Tuesday, April 16, 2024

क्यों इस मुकाम पर पहुंचा ‘बहुजन’ विमर्श?

‘दलित’ विमर्श के दो प्रमुख बुद्धिजीवियों के इन कथनों पर गौर कीजिएः “यह अपेक्षा की जा सकती है कि सब-ऑल्टर्न सामाजिक समूहों का दक्षिणपंथी मंच पर नव-आगमन भारतीय जनता पार्टी की जुबानी आक्रामकता में कमी लाएगा और राज्य (state) को सामाजिक न्याय की चिंताओं से रू-ब-रू होने के लिए मजबूर करेगा। इस घटनाक्रम में यह संभावना निहित है, जिससे दक्षिणपंथी मंच समाज सुधार के उसूलों के प्रति अनुकूल बन सके, आदिवासी पारिस्थितिकीय (ecological) नजरिए को समझ सके और सत्ता के उच्च स्तरों का लोकतांत्रीकरण कर सके। ऐसे आश्वासन और उन पर प्रभावी अमल से भाजपा ठोस रूप से लोकतांत्रिक पार्टी बन सकेगी, ऐसी पार्टी जो भारत की सब-ऑल्टर्न जनता के कल्याण एवं सशक्तीकरण के प्रति जिम्मेदार हो।”

यह लेख दिसंबर 2023 में तीन हिंदीभाषी राज्यों के विधानसभा चुनावों का नतीजा आने के तुरंत बाद लिखा गया। उन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को भारी जीत मिली। यह सामने आया कि बड़ी संख्या में दलित, ओबीसी और आदिवासी- यानी ‘बहुजन’ मतदाताओं ने इन चुनावों में भाजपा को वोट दिया। लेख एक अंग्रेजी अखबार में छपा। इसे नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एसिस्टेंट प्रोफेसर हरीश एस. वानखेड़े ने लिखा। (BJP’s subaltern Hindutva strategy and the crucial social justice test – The Hindu)

दूसरी टिप्पणी एक अन्य अंग्रेजी अखबार में छपी। इसे एक अन्य प्रमुख ‘दलित’ बुद्धिजीवी संजय येंगड़े ने लिखा। इस टिप्पणी में दलील दी गई कि जो सियासत कभी बहुजन समाज पार्टी की थी, अब राहुल गांधी वही राजनीति कर रहे हैं।कहा गया कि वर्तमान युग में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं की विजय हो रही हैः ब्राह्मणवादी और बुद्धवाद। यह भी कहा गया- “इस समय राष्ट्रीय स्तर पर दो दलित राजनीतिक पार्टियां हैः बसपा और कांग्रेस।” मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की गई कि “कांग्रेस का नेता कोई दलित हो, यह किसी क्रांति से कम नहीं है।” सार यह कि कांग्रेस आज बुद्धवाद और बहुजन हितों की पार्टी बन गई है।  (Why Rahul Gandhi’s politics is that of the BSP | The Indian Express)

इन दोनों टिप्पणियों का सार यह है कि एक समय “कांग्रेस और भाजपा को सांपनाथ और नागनाथ के रूप में देखने वाला ‘दलित’ विमर्श” अब इन दोनों पार्टियों के बीच ही सामाजिक न्याय, समाज सुधार और बहुजन सशक्तीकरण की संभावना तलाशने लगा है। उसका एक खेमा अब “सामाजिक रूप से भाजपा के लोकतांत्रिक बन जाने” की उम्मीद जोड़ रहा है, तो दूसरा खेमा कांग्रेस को अपनी सोच का प्रतिनिधि मानने लगा है। यहां ये उल्लेख जरूरी है कि यह सिर्फ दो बुद्धिजीवियों की बात नहीं है। बल्कि ये दोनों बुद्धिजीवी दो धाराओं की नुमाइंदगी कर रहे हैं। और बात सिर्फ दलित बुद्धिवीजियों तक सीमित नहीं है। बीते तीन दशकों में ओबीसी विमर्श को आगे बढ़ाने वाले अनेक बुद्धिजीवी और यहां तक राजनीतिक दल भी इन धुरियों पर गोलबंद होते दिख रहे हैं।

