ऐसा क्यों? बढ़ती मुश्किलों के बावजूद मोदी पर ही दांव! 

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आम चुनाव के लिए मतदान शुरू होने से ठीक पहले संभवतः एकमात्र ऐसा जनमत सर्वेक्षण सामने आया है, जिसमें ध्यान सिर्फ वोट प्रतिशत और सीटों का अनुमान लगाने पर केंद्रित नहीं रखा गया है। सीएसडीएस-लोकनीति के इस सैंपल सर्वे में यह जानने की कोशिश भी की गई है कि इस वक्त आम जन अपनी जिंदगी को लेकर क्या महसूस कर रहे हैं। यानी विभिन्न वर्गों की राजनीतिक पसंद और उनकी जिंदगी की रोजमर्रा की जद्दोजहद को साथ-साथ समझने का प्रयास किया गया है। 

इस सर्वे से इस बात को समझने के कुछ सूत्र मिले हैं कि आज के भारत में लोगों की आर्थिक परिस्थितियों से उनका वोट कितना प्रभावित होता है- यानी इसका कि आम मतदाताओं की वर्तमान आर्थिक हालत का मौजूदा आम चुनाव पर कितना और कैसा असर पड़ सकता है?

सर्वे के दौरान रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े आम मसलों पर भी लोगों की राय जानने की कोशिश की गई, इसलिए सर्वे रिपोर्ट से यह संकेत मिला है कि सकल अर्थव्यवस्था को लेकर जो कहानियां आज राजनीति और मेनस्ट्रीम मीडिया के दायरे में हावी हैं, उनका आम जन पर वास्तव में क्या असर हुआ है। इस पहलू का सीधा संबंध भारत के भविष्य से है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी 2024 का आम चुनाव 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना दिखाते हुए लड़ रही है। ऐसे समय में यह जानना जरूरी हो जाता है कि इस बड़बोलेपन का जमीनी स्थितियों और आम जन की रोजमर्रा की जिंदगी से क्या संबंध है?

इसके पहले कि हम इस सर्वे से उभरने वाली तस्वीर पर आएं, यह स्पष्ट कर लेना उचित होगा कि कोई भी सर्वेक्षण अपने-आप में संपूर्ण नहीं होता। यह संभव है कि सर्वेक्षण की सैंपलिंग दोषमुक्त ना हो। फिर सर्वेक्षण में शामिल किए गए लोगों के अनेक उत्तर इस बात से तय होते हैं कि उनके सामने सवाल को किस रूप में रखा जाता है। सवाल तय करने में सर्वेक्षणकर्ताओं के अपने पूर्वाग्रह काम कर रहे हो सकते हैं। लेकिन ये बातें तमाम जनमत या अन्य सर्वेक्षणों पर लागू होती हैं।

इसलिए जब किसी सर्वे रिपोर्ट को आधार बना कर बात की जाती है, तो ऐसी संभावित कमियों को मान कर चला जाता है। चूंकि जनमत सर्वेक्षणों के अलावा आम जन मानस को जानने का कोई और बेहतर तरीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन संभावित कमियों के बावजूद सर्वेक्षण निष्कर्षों का महत्त्व बना रहता है। 

तो अब सीएसडीएस-लोकनीति सर्वे की तरफ लौटते हैं। इस सर्वे पर आधारित विस्तृत रिपोर्टें अंग्रेजी अखबार द हिंदू में छपीं। उनसे सामने आई पहली तस्वीर का सार यह है कि बढ़ती आर्थिक मुसीबतों से देश का आम जन परेशान है। इन आंकड़ों पर ध्यान दीजिएः 

