स्पेशल रिपोर्ट: बिहार में तेजस्वी यादव का नया सियासी प्रयोग भाजपा को डरा तो नहीं रहा?

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पटना/सुपौल। राजद माय (मुस्लिम-यादव) कि नहीं बाप (बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पुअर) की भी पार्टी है। तेजस्वी यादव के इस पूरे बयान को राजद ने लोकसभा 2024 की रणनीति का प्रारूप बना लिया है। भाजपा के मुख्य नेताओं में अभी शामिल सम्राट चौधरी अपनी जाति कुशवाहा को एक भी टिकट नहीं दिला पाए जबकि राजद ने चार कुशवाहा उम्मीदवार को टिकट दिया है। बिहार में कुशवाहा वोट पर अब तक नीतीश कुमार का एकाधिकार माना जाता रहा है। इसे लव-कुश समीकरण से भी जोड़ते हैं। लव मतलब कुर्मी और कुश मतलब कुशवाहा। वहीं मांझियों के गढ़ में रविदास जाति के कुमार सर्वजीत को राजद ने टिकट दिया है। सारे पुराने जातीय समीकरण को ध्वस्त करते हुए राजद लोकसभा चुनाव को सेमीफाइनल की तरह देख रहा है।

बिहार के एक वेब पोर्टल में काम कर रहे पत्रकार परमवीर बताते हैं कि यूट्यूब पर हर यूट्यूबर तेजस्वी यादव के वीडियो को ज्यादा से ज्यादा चलाना चाह रहा है। क्यों? इस सवाल पर वह बताते हैं कि भाजपा के नेताओं का वीडियो काफी कम लोग देख रहे हैं। स्थिति ऐसी है कि देश के बड़े नेताओं से ज्यादा तेजस्वी प्रसाद यादव का वीडियो देखा जा रहा है। तेजस्वी प्रसाद यादव के द्वारा लगातार भाजपा से सवाल पूछा जा रहा है और वह अपनी 17 महीने की उपलब्धि को बता रहे है। जाति के ज से ज्यादा विकास के व पर चर्चा कर रहे हैं। 

राजद ने सामान्य सीट से दलित उम्मीदवार उतारा 

आम आदमी पार्टी की तरह ही राजद ने सुपौल लोक सभा सीट से दलित उम्मीदवार को टिकट दिया है। इसी सुपौल लोकसभा के कामेश्वर चौपाल अयोध्या मंदिर के ट्रस्टी में शामिल हैं। इस वजह से यहां चौपाल जाति मुख्य रूप से भाजपा का कोर वोटर है। ऐसी स्थिति में राजद के द्वारा चौपाल जाति के चंद्रहास चौपाल को टिकट देकर जाति समीकरण पूरी तरह उलटने का काम किया गया है। 

स्थानीय पत्रकार विमलेंदु बताते हैं कि, “अभी तक इस सीट की जदयू की कोर सीट में गिनती होती थी। हालांकि दलित उम्मीदवार चंद्रहास चौपाल को टिकट देने के बाद कोसी एवं मिथिलांचल क्षेत्र में दलित राजनीति बदल सकती है। इसके लिए रजत को व्यापक प्रचार प्रसार करने की जरूरत है। इस लोकसभा सीट पर दलित जातियों की संख्या अच्छी-खासी है। इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि भाजपा ने अपना जिलाध्यक्ष एक मुसहर जाति के व्यक्ति को बनाया है। साथ ही 2014 में दलित जाति के ही कामेश्वर चौपाल को उम्मीदवार भी बनाया था। ऐसे में पूरी चुनावी राजनीति को दलित पर केंद्रित करके राजद यह सीट निकाल सकती है।”

राजद के उम्मीदवार चंद्रहास चौपाल बताते हैं कि, “लालू प्रसाद यादव ने 90 के दशक के बाद दलित एवं वंचितों के लिए इस तरह का लगातार फैसला लिया है। पत्थर तोड़ने वाली भगवतिया देवी और कपड़ा धोने वाली मुन्नी रजक को भी इन्होंने जनता की सेवा करने का मौका दिया था। सुपौल लोकसभा सीट पर ही एक जनरल सीट से दलित को टिकट देने का फैसला लेकर सुपौल लोकसभा सीट पर इतिहास रचने का मौका दिया है। देश के सबसे बड़े दलित नेताओं की श्रेणी में शामिल रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी हों या बहन मायावती ने अपनी पार्टी से शायद ही कभी जनरल सीट से किसी दलित उम्मीदवार को खड़ा किए होंगे।”

दांव एक पर एक

अन्य हिंदी पट्टी राज्यों की तरह ही बिहार में भी धर्म,गाय और मोदी फैक्टर एनडीए उम्मीदवार का चुनावी परिचय है। ऐसे में तेजस्वी यादव चौंकाने वाले परिणाम की बार-बार मुनादी कर रहे हैं। दो लोकसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि बिहार में जातीय गोलबंदी को तोड़ने में नरेंद्र मोदी की छवि कारगर रही है। ऐसे में तेजस्वी यादव निरंतर वोट के ‘गणित’ को लेकर नए-नए मुहावरे गढ़ कर अपना आधार वोट बढ़ाने की जुगत बिठाते रहे हैं और नया समीकरण गढ़ने की कोशिश में हैं। 

वैसे तो भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी, रवि किशन और निरहुआ भाजपा के सांसद की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन बिहार में एक तरफ पवन सिंह और गुंजन सिंह निर्दलीय उम्मीदवार बनकर एनडीए उम्मीदवार को हराने की पूरी कोशिश कर रहे हैं वहीं खेसारी लाल यादव राजद के सपोर्ट में मंच पर गाना गा रहे हैं। 

काराकाट से पवन सिंह तो नवादा से गुंजन सिंह निर्दलीय उम्मीदवार बनकर एनडीए गठबंधन के कैंडिडेट को हराने की पूरी जद्दोजहद में हैं। क्योंकि दोनों का वोट बैंक सवर्ण भाजपा का कोर वोटर है। 

वहीं जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह के सामने अपने समय के कुख्यात अशोक महतो की पत्नी और राजपूतों के बड़े चेहरे और दबंग आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद के सामने पूर्व मुखिया रितु जायसवाल को खड़ा कर राजद चुनाव का नया समीकरण तैयार कर रही है। अशोक महतो के सामने स्थिति ऐसी बन गई थी कि टिकट के लिए लालू प्रसाद यादव के इशारे पर 60 साल की उम्र में शादी करनी पड़ी। चुनावों में महागठबंधन के पक्ष में केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। इसके अलावा विपक्ष ने रोज़गार के मुद्दे को जनता के सामने उठाया है।

(बिहार से राहुल कुमार की रिपोर्ट।)

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