नई दिल्ली। प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में लेखक-पत्रकार ज़ाहिद ख़ान की नई किताब ‘मख़दूम मोहिउद्दीन : सुर्ख सवेरे का शायर’ का विमोचन हुआ। ‘गार्गी प्रकाशन’, नई दिल्ली से प्रकाशित इस किताब में मेहनतकशों के चहेते शायर मख़दूम मोहिउद्दीन की शख्सियत और और उनकी शायरी पर जहां कुछ महत्वपूर्ण आलेख हैं, तो वहीं इसमें उनकी कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और नज़्में भी शामिल हैं।
किताब पर चर्चा करते हुए यूट्यूब चैनल ‘वर्कर्स यूनिटी’ से जुड़े पत्रकार के. संतोष ने कहा, ‘मख़दूम क्रांति के शायर हैं और तेलंगाना संघर्ष से उनके राजनीतिक जीवन की यात्रा शुरू होती है। उन्होंने कहा, ‘मुहब्बत और क्रांति को एक शायर कैसे साधता है, इस पर यह पूरी किताब केंद्रित है। मख़दूम हम सब के महबूब शायर हैं। उनकी शायरी ही नहीं, उनका राजनीतिक जीवन भी हमें प्रेरणा देता है।’
किताब की रचना-प्रक्रिया पर बात करते हुए लेखक जाहिद खान ने कहा, ‘साल 1946 में मख़दूम के साथी शायर अली सरदार जाफ़री ने मख़दूम मोहिउद्दीन पर उर्दू ज़बान में एक बहुत बढ़िया लेख लिखा था। वही लेख इस किताब का आधार बना। किताब में इसके अलावा और भी कई महत्वपूर्ण लेख हैं, जो हिंदी में पहली बार आ रहे हैं।’
चर्चित पत्रिका ‘समयांतर’ के संपादक वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार पंकज बिष्ट ने कहा, ‘आज के समय में जब साहित्य ज़िंदगी से पूरी तरह कट गया है, ऐसे दौर में हमारे सामने यह सबसे बड़ा उदाहरण पेश आया है कि हम अपने लेखकों को कैसे समाज से जोड़ें।
मख़दूम मोहिउद्दीन का साहित्य और समाज को बनाने में एक बड़ा योगदान है। मख़दूम हमारे समय के ज़रूरी और बहुत ही प्रासंगिक शायर हैं। उन्होंने जो भी ग़ज़लें और नज़्में लिखीं, उनमें बदलाव, परिवर्तन और समानता की बात है।
यहां तक कि उन्होंने फ़िल्मों में भी जो गीत लिखे, उनका भी कोई जवाब नहीं। मसलन अपने गीत ‘जाने वाले सिपाही से पूछो कि वह कहां जा रहा है’ उसमें भी मख़दूम ने पाठकों को एक बड़ा संदेश दिया है। दुनिया में कहीं लड़ाइयां न हों, कोई देश जंग का मैदान न बने।’
वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने लेखक ज़ाहिद ख़ान को मुबारकबाद देते हुए कहा, ‘मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूं कि उन्होंने हिंदी पाठकों को मख़दूम से वाकिफ कराया। मख़दूम यूं तो उर्दू के शायर हैं, लेकिन वह हिंदुस्तान के भी शायर हैं। वे इंकलाबी शायर हैं। मज़दूरों और किसानों के भी शायर हैं। मेरी उनसे वाकफियत कम्युनिस्ट लिटरेचर के मार्फ़त हुई। उनकी एक ग़ज़ल की मशहूर लाइनें हैं, हयात ले के चलो कायनात ले के चलो, चलो तो सारे ज़माने को साथ लेकर चलो।
यह ऐसी लाइनें हैं, जिन्हें हिंदुस्तान का हर शख्स जानता है। मख़दूम अवाम के शायर हैं और उनकी शायरी इस मुल्क के किसान, मज़दूर और आम आदमी की शायरी है। जाहिद खान ने हिंदी में यह किताब तैयार कर एक बहुत बढ़िया काम किया है।’
उद्भावना पत्रिका के संपादक लेखक-पत्रकार अजेय कुमार ने कहा, ‘जाहिद खान को हमें इसलिए मुबारकबाद देना चाहिए कि उन्होंने एक-एक कर तमाम तरक्कीपसंद शायरों पर किताबें निकाली हैं। और उनकी शायरी को लोगों के बीच लेकर आए हैं। ‘उद्भावना’ की ओर से ही हमने इनकी कई किताबें मसलन ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ और गीतकार शैलेन्द्र पर एक किताब प्रकाशित की है।
जाहिद खान ने एक और महत्वपूर्ण काम किया है, मौजूदा समय में जो कविता या शायरी लिखी जा रही है, हमारे लेखक क्या लिख रहे हैं? वो किस तरह की शायरी कर रहे हैं ? इन्होंने उन कवियों और शायरों को भी आईना दिखाने का काम किया है। उन्हें कैसा काम करना चाहिए, अपनी किताबों के माध्यम से यह बताने का काम किया है।
‘गार्गी प्रकाशन’ के प्रकाशक लेखक-अनुवादक दिगम्बर ने कहा, ‘गार्गी प्रकाशन’ की हमेशा से यह कोशिश रही है कि ऐसी किताबें प्रकाशित की जाएं, जो आज के हालात को बदलने का काम करें। जाहिद खान ने इस किताब को लाकर, वाकई बहुत बढ़िया काम किया है। मख़दूम मोहिउद्दीन एक कंधे पर बंदूक और एक कंधे पर गिटार लेकर चलने वाले शायर थे। उनकी शायरी गम-ए-जानां की ही नहीं, ग़म-ए-दौरां की भी शायरी है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि जाहिद खान आगे भी तरक्कीपसंद शायरों को इसी तरह हिंदी पाठकों से परिचित कराने का महत्वपूर्ण काम करते रहेंगे।’
प्रगति मैदान के हॉल नंबर 2 में गार्गी प्रकाशन के स्टॉल पर आयोजित इस किताब विमोचन और परिचर्चा में कथाकार डॉ .हरिसुमन बिष्ट, विक्रम प्रताप, वसीमा ख़ान, गार्गी प्रकाशन से जुड़े साथियों और बड़ी संख्या में पाठकों ने भी हिस्सेदारी की।
(जनचौक की रिपोर्ट)
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