  • 62 प्रतिशत लोगों ने कहा कि (मोदी राज के गुजरे पांच वर्षों में) नौकरी मिलना अधिक कठिन हो गया है।
  • 71 प्रतिशत लोगों ने कहा कि महंगाई बढ़ी है।
  • 55 प्रतिशत लोगों ने कहा कि गुजरे पांच वर्षों में भ्रष्टाचार बढ़ा है। (इसी संस्था के सर्वे में 2019 के आम चुनाव से पहले ऐसा मानने वाले लोगों की संख्या 40 फीसदी थी)
  • सर्वे में एक सवाल यह पूछा गया कि ‘आपकी जो आमदनी है, उससे आप क्या-क्या कर पाते हैं।’ इसके जवाब में 12 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में भी दिक्कत आती हैं। 23 फीसदी लोगों ने कहा कि कुछ दिक्कतों के साथ वे अपनी जरूरतें पूरी कर पाते हैं। यानी कुल 35 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जो अपनी मौजूदा आमदनी से अपनी जरूरतें आसानी से पूरी नहीं कर पाते। उनके अलावा 36 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अपनी जरूरतें तो पूरी कर लेते हैं, लेकिन कोई बचत नहीं कर पाते। यानी कुल 71 प्रतिशत लोग कोई बचत नहीं कर पाते। सिर्फ 22 फीसदी लोगों ने कहा कि वे जरूरतें पूरी करने के बाद बचत भी कर पाते हैं। बाकी सात फीसदी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया।  

रोजगार, महंगाई और भ्रष्टाचार तीनों का सीधा संबंध आम जन की रोजमर्रा की जिंदगी से है। सर्वे निष्कर्षों के बारे में सीएसडीएस-लोकनीति के विश्लेषकों सुहास पलशीकर, संजय कुमार और संदीप शास्त्री ने लिखा- 

“दो खास बिंदु उभरकर सामने आए हैं। एक- मतदाता उन आर्थिक मुसीबतों से अवगत हैं, जिनका उन्हें सामना करना पड़ रहा है। देश की सकल अर्थव्यवस्था (micro economy) से जुड़े संकेतों का इस्तेमाल कर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि अर्थव्यवस्था का हाल बेहतर है। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मतदाता अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित हैं। प्री-पोल सर्वे से जो दूसरा पहलू साफ तौर पर उभरकर सामने आया, वह वर्ग विभाजन है।

आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न लोगों की तुलना में गरीब और निम्न मध्य वर्ग के लोग खड़ी हो रही आर्थिक मुसीबतों से अधिक बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अलग-अलग स्तरों पर मौजूद आर्थिक बेचैनी का अगर जायजा लिया जाए, तो यह पहलू स्पष्ट हो जाता है। संपन्न तबकों की तुलना में अपेक्षाकृत गरीब समूहों के लोग अधिक चिंतित नजर आते हैं।”

तो कुल मिलाकर इस सर्वे ने भारत में बहुसंख्यक जनता की तेजी से बिगड़ रही आर्थिक स्थिति और देश में बढ़ रहे वर्ग विभाजन का संकेत दिया है। क्या यह आज की एक बड़ी विंडबना नहीं है कि जमीनी स्थिति ऐसी होने के बावजूद देश में आज वर्ग आधारित राजनीति करने वाली ताकतों का वजूद इक्का-दुक्का कहीं नजर आता है। पहचान आधारित प्रतिनिधित्व की राजनीति (identity based representational politics) इस कदर हावी हुई है कि इस सवाल को सही संदर्भ में देखते हुए अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान जन समूहों को गोलबंद करने की किसी मुहिम का कोई ठोस संकेत तक उपलब्ध नहीं है। 

जब यह हाल हो, तो क्या इसमें कोई हैरत है कि उपरोक्त स्थितियों के बावजूद मौजूदा चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की संभावनाएं बेहतर बनी हुई हैं? सवाल यह भी है कि बढ़ते वर्ग विभाजन और बिगड़ती आर्थिक स्थितियों के लिए आम लोगों की बहुसंख्या अगर मुख्य रूप से भाजपा या नरेंद्र मोदी सरकार को जिम्मेदार नहीं मानती, तो इसके लिए किसे दोषी माना जाएगा? इन आंकड़ों पर गौर कीजिएः

