चंद्रशेखर आजाद: हिंदी पट्टी में एकमात्र मुखर आंबेडकरवादी राजनीतिक स्वर संसद में गूंजना ही चाहिए

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19 अप्रैल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा (सुरक्षित) निर्वाचन क्षेत्र में मतदान है। यहां आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रत्याशी चंद्रशेखर चुनाव लड़ रहे हैं। उनका चुनाव चिह्न केतली है। वे एक ऐसी आवाज हैं, जिस आवाज को संसद में ज़रूर गूंजना चाहिए। मैं चंद्रशेखर आजाद के विचारों, एजेंडों और संघर्षों को 2017 से देख-सुन रहा हूं। इसके आधार पर मेरी यह राय बनी कि हिंदी पट्टी में वे एकमात्र व्यापक पहचान वाले मुखर राजनेता हैं, जो आंबेडकरवादी विचारधारा और एजेंडों के साथ निर्णायक तरीके से खड़े रहे हैं और आज भी खड़े हैं।

चंद्रशेखर आजाद डॉ. आंबेडकर के इस बुनियादी दर्शन-चिंतन के हिमायती दिखते हैं कि न्याय के हर संघर्ष के साथ खड़ा होना चाहिए और अन्याय के हर रूप का प्रतिवाद और प्रतिरोध करना चाहिए। चंद्रशेखर के संघर्षों का इतिहास यदि देखें तो हम पाते हैं कि देश में न्याय के पक्ष में और अन्याय के विरोध में कोई ऐसा महत्वपूर्ण संघर्ष नहीं है, जिसके पक्ष में वे खड़े न हुए हों।

दलित-बहुजन उत्पीड़न और चंद्रशेखर आजाद

हिंदी पट्टी में जब कोई दलित-बहुजन उत्पीड़न की घटना होती है, उसकी मुखालफत में जो चेहरा सबसे पहले सामने आता है, घटना स्थल पर जाता है, परिवार के लोगों से मिलता है, पुलिस से टकराता है, न्याय के लिए सड़कों पर उतरता और सरकार को सीधी चेतावनी देता है, उस नेता का नाम चंद्रशेखर आजाद है। वे दलित-बहुजनों के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करने वाले सबसे मुखर चेहरा हैं, आवाज हैं। ऐसी किसी भी घटना में उनके हस्तक्षेप करते ही पुलिस-प्रशासन सक्रिय हो जाता है, न्याय देने-दिलाने की बातें होने लगती हैं।

हर ऐसी घटना में उम्मीद की जाती है कि चंद्रशेखर हस्तक्षेप करें और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करें और वे करते भी हैं। एक तरह से चंद्रशेखर दलित-बहुजन उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष के पर्याय सा चेहरा हैं। वे ब्राह्मणवाद और सवर्णों के उत्पीड़न-वर्चस्व के खिलाफ संघर्षरत योद्धा के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं। वे योगी-मोदी को उनके गढ़ में जाकर खुली राजनीतिक चुनौती देने का माद्दा रखते हैं। उन्होंने मोदी के खिलाफ बनारस और योगी के खिलाफ गोरखपुर में चुनाव लड़ा, उन्हें सीधे ललकारा।

शब्बीरपुर कांड और चंद्रशेखर आजाद

उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व में जब पहली बार 2017 में सरकार बनी तो जनेऊधारी जातियां (सवर्ण), विशेषकर ठाकुरों ने इसे ठाकुरों की सरकार समझा और वे दलितों के प्रति हमलावर हो गए। इसका सबसे पहला कहर सहारनपुर के शब्बीर गांव के दलितों पर टूटा। राज्य सरकार और ठाकुरों के गठजोड़ के हमले का जिस व्यक्ति ने सबसे तीखा, व्यापक और मुखर प्रतिवाद किया, उस व्यक्ति का नाम चंद्रशेखर आजाद है। उन्होंने भीम आर्मी के नेतृत्व में सवर्णवादी योगी सरकार और ठाकुरों की ताकत को निडर होकर चुनौती दी। 

न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरी हिंदी पट्टी में इससे यह संदेश दिया कि दलित-बहुजन डर कर आपके सामने समर्पण करने वाले नहीं हैं, वे प्रतिवाद और प्रतिरोध करेंगे और पुरजोर करेंगे। यह सब उन्होंने तब किया जब दलित-बहुजनों की पार्टियां और उसके बडे़-बड़े नेता बगलें झांक रहे थे। इस संघर्ष के चलते चंद्रशेखर को रासुका के तहत योगी सरकार ने जेल भेज दिया। उन्हें 16 महीने जेल की काल कोठरी में बिताना पड़ा। कैसे और किस तरह की यातनाएं दी गईं, इसे दुनिया जानती है।

