युद्ध और संघर्ष सदा से रहा है।     ‎

नये वातावरण में दुनिया को उदार लोकतंत्र का सपना आया। शासकों के द्वारा व्यक्तिगत अधिकारों का ‎विधिवत सम्मान और सेवा की संवैधानिक ‎स्वीकृति के बदले शासकों को शासन के लिए शासितों की सहमति ‎उदार लोकतंत्र की ‎शर्त है। यानी, शासन कम-से-कम और सेवा अधिक-से-अधिक उदार लोकतंत्र का गुण ‎होता है। भारत में डॉ मनमोहन सिंह ने पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्तमंत्री की हैसियत से उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) की त्रेत साधना शुरू की। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने उदार लोकतंत्र के सपने को संजोना शुरू किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद डॉ मनमोहन सिंह ने उदार लोकतंत्र के सपनों का पीछा करना शुरू किया था।

डॉ मनमोहन सिंह की सरकार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार थी। उदार लोकतंत्र की सैद्धांतिक समझ और राजनीतिक सहानुभूति रखते हुए भी उसकी छेदों और अंतर्निहित ‘अनिवार्य मूल्यों’ से वामपंथी राजनीति सावधान थी। वामपंथी दल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) में शामिल थे। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को उदार लोकतंत्र का पीछा करने की छूट तो थी, लेकिन उनके आकाश की सीमाओं को तय करने के लिए यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार को सलाह देने के लिए पहली संयुक्त प्रगतिशील ‎गठबंधन (UPA) सरकार ‎के दौरान सोनिया गांधी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय ‎सलाहकार परिषद (NAC) का गठन हुआ। कहना न होगा कि इस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC)‎ की लागू की गई कई सलाह ऐतिहासिक महत्व की साबित हुई। ‎  

तब की विपक्षी, भारतीय जनता पार्टी डॉ. मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाते हुए ‘मौनमोहन’ कहते नहीं थकते थे। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार को नीति पंगु (Policy Paralyzed) सरकार कह-कहकर लोट-पोट होते रहते थे। यह सच है कि  प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह अनाप-शनाप बोलने से गरिमामय परहेज करते थे और बिसिर-पैर की बात नहीं हांकते रहते थे। वे बातों को गुलेटते नहीं थे। उन्हें अपनी सीमाओं, सफलताओं और विफलताओं का गहरा एहसास था। वे अपने ‘अवतारी’ होने के भ्रम से सदा मुक्त थे। देश के आगे खड़ी चुनौतियों का भी उन्हें सटीक अनुमान था। वास्तविक उदार लोकतंत्र की तरफ बढ़ना इतना आसान नहीं था। इसका बहुत बड़ा कारण वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थिति में उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) का वास्तविक कार्य-क्रम और कार्य-सूची (एजेंडा) से विचलित होते चले जाना।

विकसित देश के राजनेताओं ने जोर-जोर से भूमंडलीकरण को समस्या कहना शुरू ‎कर दिया। इन सब से उत्पन्न राजनीतिक व्यापारिक परिस्थिति के कई अनुकूलताओं का बहुत तेजी सी अन-अनुकूलताओं में बदलना शुरू हो गया था। अब तक ‘तृतीय विश्व’ के अनेक देश उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) के फंदे में फंस चुके थे। महामंदी का दौर शुरू हो गया था। वैसे, अमेरिका में आधिकारिक तौर पर तो दिसंबर 2007 में शुरू हुई और जून 2009 ‎तक चली, लेकिन इस का असर ‎2005 से ही शुरू होकर 2012‎ तक बना रहा था। ‎कहने का आशय यह है कि विपरीत वैश्विक परिस्थिति में डॉ. मनमोहन सिंह ने घरेलू स्थिति को संभालते हुए फूंक-फूंक अपनी सरकार चलाई।

उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) की त्रेत के विफल होने का संकट अपनी जगह था। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश की अंदरूनी राजनीति में खतरनाक और भयावह दौर शुरू हो गया। 2014 में विफल ‘त्रेत’ को ‘त्रेता’ ने काबू में कर लिया। झूठ और भ्रम का बोल-बाला बढ़ने लगा। भ्रामक वाग्मिता  (Misleading Rhetoric)‎ और तथ्यों के भ्रमाच्छादन के खेल ने अपना कमाल दिखाना और कमल खिलाना शुरू कर दिया। यहां ध्यान देने की बात है कि सत्य का संघर्ष असत्य और झूठ से नहीं होता है।

झूठ तो सत्य की परछाई ‎होता है। छाया से युद्ध और संघर्ष नहीं किया जा सकता है। छाया के ‎विरुद्ध जाना प्रकाश के विरुद्ध जाना है। सत्य का युद्ध और संघर्ष ‎विश्वास और आस्था से होता है। सत्य सत्यापन के अधीन और वास्तविक होता है। विश्वास और आस्था ‎की स्थिति आभासी होती है। विश्वास और आस्था‎ को किसी सत्यापन की जरूरत नहीं होती है। सभ्यता में सत्य का विश्वास और आस्था ‎से सदा युद्ध और संघर्ष रहा है। यथार्थ को विलोपित करके संभावनाओं को यथार्थ के रूप में पेश करना, अर्थात संभावनाओं का ‎यथार्थीकरण तथ्यों के भ्रमाच्छादन की सब से खतरनाक प्रविधि है।

उदाहरण कई हैं, लेकिन एक का उल्लेख प्रासंगिक है। 2024 में जो यथार्थ है यानी जो वास्तविक स्थिति है बेरोजगारी की, जीवनयापन की कठिनाइयों की, खाद्य सामग्री और जीवन रक्षक दवाइयों की महंगाई की, विषमता की, अन्याय की, ज्ञात लोगों के ज्ञात डर की, चारों तरफ मची लूट की, खेती-किसानी और किसानों के अस्तित्व संकट की, लोकतंत्र पर खतरे की, संविधान पर संकट की, राष्ट्र की संघात्मकता एकता की, गंगा-जमुनी संस्कृति के आहत होने की, महिलाओं की अस्मत की, युवाओं की भावनाओं की, बढ़ती हुई आपराधिक घटनाएं, भावनात्मक हिंसा की क्रूरता की प्रवृत्ति की, जनविद्वेषी बयानबाजी (Hate Speech) स्थिति को किनारे करते हुए, सोद्देश्य भेदभाव और कपटी दुर्भावनाओं की वास्तविकता को, यथार्थ को भावनात्मक लपेटे में ले कर ‎2047 ‎की कपोल कल्पित संभावनाओं को आज के यथार्थ की तरह झलकाकर वोट खींचने की कोशिश करना संभावनाओं के ‎यथार्थीकरण ‎की कुत्सित प्रक्रिया का उदाहरण है।

मन को मथनेवाला सवाल है कि हम अपनी हित-विरुद्धता के प्रति कैसे सहमत हो जाते हैं! कोई अचरज नहीं! इसके लिए सत्ता से असहमति के निषेध और सत्ता से अनिवार्य सहमति के मासूम स्वीकार की परिस्थिति के ‎लिए सत्ता के शिखर से मीडिया, खासकर तरंगी और तुरंगी मीडिया को शिकारी बना दिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार अपना अनुभव साझा किया था। वे बता रहे थे, रेल में जब बैठने की जगह नहीं मिलती थी तो वे ज्योतिषी की तरह लोगों का हाथ देखने लगते थे, लोगों को उनका भविष्य बताने लगते थे। लोग उन पर सहजता से विश्वास कर लेते थे। इस प्रक्रिया में उन्हें बैठने की जगह आसानी से मिल जाया करती थी। इसी प्रक्रिया में सहज विश्वास के शिकार कर लेने का रहस्य छिपा हुआ है। सहज विश्वास का शिकार कर शिकारी अपने लिए सम्मान और स्थान बना लेता है। लोगों के साथ धोखा-धड़ी, लोगों को ठगने के लिए विश्वास का शिकार ‎धुरफंदिया राजनीति में भी खूब होता है। सवाल को जवाब की तरह लोगों के मन-मस्तिष्क के सामने रख दिया जाता है, प्रश्नवाचकता को लोगों की वाचकता की तरह हासिल कर लिया जाता है। “साधु हैं?” “साधु हैं।” की तरह! धुरफंदिया राजनीति ने स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन ला दिया। 

उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) की हवा ने लोक-कल्याणकारी पर उदार लोकतंत्र का ऐसा राजनीतिक लेप चढ़ा दिया कि संवैधानिक लोकतंत्र ही दुर्लभ हो गया। लोक-कल्याणकारी‎ योजनाओं और लाभार्थी योजनाओं में चारित्रिक अंतर है। लोक-कल्याणकारी योजनाओं का संबंध विषम समाज में वंचित नागरिकों के संवैधानिक अनुपालन से होता है। लाभार्थी योजना का संबंध शासकीय निर्णयों की व्यक्तिगत कृपा से होता है। विषाक्त हितैषिता ने लोक-हितैषी लोकतांत्रिक विचारधारा में, नीति, नैतिकता में उथल-पुथल मचा दिया। लोक-हितैषी विचार को विषाक्त हितैषिता के धुरफंदिया राजनीति ने एकदम से तहस-नहस कर दिया। धुरफंदिया राजनीति के प्रयोग और पराक्रम के चलते विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

यह सब हो गया, कैसे हो गया! लोकलुभावन राजनीति के बहकावे में हुआ। क्योंकि लोकलुभावन राजनीति अंततः फासीवाद के राजनीतिक हथियारों का ही इस्तेमाल करती है। लोकलुभावन राजनीति के चक्कर में पड़कर भारत का लोकतंत्र फासीवाद के असर में आ गया। असल में फासीवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसकी राजनीति समाज में समानता, ‎लोकतंत्र या ‎सार्वभौम मानव मूल्यों के प्रति जरा भी सम्मान नहीं रखती है। बल्कि कहना चाहिए कि ‎उनके प्रति हमेशा शत्रुता, युद्ध और संघर्ष का भाव रखती है। ‎

इस समय आम नागरिकों और मतदाताओं के सामने बहुत बड़ी चुनौती है कि सत्ता और शक्ति केंद्र के द्वारा चुनाव प्रचार के नाम पर झोंके जा रहे भावनाओं के प्रबल प्रवाह का मुकाबला अपनी सचेत बुद्धिमत्ता से करे और अपने जीवन के राजनीतिक प्रश्नों को अपनी-अपनी स्थितियों के संदर्भ में पहचाने। राजनीतिक प्रश्न क्या होता है? नेताओं के सामने के राजनीतिक प्रश्न और आम नागरिकों और मतदाताओं के सामने का राजनीतिक प्रश्न थोड़ा भिन्न किस्म का होता है। नेताओं के लिए राजनीतिक प्रश्न का संबंध लोकतांत्रिक परिस्थिति बनाये रखने के लिए लोकतांत्रिक सत्ता पर अधिकार हासिल करने से होता है। आम नागरिकों और मतदाताओं के सामने राजनीतिक प्रश्न का संबंध लोकतांत्रिक परिस्थिति में जीवनयापन की सहज उपलब्धता से होता है। नेताओं और आम मतदाताओं जोड़नेवाला तत्व है लोकतंत्र। आज सबसे बड़ी चुनौती है लोकलुभावन राजनीति और फासीवादी चंगुल से लोकतंत्र को मुक्त कराने की। हम त्यागी और बलिदानी पुरखों की हड़पबाज लोभी संतान नहीं हैं! 2024 के आम चुनाव में मताधिकार के प्रयोग में मतदाताओं की विवेक-सम्मत रणनीतिक समझदारी काम आयेगी। निश्चित ही, मतदाताओं की विवेक-सम्मत रणनीतिक समझदारी ‎महत्वपूर्ण है।  लेकिन इंतजार तो करना ही होगा न!

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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