  • सर्वे के दौरान यह सवाल भी पूछा गया कि रोजगार के सिकुड़ते अवसरों के लिए कौन जिम्मेदार है? इसके लिए केंद्र सरकार को सिर्फ 21 प्रतिशत लोगों ने दोषी ठहराया। 17 फीसदी लोगों ने इसके लिए अपने राज्य की सरकार को जिम्मेदार बताया, तो 57 प्रतिशत लोगों ने केंद्र और राज्य- दोनों सरकार को उत्तरदायी माना।
  • महंगाई के मुद्दे पर भी लगभग इसी तरह के जवाब सामने आए। महंगाई के लिए 26 प्रतिशत लोगों ने केंद्र, 12 प्रतिशत लोगों ने राज्य, और 56 फीसदी लोगों ने केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों को जिम्मेदार माना।

गौरतलब है कि फिलहाल चुनाव नई केंद्र सरकार को चुनने के लिए हो रहा है। ऐसे में अगर लगभग तीन चौथाई मतदाता अपनी बुनियादी मुश्किलों के लिए वर्तमान केंद्र सरकार को दोषी ही नहीं मान रहे हों, तो फिर अपने वोट के जरिए उसका उत्तरदायित्व कैसे तय करेंगे? और इसी बिंदु पर वो भावनात्मक बातें महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं, जिन्हें लेकर इस बार भी भाजपा वोट पाने की जुगत में लगी (या लगी रहती) है। 

यह यूं ही नहीं है कि आम जन के बीच गहराती आर्थिक मुसीबतों के बावजूद भाजपा ने विकसित भारत का सपना दिखाने की जुर्रत की है- जिसके तहत ओलिंपिक खेलों के आयोजन, बुलेट ट्रेन, वंदे भारत ट्रेन, भारत में विमान के उत्पादन का पूरा इको-सिस्टम लाने आदि जैसे वादों को लेकर वह मतदाताओं के बीच गई है। ये वो वादे हैं, जिनके पूरा होने से (अगर वे पूरा हो भी जाएं तो) मुसीबतज़दा लोगों को कोई राहत नहीं मिलनी है। बल्कि ऐसी योजनाओं में संसाधन लगने का दुष्प्रभाव उन्हें ही झेलना होगा। मगर भाजपा को इसकी फिक्र नहीं है। क्यों?  

सर्वे के आधार पर सीएसडीएस-लोकनीति के उपरोक्त विश्लेषकों ने इसका उत्तर देने की कोशिश इस रूप में की हैः

“ऐसे कई संकेत हैं, जो चुनाव नतीजों को सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में झुका सकते हैं। यह धारणा कि देश के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर भारत की छवि में सुधार हुआ है, पार्टी की रणनीतियों को मिली स्पष्ट स्वीकृति, और कुछ मुद्दों के प्रति रुख अस्पष्ट रखने का लाभ भाजपा को मिला है। मगर सबसे बड़ी बात हिंदू पहचान को मजबूती देना है। हिंदू पहचान और राम मंदिर मुद्दे के साथ भाजपा के स्पष्ट जुड़ाव ऐसे पहलू हैं, जिनकी वजह से सत्ताधारी पार्टी आर्थिक कारणों से उत्पन्न असंतोष से पार पाने में सफल हो सकती है।”

जाहिर है, इन संकेत का स्रोत भी यह सर्वे ही है। इस चुनाव-पूर्व सर्वे में यह अनुमान नहीं लगाया गया है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी। लेकिन इसमें पार्टियों के लिए संभावित वोट प्रतिशत का अनुमान बताया गया है। इसके मुताबिक 2019 की तुलना में भाजपा के वोट प्रतिशत में लगभग ढाई प्रतिशत की बढ़ोतरी संभव है। यानी वह 40 फीसदी वोट पाने में सफल हो सकती है। सहयोगी दलों के साथ उसके वोट का आंकड़ा 46 प्रतिशत तक जा सकता है। 