भाजपा ने हिंदुत्व की अपनी विचारधारा नहीं छोड़ी है, बल्कि अब अधिक खुलकर और आक्रामक अंदाज में इसके मुताबिक समाज और राष्ट्र को ढालने की कोशिश में जुट चुकी है। यह परियोजना पूरी हुई, तो दलित-पिछड़ी जातियों की वह पारंपरिक सामाजिक स्थिति औपचारिक रूप से बहाल हो सकती है, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जगी चेतना के कारण और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रहा था।

उधर कांग्रेस ने महात्मा गांधी का नाम और उनकी तस्वीर से तौबा नहीं किया है, जबकि पिछले तीन-चार दशकों का दलित विमर्श गांधीजी की विरासत को लांछित करते हुए विकसित हुआ था।

कांग्रेस ने जवाहर लाल नेहरू की विरासत को ठुकराने की घोषणा भी नहीं की है, जबकि ओबीसी बुद्धिजीवियों ने गुजरे दशकों में इस कथनाक को खूब प्रचारित किया है कि पंडित नेहरू ओबीसी आरक्षण के विरोधी थे।

लेकिन यह गौरतलब हैः

  • भाजपा ने हिंदुत्व की अपनी विचारधारा नहीं छोड़ी है, बल्कि अब अधिक खुलकर और आक्रामक अंदाज में इसके मुताबिक समाज और राष्ट्र को ढालने की कोशिश में जुट चुकी है। यह परियोजना पूरी हुई, तो दलित-पिछड़ी जातियों की वह पारंपरिक सामाजिक स्थिति औपचारिक रूप से बहाल हो सकती है, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन में दौरान जगी चेतना के कारण और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रहा था।
  • उधर कांग्रेस ने महात्मा गांधी का नाम और उनकी तस्वीर से तौबा नहीं किया है, जबकि पिछले तीन-चार दशकों का दलित विमर्श गांधीजी की विरासत को लांछित करते हुए विकसित हुआ था।
  • कांग्रेस ने जवाहर लाल नेहरू की विरासत को ठुकराने की घोषणा भी नहीं की है, जबकि ओबीसी बुद्धिजीवियों ने गुजरे दशकों में इस कथनाक को खूब प्रचारित किया है कि पंडित नेहरू ओबीसी आरक्षण के विरोधी थे।

तो आखिर क्या बदल गया है कि अब दलित-ओबीसी विमर्श के एक बड़े हिस्से में भाजपा, तो दूसरे हिस्से में कांग्रेस स्वीकार्य हो गई है। जहां तक कांग्रेस की बात है, तो यह तर्क खोखला है कि पार्टी ने अब दलित अध्यक्ष चुन लिया है, इसलिए वह स्वीकार्य हुई है। इसलिए कि मल्लिकार्जुन खड़गे कोई पहले दलित कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं। जगजीवन राम जैसे नेता दशकों पहले इस पार्टी में यह पद संभाल चुके हैं। एक समय बसपा से जुड़े बुद्धिजीवी जगजीवन राम और उनके जैसे नेताओं को “सवर्णों का सेवक” बता कर उनकी आलोचना करते थे।

जाहिरा तौर पर नए उभरे दलित नेतृत्व द्वारा ऐसा तर्क अपनी विशेष हैसियत जताने की कोशिश में दिया जाता था।ऐसा खुद को स्वायत्त दलित नेतृत्व के रूप में पेश करने के लिए किया जाता था। बहरहाल, यह तथ्य है कि जिस दायरे में जगजीवन राम जैसे नेताओं ने सियासत की, खड़गे का दायरा उससे अलग नहीं रहा है। खड़गे को कभी गांधी या नेहरू का नाम लेने पर एतराज नहीं रहा। बल्कि आज भी वे ऐसा सम्मान की भावना के साथ करते हैं।

तो सवाल यह है कि आखिर क्या बदल गया है, जिससे ‘बहुजन’ विमर्श में स्वायत्तता और अलग पहचान के साथ राजनीति करने की ललक पृष्ठभूमि में चली गई है?

