राजपूतों का देशव्यापी विरोध बीजेपी के लिए बन गया है गले की हड्डी

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अहमदाबाद। चुनाव जीतने के लिए भाजपा की व्यूह रचना हर एक स्टेट में अलग होती है जिसमें गुजरात हमेशा से प्रयोगशाला बना हुआ है। गुजरात में जो स्ट्रैट्जी काम कर जाती है उसे दूसरे स्टेट में भी भाजपा द्वारा लागू किया जाता है। जैसा कि 2012 गुजरात विधानसभा चुनाव में भूतपूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने भाजपा से अलग होकर गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई थी, और भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। 

नतीजों में ये बात साफ तौर पर नजर आई कि एंटी इनकम्बेंसी के कारण भाजपा के टूटने वाले वोट कांग्रेस में न जाकर केशुभाई की पार्टी को मिले थे, जिससे भाजपा को सीटों की संख्या में कोई नुकसान नहीं हुआ था। अगर ये वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हुए होते तो भाजपा को सरकार बनाने में चुनौती का सामना करना पड़ सकता था। चुनाव जीतने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत केशुभाई के घर जाकर उनके पैर छुए थे। 

ये स्ट्रैट्जी गुजरात में कामयाब होने के बाद इसे 2017 में उत्तर प्रदेश में लागू किया गया था। 2012 से 2017 के दरमियान अखिलेश यादव के शासन में सदन में भाजपा के सिर्फ 47 विधायक थे। 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने का था। चुनाव में प्रमुख चेहरा मोदी ही रहे लेकिन भाजपा ने मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में मनोज सिन्हा को प्रोजेक्ट किया था। योगी आदित्यनाथ के संगठन हिन्दू युवा वाहिनी ने इसका विरोध किया था, और इसे योगी आदित्यनाथ का अपमान बताकर भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी। 

नतीजों में ये बात साफ नजर आती है कि गुजरात की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को न मिलने वाले वोट सपा के बजाय हिन्दू युवा वाहिनी के उम्मीदवारों को मिले और भाजपा ने 24% का पॉजिटिव स्विंग पाते हुए 2012 की 47 सीट के मुकाबले 265 सीट का गेन करते हुए 312 सीट प्राप्त की थी। जिसका चेहरा मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा ने चुनाव में दिखाया था उस मनोज सिन्हा को दरकिनार कर चुनाव में भाजपा के मोदी से नाराज नेता के रूप में छवि बनाए रखे हुए योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 

अब बात करते है, गुजरात के वर्तमान लोकसभा चुनाव में भाजपा की स्ट्रेट्जी पर। तीन दशक से राज्य में शासन धूरा संभाले हुए भाजपा को गुजरात में हर चुनाव में एंटी इनकम्बंसी का खतरा रहता है। 1998 से भाजपा गुजरात में लगातार चुनाव जीतती आई है। हर चुनाव में भाजपा की रणनीति अलग होती है। इस बार लोकसभा चुनाव में जाने से पहले भाजपा को गुजरात में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था। 

प्रदेश में नकली नासा वैज्ञानिक से लेकर नकली पुलिस, नकली सरकारी ऑफिस, नकली टोल टैक्स प्वाइंट, पेपर लीक मामले के अलावा गुजरात में सब से बड़ा चुनावी मुद्दा वेलस्पन कंपनी द्वारा कच्छ के एक निर्धन दलित फैमिली के नाम से इलेक्टोरेल बॉन्ड खरीद कर भाजपा को 11 करोड़ का चंदा देने का हो सकता था। 

देश में लोकसभा चुनाव 16 मार्च को घोषित हुए, और अगले ही दिन वेलस्पन कंपनी द्वारा दलित किसान के नाम से भाजपा को 11 करोड़ का चंदा देने का मामला उजागर हुआ। गुजरात के प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर भाजपा का अच्छा खासा प्रभाव है लेकिन सोशल मीडिया में वेलस्पन कम्पनी को भाजपा सरकार  द्वारा दिए गए लाभ और बदले में प्राप्त किए गए 11 करोड़ के चंदे की काफी आलोचना हुई। 