2 अप्रैल 2018 का आंदोलन और चंद्रशेखर आजाद

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट खत्म करने खिलाफ 2018 के दलित-बहुजनों के ऐतिहासिक संघर्ष और भारत बंद में जेल में रहने के चलते चंद्रशेखर सीधे शामिल तो नहीं हो पाए, लेकिन उनके संगठन भीम आर्मी ने इस आंदोलन में चढ़-बढ़कर हिस्सा लिया और कई सारी जगहों पर इस आंदोलन का नेतृत्व किया। चंद्रशेखर ने इसके समर्थन में जेल में ही भूख-हड़ताल की। हम सभी को मालूम है कि इस संघर्ष में 13 दलित नौजवान शहीद हुए थे।

सीएए-एनआरसी विरोधी संघर्ष और चंद्रशेखर आजाद

11 सितंबर, 2019 को संसद में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पारित होने और गृहमंत्री अमित शाह की एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) की घोषणा के विरोध में कई महीने चले देशव्यापी आंदोलन (शाहीन बाग प्रतीक बन गया था) में भीम आर्मी ने चढ़-बढ़ कर हिस्सा लिया। गैर-मुस्लिम चेहरों में चंद्रशेखर इस विरोध के एक जाने-माने चेहरे बन गए थे। उन्हें इसके चलते जेल भी जाना पड़ा। चंद्रशेखर ने बिना किसी लाग-लपेट के सीएए कानून और एनआरसी का विरोध किया।

यह मुद्दा भले सीधे तौर पर दलितों-बहुजनों से जुड़ा किसी को न दिखता हो, लेकिन वास्तव में यह दलितों-बहुजनों पर मोदी सरकार के सबसे बड़े हमलों में एक था। भीम आर्मी और चंद्रशेखर को इस तथ्य का गहरा अहसास है कि दलित-बहुजन राजनीति की सफलता की कल्पना भी मुसलमानों को साथ लिए बिना नहीं की जा सकती है। इससे भी बड़ी बात यह कि अन्याय के हर रूप का प्रतिवाद करना ही असल अर्थों में डॉ. आंबेडकर के विचारों का अनुयायी होना है।

किसान आंदोलन और चंद्रशेखर आजाद 

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े किसान आंदोलन ( 2020) को चंद्रशेखर आजाद और भीम आर्मी ने खुल कर समर्थन दिया। बिना किसी द्वंद-दुविधा के भीम आर्मी और चंद्रशेखर किसानों के साथ खड़े हुए। उन्होंने इन कानूनों को उत्पादक-मेहनतकश किसानों पर सबसे बड़ा हमला कहा। खेती-किसानी को कार्पोरेट घरानों को सौंपने की साजिश करार दिया। समय-समय सभी बार्डरों पर चंद्रशेखर ने अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई।

दलितों के एक बड़े हिस्से को किसानों के साथ खड़ा करने में चंद्रशेखर की बड़ी भूमिका थी। हालांकि उन्हें इस तथ्य का भी अहसास अच्छी तरह था कि इनमें से बहुत सारे किसान दलित खेतिहर मजदूरों के साथ नाइंसाफी करते हैं, उनका शोषण-उत्पीड़न करते हैं। लेकिन इसे उन्होंने मित्रवत अंतर्विरोध के रूप में लिया। दलित-बहुजनों की व्यापक एकता के लिए संघर्षरत उत्पादक-मेहनतकश किसानों के साथ खड़ा होना मुनासिब समझा। यह उनकी व्यापक दृष्टि और समझ का प्रमाण है।

हाथरस कांड और चंद्रशेखर आजाद

हाथरस में दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद योगी सरकार ने जिस तरह इस मामले को रफा-दफा करना चाहा और रातों-रात लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया गया। हाथरस की इस दिल-दहला देने वाली घटना के खिलाफ जो दलित-बहुजन राजनेता सबसे मुखर होकर सामने आया और योगी सरकार को चुनौती दी, उस नेता का नाम चंद्रशेखर था। उन्होंने सच को सामने लाने और परिवार को न्याय दिलाने के लिए हर तरह का संघर्ष किया। वे आज भी इस मामले में अधूरे न्याय को मुकम्मल न्याय में तब्दील करने के लिए आवाज उठाते रहते हैं। हाथरस या इससे मिलती-जुलती घटनाओं के खिलाफ निरंतर संघर्ष का उनका इतिहास रहा है।

