Friday, March 1, 2024

ग्राउंड रिपोर्ट: धीमी मौत मरते एस्बेस्टस कारखाने के मजदूर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ज़िले के मोहनलालगंज तहसील में स्थित है मऊ गांव। इस गांव में ही किसानों की ज़मीनें अधिग्रहित कर 1973 में एस्बेस्टस की चादरें बनाने वाला एक कारख़ाना ‘उ॰ प्र॰ एस्बेस्टस लिमिटेड’ (यूपीएएल) स्थापित किया गया।

इस कारखाने में 1975 से 2009 तक अपनी सेवाएं देने वाले मऊ गांव के दर्ज़ी टोला निवासी शत्रुघन सिंह (उम्र 68 वर्ष) बताते हैं कि जब कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण हुआ तो 1974 में उनकी 5 बीघा ज़मीन अधिगृहीत की गई थी, जिसके बदले उन्हें मात्र 8000 रुपये का मुआवज़ा मिला था।

ज़मीन अधिग्रहित करते समय शत्रुघन सिंह को आश्वासन दिया गया था कि अधिग्रहित की जा रही ज़मीन के बदले उन्हें अच्छे वेतनमान पर स्थाई नौकरी दी जाएगी। इनके पिता एक किसान थे और ज़मीनों के अधिग्रहित होने से पहले वह खेती करने में अपने पिता की मदद किया करते थे। ज़मीनें अधिग्रहित हो जाने के कारण उन्होने जब इस एस्बेस्टस कारखाने में सन 1975 में मज़दूरी करने की शुरुआत की तो अनाज उगाने वाले उनके हाथों को मात्र 104 रुपये प्रतिमाह वेतन पर एस्बेस्टस से लदी हुई बोगियां धकेलनी पड़ीं।

शत्रुघन सिंह की इस नौकरी में साप्ताहिक छुट्टी सहित प्रत्येक छुट्टी के पैसे कट जाया करते थे। छ: महीने बाद उनकी मज़दूरी बढ़कर 250 रुपये प्रतिमाह हो गई। बाद में उन्हें मशीनों को चलाने और फिर एस्बेस्टस शीट के कटिंग के काम पर लगाया गया। वर्ष 2009 में जब उनका शरीर कमज़ोर पड़ने लगा और काम करने में कठिनाई आने लगी तो कारखाने के अधिकारियों ने उन्हें 54 वर्ष की उम्र में ही ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का दबाव बनाया और ऐसा करने पर अच्छा मुआवज़ा मिलने का लालच भी दिया।

वर्ष 2009 में शत्रुघन सिंह को मजबूरन ऐच्छिक सेवा-निवृत्ति लेनी पड़ी, क्योंकि उनका शरीर काम नहीं कर पा रहा था। ऐच्छिक सेवा-निवृत्ति के समय शत्रुघन सिंह की मासिक तंख्वाह मात्र 1800 रुपये थी। एच्छिक सेवा-निवृत्ति पर उन्हें मात्र 2.5 लाख का मुआवज़ा मिला और तबसे अबतक उन्हें मात्र 975 रुपये प्रति माह पेंशन मिल रही है।

बूढ़े हो चुके शत्रुघन बताते हैं कि उस समय कारखाने के अंदर सभी काम हाथ से ही होते थे। तभी से उनको सांस लेने में तकलीफ होने लगी और सीने में दर्द होने लगा। वह दर्द समय बीतने के साथ हाथों-पैरों सहित पूरे शरीर में फैल गया। इस समय भी वे सांस के फूलने, सीने में दर्द और हाथ पैरों सहित पूरे शरीर में दर्द से परेशान रहते हैं। दर्द व सांस फूलने की दवाइयों के सहारे जीवन जी रहे हैं।

पूरे सेवाकाल की अवधि में वह हमेशा ही आर्थिक संकट से जूझते रहे और उनका स्वास्थ्य गिरता ही चला गया। इसके साथ वह यह बताना भी नहीं भूलते की आज के दिन भी उनकी छत पर राख़ की ढेर इकट्ठी हो जाया करती है। 