गुजरात कांग्रेस ने भी वेलस्पन कम्पनी द्वारा भाजपा को दिए गए 11 करोड़ के चंदे और बदले में भाजपा सरकार द्वारा कम्पनी को मिले लाभ पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी और मुद्दे को चुनाव में लाने की कोशिश की। अब 23 मार्च को केंद्रीय मंत्री और राजकोट लोकसभा के भाजपा प्रत्याशी पुरुषोत्तम रुपाला वाल्मीकि समाज की एक छोटी सी सभा में पहुंचते हैं और वहां पर बिना कोई जरूरत के उन के वक्तव्य में क्षत्रियों पर आपत्ति जनक टिप्पणी करते हैं जिस में वो कहते हैं कि क्षत्रियों ने तो मुगलों से रोटी बेटी का व्यवहार बना लिया था जब कि वाल्मीकि समाज ने अंग्रेजों के सामने बहादुरी दिखाई थी। रुपाला के वक्तव्य का वीडियो गुजरात में तेजी से वायरल होता है और अगले दो दिन में मीडिया में सुर्खियों में आ जाता है। वेलस्पन का 11 करोड़ का चंदा दो धंधा लो मुद्दा गायब और क्षत्रिय अपमान मुद्दा इन। 

गुजरात के राजनीतिक हल्के में इस बात की चर्चा है कि गुजरात में कांग्रेस को मेन स्ट्रीम मीडिया में साइड लाइन करने के लिए और जनता की आवाज़ को दबा देने के लिए भाजपा ने जान बूझकर क्षत्रिय विवाद खड़ा किया है। इस तर्क को समर्थन तब मिला जब गुजरात का सारा प्रदेश चैनल और मीडिया लगातार रूपाला को हाइलाइट करता रहा और कांग्रेस को दिन के 24 घंटे में से 24 मिनट का समय भी मेन स्ट्रीम मीडिया में मिलना बंद हो गया। लेकिन भाजपा की ये राजनीतिक चाल अब भाजपा के गले की हड्डी बनती हुई नजर आने लगी है।।

पुरुषोत्तम रुपाला ने माफ़ी भी मांग ली, लेकिन गुजरात के क्षत्रिय संगठनों ने भाजपा से मांग की कि पुरुषोत्तम रूपाला का राजकोट से टिकट काटा जाए। 23 मार्च से गुजरात के मीडिया में शीर्ष बने हुए रुपाला विवाद में इस से पहले कभी भी किसी ने भाजपा से ये नहीं कहा कि भाजपा अगर रूपाला का टिकट नहीं काटती है तो वो भाजपा को हरा देंगे।

सभाओं में उग्र वक्तव्य सुनने को मिले लेकिन कहीं से भी ये आवाज नहीं निकली कि भाजपा अगर क्षत्रियों को अनदेखा करती है तो क्षत्रिय समाज भाजपा के खिलाफ वोट करेगा या कांग्रेस को वोट देगा। लेकिन अप्रैल 15 को राजकोट में आयोजित क्षत्रिय महासम्मेलन में नेताओं ने कहा कि अगर बीजेपी रूपाला का टिकट वापस नहीं लेती है तो समाज गुजरात की सभी 26 सीटों पर ऑपरेशन रूपाला चलाएगा। 

क्षत्रिय नेताओं ने साफ किया कि रूपाला के बयान से क्षत्रिय समाज का अपमान हुआ है। क्षत्रिय समाज के अग्रणियों ने 19 अप्रैल तक का समय बीजेपी को दिया है।रूपाला के उम्मीदवार बने रहने पर आंदोलन का दूसरा चरण शुरू करने की धमकी भी दी है। अगर भाजपा इस विवाद का हल नहीं निकाल पाती है तो दूसरे चरण के आंदोलन में भाजपा को गुजरात की सुरेंद्रनगर और भावनगर सीट पर नुकसान हो सकता है, जहां पर क्षत्रिय समाज के मतदाताओं का वर्चस्व है।

