ग्राउंड रिपोर्ट: अपनी विरासत सहेजने की जद्दोजहद करता कालबेलिया समुदाय

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राजस्थान। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां सबसे अधिक संख्या में धर्म, जाति और समुदाय आबाद है। कुछ समुदाय का अस्तित्व हजारों वर्ष पुराना माना जाता है तो कुछ ऐसे भी समुदाय जो इतने पुराने हैं कि उनके मूल अस्तित्व का कोई प्रमाण भी मौजूद नहीं है। कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जिनकी उत्पत्ति 11वीं या 12वीं सदी की मानी जाती है। हालांकि इस आधुनिक काल में इनमें से बहुत सारे समुदाय ऐसे हैं जिन्होंने अपनी संस्कृति और विरासत को आज भी मूल स्वरूप में बचा कर रखा है। यह समुदाय आधुनिक चिकित्सा से कहीं अधिक अपने देसी इलाज पर न केवल विश्वास करता है बल्कि उसे अपनाता भी है। हालांकि उनकी चिकित्सा विधि किसी वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित नहीं होती है। ऐसे में उसे प्रमाणित और सटीक नहीं माना जा सकता है। लेकिन यह समुदाय वर्षों से उस विधि को अपनाता आ रहा है। इन्हीं में एक राजस्थान का कालबेलिया समुदाय भी है। जो पीढ़ी दर पीढ़ी देसी विधि से आंखों में लगाने वाला सूरमा (काजल) तैयार करता आ रहा है। इनका दावा है कि इस सूरमा के कारण ही इनके समुदाय में कभी किसी की आंखें खराब नहीं हुई हैं। हालांकि आधुनिकता की चकाचौंध और वैज्ञानिक चिकित्सा से प्रभावित होकर अब इस समुदाय की नई पीढ़ी अपनी इस विरासत से दूर होने लगी है।

कालबेलिया समुदाय की नई पीढ़ी

घूम-घूम कर सांप पकड़ने के लिए विश्व विख्यात कालबेलिया समुदाय को सपेरा, जोगी अथवा घुमंतू समुदाय भी कहा जाता है।यह अपने नृत्य और संगीत के लिए भी विशेष पहचान रखता है। यह समुदाय अपनी उत्पत्ति 12वीं सदी में गुरु गोरखनाथ के शिष्य से जोड़ कर देखता है। अधिकतर कालबेलिया समुदाय खानाबदोश जीवन बिताते हैं। सरकार की ओर से इसे अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। खानाबदोश जीवन गुज़ारने के कारण ही अक्सर यह अपना अस्थाई आवास गांवों के बाहरी हिस्सों में बसाते हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे इस क्रम के कारण इन्हें स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं की ख़ासी जानकारी हो जाती है। इसी ज्ञान के आधार पर वे कई तरह के आयुर्वेदिक उपचार के भी जानकार हो जाते हैं। हालांकि पहले की अपेक्षा अब यह समुदाय एक जगह स्थाई निवास बना कर रहने लगा है। लेकिन इनमें से अधिकतर के पास पैतृक संपत्ति नहीं होती है।

कालबेलिया जनजाति की सर्वाधिक आबादी राजस्थान के पाली जिले में है। अजमेर जिला और इसके आसपास के गांवों में भी इनकी बड़ी संख्या में आबादी पाई जाती है। जिला के गुघरा पंचायत स्थित नाचण बावड़ी गांव में इस समुदाय की बड़ी संख्या आबाद है। इसके अतिरिक्त सरदार सिंह की ढाणी, किशनगढ़, काला तालाब, जुणदा रूपनगर और अराई में भी इस समुदाय की एक बड़ी संख्या आबाद है। समुदाय के देसी काजल के बारे में 80 वर्षीय बुजुर्ग बिदाम देवी कहती हैं कि “इसका प्रयोग समुदाय में जन्म लेने वाले बच्चे से लेकर 100 वर्ष की आयु वाले बुजुर्ग तक करते हैं। इसके प्रयोग से समुदाय के किसी सदस्य की आंखें कभी खराब नहीं हुई है। इस आधार पर वह दावा करती हैं कि इसका प्रयोग करने वाले उनके समुदाय के किसी भी सदस्य की प्राकृतिक रूप से कभी भी आंखें कमजोर नहीं हुई है और उन्हें कभी चश्मा पहनने की आवश्यकता नहीं हुई है।”