जमुना प्रसाद (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि प्रैशर गैस का उनके स्वास्थ पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वह प्रैशर गैस से खुद को बचाने के लिए मास्क का उपयोग करते हैं। वह 18 वर्षों से कारखाने में काम कर रहे हैं। 15 साल तक भट्टी में सीमेंट झोंकने का काम किया और पिछले 3 सालों से फाइबर पीसने का काम कर रहे हैं।

जमुना प्रसाद की मज़दूरी 250 रुपये प्रतिदिन है और रविवार सहित प्रत्येक छुट्टी के पैसे कट जाया करते हैं। 10 साल पहले तक उनको रोज़ गुड़ खाने के लिए दिया जाता था जो बीच में पूरी तरह से बंद हो गया था। पुन: पिछले 3 सालों से केवल मंगलवार को पूजा के बाद चना और गुड़ खाने के लिए दिया जाता है।

ऐसी ही कहानियां उस UPAL कारखाने में कार्य कर रहे या लंबे समय तक कार्य कर चुके सभी मज़दूरों की है। अब उस कारखाने में काम करने वाले अधिकतर मज़दूर दलित समुदाय से आने वाले भूमिहीन मज़दूर हैं। लगभग सभी मज़दूर सांस की परेशानी, सीने में दर्द, हाथ पैरों में दर्द आदि स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे हैं।

वर्तमान में इस कारखाने के अधिकतर मज़दूर अस्थाई हैं, जिनकी मज़दूरी 200-250 रुपये प्रतिदिन की है। एस्बेस्टस फ़ैक्टरी में काम करने वाले अधिकतर मज़दूर अपने घरों में भी एस्बेस्टस चादरों से बनी छत के नीचे ही रहते हैं।

मज़दूरों को लगने वाली बीमारी और इसके कारण

इन मज़दूरों को लगने वाली सांस और सीने में दर्द की बीमारी कोई सामान्य बीमारी नहीं है, बल्कि इस बीमारी ने ढेर सारे मज़दूरों की ज़िंदगियों को निगल लिया है। कारखाने से सेवानिवृत्त लोग बताते हैं कि इस कारखाने से रिटायर होने के समय तक या उसके कुछ वर्षों बाद ही सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द, बुखार और खून की उल्टी के साथ ही मृत्यु हो जाती है।

दरअसल ये सब उस बीमारी के लक्षण हैं जो एस्बेस्टस फ़ाइबर के संपर्क में लंबे समय तक रहने के कारण किसी व्यक्ति को होती है, जिसे एस्बेस्टोसिस कहते हैं।  

एस्बेस्टोसिस नाम की बीमारी एस्बेस्टस फाइबर के ज़्यादा दिनों तक संपर्क में रहने के कारण होती है। वायु में घुले हुए फाइबर कण और इसके धूल श्वसनमार्ग से घुसकर फेफड़ों के भीतर छोटी वायु कोशिकाओं में फंस जाते हैं, जहां वे फेफड़ों के ऊतकों से रगड़ खाकर उनमें घाव कर देते हैं।

चूंकि एस्बेस्टोसिस एक बढ़ने वाली बीमारी है (समय के साथ बढ़ती जाती है), इसलिए इसके लक्षण बीमारी लग जाने के 20 वर्षों बाद तक भी छुपे रह सकते हैं। इस दौरान एस्बेस्टस फेफड़े के ऊतकों को काफी नुकसान पहुंचा चुका होता है, जिससे फेफड़ा सख्त होकर सामान्य रूप से फैलने और सिकुड़ने में असमर्थ हो जाता है। धूम्रपान से फाइबर कण से क्षतिग्रस्त फेफड़ों की क्षति ओर बढ़ जाती है और बीमारी के फैलने की रफ़्तार भी तेज़ हो जाती है।

एस्बेस्टस के संपर्क में आना जोखिम से खाली नहीं है। क्रिसोटाइल सहित एस्बेस्टस के सभी रूप मानव कैंसरकारी साबित हुए हैं। सभी प्रकार के एस्बेस्टस घातक मेसोथेलियोमा और फेफड़े तथा स्वर यंत्र कैंसर का कारण बनते हैं, और डिम्बग्रंथि, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और अन्य कैंसर का कारण बन सकते हैं। मेसोथेलियोमा कैंसर का एक आक्रामक रूप है और निदान के बाद अक्सर जीवन प्रत्याशा 12 महीने से कम हो जाती है।

एस्बेस्टोसिस को रोकने के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

कार्यस्थल पर एस्बेस्टस के संपर्क के खतरों से श्रमिकों की रक्षा के लिए अमेरिकी व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रशासन (OSHA) ने एक मानक निर्धारित किया है, जिसके अनुसार 30 मिनट की अवधि में 1.0 एस्बेस्टस फाइबर प्रति घन सेंटीमीटर की भ्रमण सीमा के साथ एस्बेस्टस के लिए अनुमेय एक्सपोज़र सीमा आठ घंटे के समय-भारित औसत के रूप में 0.1 फाइबर प्रति घन सेंटीमीटर हवा है।

डब्ल्यूएचओ ने सभी प्रकार के एस्बेस्टस को कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों की श्रेणी मे रखा है। एस्बेस्टस फ़ाइबर के खतरों को देखते हुए कई विकसित देशों सहित 50 से अधिक देशों ने (जिनमें भारत, चीन, अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण देश नहीं हैं) एस्बेस्टस के खनन, निर्माण और उपयोग को प्रतिबंधित किया है।

विश्व स्वास्थय सगंठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुमान के मुताबिक़ एस्बेस्टस के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों की वजह से हर साल लगभग नब्बे हज़ार लोग काल के गाल में समा जाते हैं। इस भयावह तस्वीर के बाद भी भारत में एस्बेस्टस का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है।

भारत में एस्बेस्टस और इससे संबंधित नीति

भारत के राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी एस्बेस्टस का खनन होता है। इसके साथ ही भारत कच्चे एस्बेस्टस का सबसे ज़्यादा आयात करने वाले देशों में से एक है। यह आयात कनाडा, ब्राज़ील, रुस और ज़िम्बाब्वे जैसे देशों से किया जाता है। लेकिन यहां की सरकारों ने व्यवसायिक खतरों से प्रभावित मज़दूरों के उपचार, पुनर्वास एवं कल्याण के संबंध में केवल नीति निर्धारित करके अपनी ज़िम्मेदारियों से इतिश्री कर ली है।

राजस्थान, म॰ प्र॰ और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सिलिकोसिस/एस्बेस्टोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारी से प्रभावित मज़दूरों को मुआवज़ा, इससे मृत व्यक्तियों के परिवार को मुआवज़ा, उनके मुफ्त इलाज का प्रावधान, उनके बच्चों की मुफ्त शिक्षा और सिलिकोसिस/एस्बेस्टोसिस से मृत व्यक्तियों के परिजनों को पेंशन आदि के लिए नीतियां बनाई गई हैं जो बहुत मुश्किल से ही पूरी तरह ज़मीन पर उतरती हुई दिखाई देती हैं।

उ॰ प्र॰ जैसे राज्यों में कोई खदान तो नहीं है लेकिन एस्बेस्टस चादरें बनाने वाले कारखानें हैं। कारखाने में उपयोग किए जाने वाले कच्चे एस्बेस्टस से उड़ने वाले एस्बेस्टस फ़ाइबर वहां पर काम कर रहे मज़दूरों के फेफड़ों में पहुंच कर उन्हें एस्बेस्टोसिस जैसी खतरनाक बीमारी का कारण बनते हैं। उन मज़दूरों की भी मौत एस्बेस्टोसिस बीमारी से होती है और उनका परिवार असहाय बना देखता रहता है। लेकिन उन कारखानों में काम करने वाले मज़दूरों के लिए कोई भी नीति अब तक नहीं हैं।

सवाल है कि यदि कच्चे एस्बेस्टस की मौजूदगी के प्रत्येक जगह पर एस्बेस्टस फाइबर के कण एस्बेस्टोसिस जैसी बीमारी पैदा कर सकते हैं तो कारखानों में पैदा होने वाले एस्बेस्टोसिस बीमारी के संबंध में कोई भी नीति क्यों नहीं बनाई गई है। जबकि होना तो यह चाहिए कि एस्बेस्टस से फैलने वाली लाइलाज जानलेवा बीमारी को फैलने से रोकने के लिए राज्य भारत में सभी प्रकार के एस्बेस्टस के खनन, निर्माण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में शामिल हो, जो कि देश का अपने नागरिकों के प्रति दायित्व भी है। 