उधर कांग्रेस के वोट प्रतिशत में दो फीसदी का इजाफा मुमकिन है, जिससे इस बार उसे 21 फीसदी तक वोट मिल सकते हैं। इंडिया गठबंधन के अन्य दलों को 13 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान लगाया गया है। यानी इस सर्वे के मुताबिक इंडिया गठबंधन 34 प्रतिशत वोट तक पहुंच सकेगा। अगर इसमें लेफ्ट के दो प्रतिशत वोट भी जोड़ दें, तो यह आंकड़ा 36 फीसदी तक पहुंचता है। फिर भी भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए से इंडिया गठबंधन को दस फीसदी वोट कम मिलने का अनुमान लगाया गया है।

सर्वे से यह भी सामने आया है कि नरेंद्र मोदी का नेतृत्व चुनावों में एक महत्त्वपूर्ण पहलू बना हुआ है। प्रधानमंत्री पद के लिए वे आज भी लगभग आधे मतदाताओं की पहली पसंद बने हुए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस होड़ में दूसरे नंबर पर हैं, लेकिन वे 30 फीसदी से भी कम मतदाताओं की पहली पसंद हैं। 

यह बहुत बड़ा फासला है। इंडिया टुडे की वेबसाइट पर सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे पर आधारित एक रिपोर्ट छपी है। उसमें इस सर्वे से सामने आए वोट प्रतिशत के अनुमान के आधार पर सीटों का अनुमान लगाने की कोशिश की गई है। उसके मुताबिक अगर यही वोट प्रतिशत रहा, तो भाजपा को लोकसभा की 315, उसके सहयोगी दलों को 46 (यानी एनडीए को 361), कांग्रेस को 62, कांग्रेस के सहयोगी दलों को 49 (यानी इंडिया गठबंधन को 111 सीटें) मिल सकती हैं। 

अनेक मौकों पर चुनाव पूर्व (प्री-पोल सर्वे) या मतदान उपरांत सर्वेक्षण (एग्जिट पोल) गलत साबित हुए हैं। ऐसा उन विकसित देशों में भी हुआ है, जो आकार में छोटे हैं और जहां समझा जाता है कि सैंपलिंग करना अपेक्षाकृत आसान है। बहरहाल, इस सीएसडीएस-लोकनीति सर्वे की विस्तार से चर्चा करने के पीछे इस स्तंभकार का मकसद अगले चार जून को उभर सकने वाली राजनीतिक स्थिति का अनुमान लगाना नहीं है। यहां महत्त्वपूर्ण वो जमीनी आर्थिक स्थितियां और उनको लेकर आम मतदाताओं की समझ है, जो इस सर्वे से सामने आई हैं। ये दोनों ही पहलू इस बात का संकेत हैं कि देश में जन-पक्षीय राजनीति की ठोस जमीन बन रही है। 

लेकिन ऐसी सियासत तभी विकसित हो सकती है, अगर राजनीतिक शक्तियां और बुद्धिवीजी दो तरह के वैचारिक कट्टरपंथ से बाहर निकलें। इनमें एक मुक्त बाजार की सर्वोच्चता संबंधी कट्टरपंथ (market fundamentalism) है और दूसरा, न्याय को (जाति, संप्रदाय, लिंग आदि) पहचान आधारित दड़बों में देखने की सोच है, जिसे शासक/अभिजात्य वर्गों ने वर्ग आधारित एकता की संभावना को कुंद करने के लिए सुनियोजित तरीके से फैलाया है। देश का सारा विपक्ष- और बुद्धिजीवी वर्ग का बहुत हिस्सा फिलहाल इन दोनों तरह के कट्टरपंथ का शिकार बना हुआ है। और इसका लाभ भाजपा उठा रही है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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