होली के मौके पर पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा था कि महाराजाओं ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिये थे और रोटी बेटी का व्यवहार किया था। क्षत्रिय समाज रूपाला के इसी बयान को लेकर आंदोलनरत है। रूपाला तीन बार माफी मांग चुके हैं, लेकिन क्षत्रिय समाज का कहना है कि रूपाला का टिकट रद्द हो इससे कम मंजूर नहीं है। 

क्षत्रिय समाज की तरफ से बनाई गई राजपूत संकलन समिति के प्रमुख करण सिंह चावड़ा ने पुरुषोत्तम रुपाला के उस बयान पर भी आपत्ति व्यक्त की है, जिसमें उन्होंने कहा था कि हवाएं उस चिराग का क्या बिगाड़ेंगी जिसकी हिफाजत खुदा करे। चावड़ा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि रूपाला शेरो शायरी में ललकारना बंद करें। गुजरात के अलावा अन्य राज्यों से आए क्षत्रिय नेताओं के तेवर देखते हुए, भाजपा को न सिर्फ गुजरात में, बल्कि राजस्थान, हरियाणा, और मध्य प्रदेश में भी क्षत्रिय अपमान विवाद का खामियाजा भुगतना पड़ सकता हैं।

भाजपा के सामने आगे कुंआ पीछे खाई वाली समस्या खड़ी हुई है। अगर रूपाला का टिकट रद्द होता है तो मोदी की मजबूत और कभी न झुकने वाले नेता के रूप में जो छवि बनी है उस पर उनके ही गृह राज्य गुजरात में धब्बा लग सकता है। और अगर रूपाला को चुनाव में बनाए रखते हैं तो आंदोलन के दूसरे चरण में क्षत्रिय समाज सीधे भाजपा के खिलाफ खड़ा हो सकता है जिस का नुकसान भाजपा को देश की कम से कम 23 सीट पर हो सकता है।

गुजरात के क्षत्रिय आंदोलन का घटना क्रम

23 मार्च: केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला का विवादित बयान आया, तब से रुपाला ने अब तक तीन बार और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल ने एक बार हाथ जोड़कर क्षत्रिय समाज से माफी मांगी है।

24 मार्च: गुजरात के विभिन्न जिलों से क्षत्रिय समाज के नेताओं द्वारा पुरुषोत्तम रुपाला की निंदा।

25 मार्च: गुजरात के पाटीदार नेताओं की बैठक में रुपाला को समर्थन करने का निर्णय किया गया।

26 मार्च से 2 अप्रैल तक  गुजरात के अलग-अलग जिलों में रुपाला के खिलाफ प्रशासनिक मंजूरी न लेने के बावजूद कार्यक्रम हुए, नारेबाजी हुई, किसी भी स्थान पर पुलिस ने कोई एफआईआर दाखिल नहीं की, न ही आंदोलनकारियों को रोका गया। अगर इस प्रकार के कार्यक्रम किसी अन्य समुदाय से हुए होते तो पुलिस हिरासत से लेकर रिमांड तक की कार्रवाई करती।

6 अप्रैल: राजकोट में क्षत्रिय समाज की विशाल रैली निकाली गई जिसमें 9 महिलाओं ने भाजपा कार्यालय के सामने जौहर करने की घोषणा की, जिसके चलते राज्य पुलिस ने उन महिलाओं को नजरबंद किया।

10 अप्रैल: राजस्थान के सीकर में राजपूत करणी सेना द्वारा विरोध-प्रदर्शन 

14 अप्रैल: राजकोट में क्षत्रिय महा सम्मेलन जिसमें आंदोलन के दूसरे चरण में गुजरात की तमाम 26 सीट पर भाजपा का विरोध करने की चेतावनी दी गई।

(गुजरात से वरिष्ठ पत्रकार सलीम हाफेजी की रिपोर्ट।)

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