बदला यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/भाजपा ने अपनी कथित सोशल इंजीनियरिंग से ‘बहुजन’राजनीति को उस आधार से बेदखल कर दिया है, जिस पर वह खड़ी थी। उसने ये आधार जातीय पहचान और प्रतिनिधित्व के तर्क पर तैयार किया था। इस तरह से ये पूरा विमर्श प्रतीकात्मक उत्थान पर केंद्रित था।

अगर पृष्ठभूमि में जाएं, तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि यह विमर्श इंसाफ की समझ को अलग-अलग दड़बों में सीमित करने की एक विश्व-व्यापी परियोजना का हिस्सा रहा है। इस परियोजना को शासन-तंत्र ने एक खास मकसद से आगे बढ़ाया। विश्वविद्यालयों से लेकर शोध संस्थानों, थिंक टैंक, मीडिया आदि के जरिए ये परियोजना आगे बढ़ाई गई, जिसके लिए सरकारों और कॉरपोरेट पूंजी ने पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए। मकसद इंसाफ की समझ को खंडित करना था, ताकि व्यवस्था में बड़े परिवर्तन की संभावना को कुंद कर दिया जाए।

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से शासक तबकों का खास प्रयास यह रहा है कि सार्वजनिक विमर्श से राजनीतिक-अर्थव्यवस्था (पॉलिटिकल इकॉनमी) के सवालों को बाहर रखा जाए। इस मकसद को हासिल करने के लिए वैश्विक स्तर पर एक पूरा बौद्धिक उद्योग खड़ा किया गया, जिसे Theory industry के नाम से जाना जाता है।

यहां ये तथ्य खास तौर पर उल्लेखनीय है कि ऐसे सारे विमर्श प्रभु वर्ग के दायरे में सीमित रहे हैं। इसमें भागीदार वे तबके ही रहे हैं, जो प्रभु वर्ग में सम्मिलित हो चुके हैं। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि बात भले बहुजन की की जाती रही हो, विमर्श में आम जन की बुनियादी मुश्किलों और रोजी-रोटी के प्रश्नों के लिए कोई जगह नहीं रही है। इस रूप यह विमर्श भले ‘बहुजन’ होने का दावा करता हो, लेकिन असल में इसने बहुजन को भटकाने का काम किया है।

असल मुद्दा यह है कि ‘बहुजन’ को किस आधार पर परिभाषित किया जाता है। इसमें तमाम आधारों पर वंचित लोगों को शामिल माना जाता है, या सिर्फ किसी एक आधार पर शोषित तबकों को अन्याय के शिकार बाकी समूहों से अलग बताने की कोशिश की जाती है। पिछले चार-पांच दशकों में एक बड़े समूह ने कोशिश सिर्फ जातीय आधार पर ऐसा करने की की। चूंकि उसने पूंजी और वर्ग के सवाल से इस विमर्श को अलग कर दिया, इसलिए सहज ही वह शासक वर्गों के लिए एक उपयोगी समूह बन गया। इस रूप में यह खुद ही एक अभिजात्य विमर्श बन गया।

‘बहुजन’ विमर्श में ध्यान सिर्फ जातीय उत्पीड़न पर केंद्रित रखने का क्या परिणाम हुआ, उस पर गौर करना महत्त्वपूर्ण है। यह निर्विवाद है कि जाति प्रथा की कोई चर्चा डॉ. भीमराव अंबेडकर के योगदान पर ध्यान दिए बिना पूरी नहीं हो सकती। जाति व्यवस्था को समझने और इसे समाप्त करने की एक खास समझ डॉ. अंबेडकर के योगदान में मौजूद है। उनके पूरे विमर्श का सार- जाति का विनाश (annihilation of caste) है। उनकी सारी चिंता जातीय पहचान को तोड़ने की थी। एक समय के बाद अपने अनुभवों के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हिंदू धर्म में रहते हुए जाति से मुक्ति संभव नहीं है। इसीलिए उन्होंने धर्मांतरण की राह पकड़ी और बौद्ध धर्म को अपनाया।

डॉ. अंबेडकर के प्रयोगों की रोशनी में अगर 1970 के दशक के बाद विकसित हुए ‘बहुजन’ विमर्श पर गौर करें, तो वह विपरीत दिशा में जाता दिखता है। इसमें जाति के विनाश के लिए कोई जद्दोजहद नहीं दिखती। उलटे बहुजन समाज पार्टी ने जातीय पहचान को मजबूत करने की नीति अपना ली। सामाजिक न्याय की बात करने वाली अन्य पार्टियों की व्यावहारिक राजनीति भी इसी नीति का पालन करते हुए आगे बढ़ी है।

