पश्चिम बंगाल चुनाव: मौत के आंकड़ों का खौफ

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पूरे देश के साथ पश्चिम बंगाल में भी लोकसभा चुनाव हो रहा है। पर पश्चिम बंगाल में जब भी चुनाव होता है तो मौत के आंकड़ों का खौफ लोगों को सताने लगता है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है की चुनाव पंचायत का है या विधानसभा का या फिर लोकसभा का, लाशों के गिरने का सिलसिला बना ही रहता है।

इस सिलसिले में आइए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का एक तुलनात्मक विश्लेषण करते हैं। इसकी वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में पहले चरण का चुनाव 19 अप्रैल को होना है और तमिलनाडु का चुनाव भी 19 अप्रैल को ही होना है। पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीट हैं तो तमिलनाडु में यह संख्या 39 है। तमिलनाडु में 6.2 करोड़ मतदाता हैं तो पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या 7.6 करोड़ है। पश्चिम बंगाल में 19 अप्रैल को लोकसभा की तीन सीटें जलपाईगुड़ी, कूच बिहार और अलीपुर दुवार का चुनाव होना है।

तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों के लिए 19 अप्रैल को ही चुनाव हो जाएंगे। पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों के लिए सात चरणों में चुनाव कराए जाएंगे। पश्चिम बंगाल में सेंट्रल फोर्स की 900 कंपनी तैनात की जाएगी तो तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीट के लिए केवल 25 कंपनी सेंट्रल फोर्स तैनात की जाएगी। इससे यह अंदाजा हो जाता है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव कितना खौफनाक है। 

अब पश्चिम बंगाल की तीन लोकसभा सीट के लिए होने वाले चुनाव की तैयारी पर एक नजर डालते हैं। 19 अप्रैल को तीन लोकसभा सीटों के 5814 बूथों पर मतदान होना है। प्रत्येक लोकसभा सीट के लिए 112 कंपनी सेंट्रल फोर्स तैनात की जाएगी, यानी सेंट्रल फोर्स की कुल 336 कंपनियां तैनात की जाएंगी। इतना ही नहीं संवेदनशील क्षेत्र के लिए ड्रोन भी तैनात किए जाएंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी सहारा लिया जाएगा। निर्वाचन आयोग के अधिकारी दिल्ली और कोलकाता से मॉनिटरिंग करेंगे। इतनी तैयारी के बावजूद निर्वाचन आयोग के अधिकारी शांतिपूर्ण चुनाव होने को लेकर संतुष्ट नहीं हो पाए हैं।

इसलिए फैसला लिया गया है कि प्रत्येक जिले में सेंट्रल फोर्स की तैनाती के बाबत फैसला लेने के लिए एक नोडल अफसर नियुक्त किया जाएगा। यह नोडल अफसर भी सेंट्रल फोर्स का कोई अफसर होगा। इससे पहले यह होता रहा है कि सेंट्रल फोर्स की तैनाती के बाबत डीएम और एसपी ही फैसला लेते रहे हैं। इस बार उन्हें भी किनारे कर दिया गया है। इसकी वजह यह है कि आरोप लगता रहा है कि सेंट्रल फोर्स को बूथों पर तैनात करने के बजाय उन्हें बिना वजह के कामों में उलझाया जाता रहा है या फिर निष्क्रिय रखा जाता रहा है। इसलिए इस बार निर्वाचन आयोग ने सब कुछ अपने हाथों में रखने का फैसला लिया है।

इसकी वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव में होने वाली हिंसा और इससे होने वाली मौत का आंकड़ा बेहद खौफनाक है। इसकी मिसाल किसी और राज्य में नहीं मिलेगी। अब जरा पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में हुई मौत के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। पंचायत चुनाव 8 जुलाई को हुआ था और उस दिन 18 लोग मारे गए थे। यहां सिर्फ चुनाव के दिन ही लोग नहीं मारे जाते हैं।

यह सिलसिला चुनाव से पहले शुरू हो जाता है और चुनाव होने के बाद भी कुछ समय तक चलता रहता है। पंचायत चुनाव में 8 जून से 16 जुलाई के बीच कुल 55 लोग मारे गए थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में 8 जून से 31 दिसंबर के बीच कुल 61 मौतें हुई थीं।

2021 का विधानसभा चुनाव तो और भी निराला है। इसमें चुनाव से पहले चुनाव के दिन और चुनाव के बाद हत्या और अस्वाभाविक परिस्थितियों में मौत के कुल 52 मामले दर्ज किए गए थे। बलात्कार और यौन शोषण के कुल 39 मामले दर्ज किए गए थे। चुनाव बाद हिंसा को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी।

पांच जजों की बेंच ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी। ट्रायल की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा तो सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने किसी अन्य राज्य में ट्रायल किए जाने का आदेश दिया है। क्या इससे यह साफ नहीं हो जाता है कि बहुत कठिन है डगर पनघट की तरह पश्चिम बंगाल में बूथों को जाने वाली डगर पर चलने में मतदाताओं को भारी जोखिम उठाना पड़ता है।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कोलकाता में रहते हैं।)

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