मज़दूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएं

कारखाने के अधिकतर मज़दूर यहां पर वर्षों से काम कर रहे हैं लेकिन ठेके पर। कारखाने के कार्य की प्रकृति स्थाई है। लेकिन ठेके पर कार्य करने के कारण उनके रोज़गार की प्रकृति को कारख़ाना अस्थाई बना कर दिखाता है। वैधानिक तौर पर कार्य के स्थाई प्रस्थिति के कारण यहां के मज़दूर किसी भी तरह के सामाजिक सुरक्षा योजना या कर्मकार कल्याण योजना के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं।

वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों की राज्य बीमा योजना (ESI) के तहत सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना नियोक्ता की ज़िम्मेदारी है, लेकिन प्रबंधन ने उन्हें ठेका पर नियोजित करके इस तरह के सभी अधिकारों से पूरी तरह से वंचित रखा है। उनके स्वास्थ की जांच तो कारखाने में हर महीने होती है, लेकिन किसी भी जांच के परिणाम के बारे में उन्हें नहीं बताया जाता है।

कारखाने के अधिकतर मज़दूर बलग़म वाली खांसी, सीने में दर्द और शाम को होने वाले बुखार से पीड़ित हैं। लेकिन किसी भी कर्मचारी के इलाज की कोई भी सुविधा कारखाने की ओर से मुहैया नहीं कराई जाती है। 

सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की गैरमौजूदगी

कारखाने में काम करने वाले अधिकतर मज़दूर दलित समुदाय से आते हैं। लेकिन मऊ के स्थानीय लोग बताते हैं कि दलितों या मज़दूरों के बीच काम करने का दावा करने वाले किसी भी संगठन या किसी भी ट्रेड यूनियन की मौजूदगी यहां नहीं है।

यह कारख़ाना लखनऊ से महज 25 किमी की दूरी पर है लेकिन लखनऊ में काम करने वाले कुछ मज़दूर नेताओं से बात करने पर पता चला कि इस कारखाने की कार्य-संस्कृति के बारे में उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं है।

कारखाने के सेवानिवृत्त श्रमिक बताते हैं कि शुरुआती दौर में कारखाने में भारतीय मज़दूर संघ की यूनियन हुआ करती थी। लेकिन मज़दूरों के अधिकारों के संबंध में किसी भी संघर्ष की पहल उस यूनियन द्वारा कभी नहीं की गई।   

निष्कर्ष

एस्बेस्टस कारखाने के मज़दूरों का खराब स्वास्थ इस बात की ज़रूरत को रेखांकित करता है कि वहां पर कार्यरत कर्मियों का स्वास्थ परीक्षण वहां से बाहर किसी व्यावसायिक स्वास्थ विशेषज्ञ से कराया जाए। हाड़तोड़ मेहनत तथा पूरी ज़िंदगी को जोखिम में डालने के बदले मात्र 6000-8000 रुपये प्रति माह का मिलने वाला वेतन उनके जीवन की आर्थिक गुलामी का द्योतक है।

ऐसे में कारखाने के मज़दूरों का स्वास्थ परीक्षण कराकर उनके अंदर पल रहे रोगों को व्यावसायिक बीमारी साबित करने का दायित्व उन संस्थाओं पर आ जाता है जो व्यावसायिक स्वास्थ पर काम करते हैं। तो इन्हें आर्थिक गुलामी से निकालने का दायित्व उन ट्रेड यूनियनों पर आता है जो मज़दूर अधिकारों की बात करने का दावा करते हैं।

इस प्रकार से यूपीएएल के मज़दूरों की स्वास्थ समस्याएं और उन्हें आर्थिक गुलामी से निकालने के कार्यभार संस्थाओं और ट्रेड यूनियनों को आपस में समन्वय बैठाकर साथ-साथ काम करने की ज़रूरत को रेखांकित करता है।

(नदीम अहमद की रिपोर्ट।)

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