जबकि चाहे दलित हों या ओबीसी, जाति व्यवस्था के खिलाफ उनके संघर्ष (अगर कोई ऐसा संघर्ष था तो) की सफलता उनके भीतर की जातियों की अलग पहचान को तोड़ने और एक बड़े ‘बहुजन’ से खुद को जोड़ने में निहित थी। तभी ये समुदाय उस बहुसंख्या को जता सकते थे, जिसके आधार पर वे अल्पसंख्यक सवर्ण जातियों के “राज करने” की शिकायत करते थे। वरना, अपने-आप में हर जाति अल्पसंख्यक है।

जातीय पहचान को मजबूत करने की राजनीति ‘बहुजन’ राजनीति के लिए घातक साबित हुई है। इसके कारण ही आरएसएस-भाजपा को अपनी सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने का मौका मिला। उसने जाति विशेष की गौरव भावना को जगाते हुए व्यापक हिंदू पहचान के अंदर उसे प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई, जो खासी कारगर रही है। इस रणनीति के तहत चूंकि आज ऊंचे-ऊंचे पदों पर दलित-पिछड़ी जातियों से आए नेता बैठे नजर आते हैं, तो प्रतिनिधित्व और पहचान पर केंद्रित विमर्श सहज ही इसके आगे निरस्त्र हो जाता है। सब-ऑल्टर्न हिंदुत्व के रूप में इसकी प्रशंसा तब उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाती है।

इसके बीच इस विमर्श से जुड़ा एक हिस्सा संभवतः ऐसा है, जो यह समझता है कि ये सारी परिघटना हिंदुत्व के दायरे में हो रही है, जिसमें प्रतिनिधित्व के आधार पर सब-ऑल्टर्न समूहों को शामिल जरूर किया जा रहा है, लेकिन उस पूरे ढांचे में विभिन्न जातियों की जगह वही रहेगी, जो जाति व्यवस्था के तहत पहले से तय है। यह परिघटना फिलहाल इतनी मजबूत दिखती है कि उसका विरोध करने में उन तबकों को पुरानी‘बहुजन’ राजनीतिअक्षम नजर आती है। ऐसे में उसने कांग्रेस से आस जोड़ी है। चूंकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने सबसे ताजा संस्करण में ‘बहुजन’ विमर्श वाली भाषा बोलते सुने जा रहे हैं, तो ‘बहुजन’ बुद्धिजीवियों के एक हिस्से में कांग्रेस में क्रांति होने का भ्रम पैदा हुआ है।

बहरहाल, इन दोनों रुझानों से यह तो साफ है कि ‘बहुजन’ बुद्धिजीवी कोई गंभीर आत्म-निरीक्षण नहीं कर रहे हैं। वे इसकी जड़ में जाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि जिस विमर्श को पिछले चार-पांच दशकों में उन्होंने खड़ा किया, वह इतना खोखला क्यों साबित हुआ? क्यों उन्हें अब उन्हीं पार्टियों में मुक्ति की राह नजर आ रही है, जिसके विरोध में उन्होंने इस विमर्श को आगे बढ़ाया था?

अगर वे गंभीर पड़ताल करते, तो संभवतः वे इस विमर्श के पीछे की सूत्रधार शक्तियों और उनके उद्देश्यों को समझ पाते। उन्हें यह नजर आता कि पहचान आधारित अन्याय की जड़ें भी समाज की वर्गीय संरचना में समाई हुई हैं। यही संचरना देश की राजनीतिक-अर्थव्यवस्था की संचालक है। इसलिए सिर्फ न्याय का वही संघर्ष सफल होने की आशा कर सकता है, जिसके केंद्र में राजनीतिक-अर्थव्यवस्था के चरित्र और वर्गीय संरचना की समझ हो।

तजुर्बा यह है कि ऐसी समझ के अभाव में पारंपरिक अन्याय के विरुद्ध खड़ा किया गया विमर्श जल्द ही शासक वर्ग के हाथ का खिलौना बन जाता है। शासक तबके इसका इस्तेमाल वास्तविक समस्याओं और सही संघर्ष से आम जन को भटकाने के लिए करते हैं। जब उन विमर्श की उपयोगिता पूरी हो जाती है, तो उसे अप्रासंगिक कर देने के तरीके वे तबके ढूंढ लेते हैं। चूंकि ऐसे विमर्श से जुड़े लोगों का अपना कोई ठोस वैचारिक आधार नहीं होता, इसलिए उनकी अंतिम परिणति व्यवस्था का ही उपकरण बन जाने में होती है। अब जो पढ़ने-सुनने को मिल रहा है, उसे इसी रूप में समझा जा सकता है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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