Sunday, May 22, 2022

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नहीं रुकेगी हमारी कलम! क्योंकि इस दौर में ही तो लिखा जाना जरूरी है: अविनाश दास

(प्रोफेसर रविकांत और प्रोफेसर रतन लाल के बाद अब फिल्मकार, पत्रकार और लेखक अविनाश दास के पीछे सरकार पड़ गयी है। उनकी गिरफ्तारी के लिए गुजरात पुलिस आजकल जगह-जगह...

आखिर राहुल गांधी को कुल्हाड़ी पर पैर मारने की क्या जरूरत थी?

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के क्षेत्रीय दलों को 14.15 करोड़ वोट मिले थे, जो कांग्रेस...

ज्ञानवापी मामले को अब जिला जज सुनेंगे, सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश लागू रहेगा 

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ,जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पी एस नरसिंह की पीठ ने शुक्रवार...

लखनदेई नदी: छोटी नदी में प्रवाह से जलवायु परिवर्तन का मुकाबला आसान 

बिहार के उत्तरी छोर पर छोटी-सी नदी लखनदेई को पुनर्जीवित करने का एक सराहनीय प्रयास चल रहा है।...

सीपी कमेंट्री: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया चुनाव के मायने

लोकतंत्र की गारंटी के रूप में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव जरुरी है चाहे वे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव...

पहला पन्ना

‘इत्तफ़ाक-ए-आज़म’ की रिहाई से आगे क्यों नहीं बढ़ा सुप्रीम कोर्ट?

27 महीने बाद आज़म ख़ां सीतापुर जेल से रिहा हो गये। इससे पहले बारंबार रिहाई की स्थितियां बनीं, लेकिन रिहाई के एन वक्त पहले नया केस दर्ज करा दिया जाता और आज़म ख़ान जेल में रहने को विवश हो जाते। अब तक 89 मामले इत्तफ़ाक से आज़म खान के खिलाफ दर्ज हो चुके हैं। इत्तफ़ाक-ए-आज़म बन चुके आज़म खां जब कभी ज़मानत के बाद जेल से छूटने को होते, ‘इत्तफ़ाक’ से एक और केस उन पर चस्पा कर दिया जाता। हद तो तब हो गयी जब दिसंबर में ज़मानत याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया। पांच महीने तक फैसला सुरक्षित रहा। क्यों? क्या यह भी इत्तफाक था? जाहिर है ऐसे में यह कहने या सोचने की पूरी छूट मिल जाती है कि आज़म खां पर किसी नये ‘इत्तफाक’ के इंतज़ार में फैसला सुरक्षित रहा कि कहीं जेल से न छूट जाएं आज़म खां! सुप्रीम कोर्ट...

बीच बहस

नास्तिकता से बेहद गहरा है शिक्षा और विकास का रिश्ता

धर्म के प्रति मुख्य आकर्षण का एक कारण यह है कि यह अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का काल्पनिक अहसास दिलाता है। लेकिन बावजूद इसके दुनिया भर में नास्तिकता बढ़...

कमजोर कांग्रेस एक राजनीतिक सच्चाई है, ठीकरा नेतृत्व के सिर पर

2014 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस की चुनावी हार का रोलर-कोस्टर सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता दिख रहा।...

ये प्रायोजित आस्थाओं का दौर है!

ये प्रायोजित आस्थाओं का दौर है। जिसमें न धर्म की कोई भूमिका है न ही अध्यात्म के लिए कोई स्थान। यहां बस सत्ता और...

आखिर मोदी जर्मनी में भारतीयों को क्या बताना भूल गए?

पीएम मोदी मई, 2022 की शुरुआत में ही जर्मनी में थे। बर्लिन में उन्होंने भारतीय भाइयों से मुलाकात की और सम्बोधित भी किया। उनको...

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मीना खलखो हत्या मामले में सभी पुलिसकर्मी बरी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर की मीना खलखो हत्याकांड मामले में न्यायालय ने सभी आरोपी पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया...