पटना। भाकपा-माले बिहार राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि इस चुनावी वर्ष में पेश अंतरिम बजट डाटा के चयनात्मक उपयोग, आधे-अधूरे सच और विकृतियों के जरिए भाजपा सरकार के पिछले दस वर्षों के प्रदर्शन की शेखी बघारने वाला एक प्रचार है।
उन्होंने कहा कि बजट के संशोधित अनुमानों के आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार अपने कई प्रमुख कार्यक्रमों के लिए वास्तविक व्यय करने में सक्षम नहीं रही है।
माले सचिव ने कहा कि बहुचर्चित पीएम आवास योजना के लिए 2023-24 में वास्तविक संशोधित अनुमानित राशि 54,103 करोड़ रुपये है, जबकि बजट 2023 में इसका अनुमान 79,590 करोड़ रुपये था। उसी प्रकार स्वच्छ भारत मिशन के लिए संशोधित राशि 2,550 करोड़ रुपये है। बजट 2023 में इसका अनुमान 5,000 करोड़ रुपये था।
उन्होंने कहा कि पीएम आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए संशोधित राशि 2100 करोड़ रुपये है। बजट 2023 में इसका अनुमान 4,000 करोड़ रुपये का था। किसानों की आय दुगुनी करने, स्कील डेवलपमेंट मिशन आदि योजनाओं का भी यही हाल है।
माले सचिव ने कहा कि बड़े कॉरपोरेट्स और अति-अमीरों पर कर बढ़ाने से इनकार के कारण उच्च राजकोषीय घाटा हुआ है। संशोधित अनुमान में यह सकल घरेलू उत्पाद का 5.8 प्रतिशत आंका गया है। दस वर्षों में ऋण-जीडीपी अनुपात खराब होकर जीडीपी के 67 प्रतिशत से 82 प्रतिशत हो गया है।
उन्होंने कहा कि कुल खर्च के 44.90 लाख करोड़ रुपये के कुल संशोधित अनुमान में से 10.55 लाख करोड़ रुपये का उपयोग केवल ब्याज भुगतान की सेवा में किया जाता है।
माले सचिव ने कहा कि देश के निम्न आय वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति पिछले एक साल के दौरान काफी हद तक खराब हो गई है। हाल ही में, बिहार की जाति जनगणना ने गरीबी के वास्तविक पैमाने का संकेत दिया था। जहां 34 प्रतिशत से अधिक परिवार महज 6 हजार रु प्रति माह पर जीते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि 10 हजार रुपये प्रति माह प्रति परिवार का आंकड़ा लगाया जाए तो राज्य की दो तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। यही कमोबेश स्थिति पूरे देश की है। देश की आम जनता की स्थिति लगातार संकटग्रस्त होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि मोदी-शाह शासन की मनगढ़ंत धारणाओं, अमीरों द्वारा बहुप्रचारित अच्छे दिन और अमृत काल के नाम पर आर्थिक विकास के झूठे दावों का आने वाले लोकसभा चुनाव में वही हश्र होना निश्चित है जो अटल-आडवाणी युग में ’इंडिया शाइनिंग’ का हुआ था।