दलित-बहुजन नेताओं में चंद्रशेखर एक ऐसे नेता हैं, जो कार्पोरेट लूट के खिलाफ लगातार बोलते हैं, बढ़ती आर्थिक असमानता और धन के मुट्ठी भर अमीरों के हाथ में केंद्रित होते जाने का सवाल उठाते हैं। बेरोजगारी, महंगाई और मेहनतकशों की आर्थिक बदहाली पर भी वे सवाल उठाते हैं।

वे मीडिया के बड़े-बड़े एंकरों के सामने रिरियाते नहीं हैं, वे एक-से एक गोदी मीडिया एंकरों को उनके ब्राह्मणवादी-जातिवादी बातों के लिए डांट चुके हैं। वे मीडिया के सामने बेलाग-बेखौफ बोलते हैं। अपनी आंबेडकरवादी वैचारिकी पर डटे रहते हैं। अपनी और दलित-बहुजन समाज की गरिमा की मीडिया के सामने पूरी रक्षा करते हैं।

अपनी वैचारिकी, एजेंडा और संघर्ष के साथ ही चंद्रशेखर एक निम्न मध्यमवर्गीय दलित परिवार से निकले हैं और अपने संघर्षों के बलबूते नेता बने हैं। बसपा के आकाश आनंद, सपा के अखिलेश, राजद के तेजस्वी यादव और कांग्रेस के राहुल गांधी की तरह उन्हें राजनीतिक कद पैतृक विरासत में नहीं मिला है, उनके पास कोई बना-बनाया संगठन भी नहीं था। वे सच्चे अर्थों में जमीनी नेता हैं, जिसने अपने संघर्षों के दम पर खुद को और अपने संगठन को खड़ा किया है, अपना आधार बनाया और अपना कद-पद बनाया है।

वे चिराग पासवान, अनुप्रिया पटेल, मुकेश साहनी, संजय निषाद, ओमप्रकाश राजभर आदि की तरह जातिवादी नेता भी नहीं हैं। जिस जाति से वे आते हैं, उस जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी (बसपा) पहले से ही मौजूद है, जिससे यह भी नहीं कहा जा सकता है, उस जाति विशेष का उन्हें निश्चित तौर पर राजनीतिक समर्थन प्राप्त है। चंद्रशेखर ने समाज और राजनीति में जगह खुद के संघर्षों से बनाई है। वे साहसी हैं, जोखिम उठाते हैं, अपनी आंबेडकरवादी आवाज मजबूती से बुलंद करते हैं। वे ज्यादा दायें-बायें नहीं झांकते हैं। सबसे बड़ी बात उन्होंने लोगों के दिलों में भी अपने लिए जगह बनाई है, सम्मान हासिल किया है।

ऐसी आंबेडकरवादी आवाज को संसद में बुलंद होना चाहिए। फिलहाल लंबे समय से हिंदी पट्टी से कोई आंबेडकरवादी बुलंद आवाज संसद में पुरजोर तरीके से सुनाई नहीं दे रही है। 2019 तक सावित्रीबाई फुले और उदित राज जैसी आवाजें ( दलित आवाजें) कभी सुनाई भी पड़ जाती थीं, भले ही दोनों भाजपा के सांसद थे, जिसके चलते उन्हें बाहर ( भाजपा से बाहर) का रास्ता दिखा दिया गया। भारत की संसद में कम से कम चंद्रशेखर के रूप में एक आंबेडकरवादी आवाज गूंजनी चाहिए।

हालांकि सपा-बसपा-भाजपा सभी भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि यह आवाज संसद में न गूंजे। लेकिन यदि चंद्रशेखर जैसी आवाज संसद में पहुंचती है, तो एक सकारात्मक बात होगी। इस एक आवाज से भारत बदल जाएगा, हिंदी पट्टी बदल जायेगी, न यह मुगालता मुझे है, न किसी को पालनी चाहिए। शायद चंद्रशेखर आजाद को भी यह मुगालता न हो। फिर भी इस आवाज का संसद में गूंजना कानों को सुखद लगेगा।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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