बिदाम देवी बताती हैं कि “यह सुरमा शुद्ध देसी रूप से समुदाय के लिए तैयार किया जाता है। इसे सांप का जहर, रतनजोत, समुद्री झाग, इलायची के बीज, पताल तुंबडी और बेल की जड़ आदि के मिश्रण से तैयार किया जाता है। इसे लगाते समय समुदाय के गुरुओं द्वारा बताये गए मंत्रों का जाप किया जाता है। उनका दावा है कि इसके प्रयोग से उनके समुदाय के किसी भी सदस्य की न तो लंबे समय तक आंखों की रौशनी जाती है और न ही मोतियाबिंद या आई फ्लू अथवा आंखों से पानी आता है।” वह बताती हैं कि उनका समुदाय इस सूरमा को महंगे दामों में बेचता भी है जिसे देसी इलाज पर विश्वास करने वाले ग्रामीण समुदाय के कई लोग खरीदते भी हैं। हालांकि वह इसका किसी भी प्रकार से वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दे पाती हैं। शायद इसीलिए वह मानती हैं कि तर्क और विवेक पर आधारित प्रमाण पर विश्वास करने वाले स्वयं उनके समुदाय की नई पीढ़ी अब इस पर विश्वास नहीं करती है और आधुनिक चिकित्सा पर अधिक विश्वास करने लगी है। इसीलिए पहले की अपेक्षा अब यह सूरमा कालबेलिया समुदाय में कम मात्रा में तैयार किया जाता है।

बिदाम देवी संवाददाता से बात करते हुए

नाचण बावड़ी में आबाद कालबेलिया समुदाय में बिदाम देवी सबसे अधिक उम्र वाले कुछ सदस्यों में एक हैं। उनके पति की 15 वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है। उनके दोनों बेटों की भी कुछ वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है। दोनों की विधवा पत्नी अपने बच्चों के साथ बिदाम देवी के साथ रहती हैं। बिदाम देवी को जहां प्रतिमाह वृद्धा पेंशन मिलती है वहीं उनकी बहुओं को भी सरकार की ओर से दी जाने वाली विधवा पेंशन का लाभ मिलता है। फिलहाल घर में कमाने वाला उनका सबसे बड़ा पोता अनिल है जो कालबेलिया समुदाय के सांप पकड़ने के पारंपरिक काम की जगह पेंटर का काम करता है। बिदाम देवी कहती हैं कि “पहले की अपेक्षा अब नई पीढ़ी सांप पकड़ने या गांव गांव जाकर सांप का खेल दिखाने की जगह व्यापार, मज़दूरी, मार्बल फैक्ट्रियों में लेबर वर्क और गाड़ी चलाने जैसे कार्यों को प्राथमिकता देने लगी है। इसके अतिरिक्त नई पीढ़ी में शिक्षा प्राप्त करने के प्रति भी जागरूकता बढ़ी है। समाज के ज़्यादातर बच्चे स्थानीय स्कूलों में जाने लगे हैं।” हालांकि बालिका शिक्षा के प्रति अभी भी इस समाज में बहुत अधिक जागरूकता नहीं आई है। समाज की अधिकतर लड़कियां अभी भी दसवीं तक नहीं पहुंच सकी हैं। जो एक चिंता का विषय है। 

कालबेलिया समाज की नई पीढ़ी का सांप पकड़ने से दूरी की एक वजह सांपों को लेकर सरकार द्वारा बनाये गए सख्त कानून भी हैं. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सांपों को रखने पर जेल या जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि बिदाम देवी उत्साह के साथ कहती हैं कि “आज भी गांव या शहर में कहीं भी घरों, मकानों, दुकानों या पुरानी इमारतों में सांप नज़र आता है तो उसे पकड़ने के लिए लोग हमें ही बुलाते हैं। सांप पकड़ने के एवज़ में लोग खुश होकर हमें पैसे और कपड़े भी देते हैं। वह कहती हैं कि उनके समुदाय में आज भी सांप को परिवार के एक सदस्य के रूप में माना जाता है। जब समाज में लड़की की शादी होती है तो उसे उपहार स्वरुप सांप और कुत्ता भेंट किया जाता है।” सांप के प्रति इसी लगाव ने समाज के बुज़ुर्गों को इसके ज़हर और अन्य जड़ी बूटियों को मिलकर देसी सूरमा बनाने के लिए प्रेरित किया था। जिसे यह पीढ़ी दर पीढ़ी बिना किसी ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के अपनाते आ रहे हैं।

बहरहाल, कालबेलिया समाज की नई पीढ़ी वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर भले ही इस देसी इलाज की जगह आधुनिक चिकित्सा को तरजीह देती हो, लेकिन बिदाम देवी जैसी बुज़ुर्ग अभी भी अपने समाज के इस विरासत पर न केवल गर्व करती हैं बल्कि वह इसे सहेज कर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जद्दोजहद भी करती नज़र आ रही हैं।

(अजमेर से धनश्याम सादावत की ग्राउंड रिपोर्ट।)

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