Friday, March 1, 2024

प्रफुल्ल कोलख्यान

लोकतंत्र के खेल में खून, खतरा और कानून का ककहरा

हिमाचल प्रदेश सत्तारूढ़ कांग्रेस ने 15 भाजपा के विपक्षी विधायकों को निलंबित कर बजट पास करवा लिया है। प्राथमिक तौर पर माना जा सकता है कि सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार पर से खतरा टल गया है। हमारे देश...

एक टांग पर खड़ा बनारस शहर नहीं, समास है: केदारनाथ सिंह की कविता बनारस

कविता में सामान्य मनुष्य, स्थान का उल्लेख तो होता ही रहता है। किसी विशिष्ट या खास व्यक्ति या शहर आदि पर कविता कम ही देखने को मिलती है। सामान्यतः, कविता सामान्य पर होती है। खास पर कविता लिखना थोड़ा...

मुद्दा क्या है ! ‘घनचक्करों’ और ‘धनचक्रों’ का तिकड़म ताल: मुद्दा है लोकतंत्र अब हो बहाल!

गिने-चुने दिन रह गये हैं। आम चुनाव 2024 सामने है। विभिन्न राजनीतिक दल और गठबंधन अपने-अपने चुनावी कार्य-क्रम और कार्य-सूची (एजेंडा) बनाने में जुटे हुए हैं। चुनावी मुद्दा की सूची तैयार कर रहे हैं। इस समय काम चल रहा...

किसानों के लिए ‘निधि सम्मान’ से अधिक जरूरी है ‘विधि सम्मान’ की व्यवस्था

सपनों का समय आ गया है। एक दौर से निकलकर दूसरे दौर में पहुंच रहे हैं। सपना झूठ होता है। कभी-कभी सच भी हो जाता है। सपना देखना और बुनना मनुष्य का स्वभाव है। क्यों न एक सवाल ही...

झुंडी-मुंडीकरण की राजनीतिक रणनीति और भारत का लोकतंत्र

किसान आंदोलन पर हैं, भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में। भारत में आंदोलन पर व्यवस्था जिस तरह से कहर ढा रही है, वह अप्रत्याशित है। जिससे निदान की अपेक्षा हो वही अप्रत्याशित व्यवहार करने लगे तो...

आक्रमण और अतिक्रमण के बीच लोकतंत्र का संक्रमण

शुभकरण सिंह की शहादत और सौ-दो-सौ अधिक आंदोलनकारियों के आहत होने के बाद परेशान किसान आंदोलन अपना अगला कार्य-क्रम बना रहा है। मुआवजा, हर्जाना, घेराव, प्रदर्शन आदि के अलावा लोकतंत्र में और क्या उपाय होता है! किसान आंदोलन अहिंसा...

टरकाव और टकराव की राजनीति के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति का मर्म

राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर हैं। लोग जुट रहे हैं। पत्रकार चिंता में हैं। देश में आम चुनाव सिर पर है, और राहुल गांधी यात्रा में जनजुटाव से उल्लसित हैं। जन-जुड़ाव का आनंद मन को मोह लेता...

लोकतंत्र के चित्त में चौसर की बिसात बिछ गई है! हम एक असंभव दौर से गुजर रहे हैं!

पूरे देश में अभाव और अकाल का कोलाहल है। आंदोलन है। हाहाकार है। मोटरी-गठरी संभालते हुए, जनता बेजार है। एक बार नहीं, बार-बार दुहराया जा रहा है-अब की बार, चार सौ पार! दुहराव की शैली नीलामी की बोली जैसी...

सामाजिक अन्याय और आर्थिक अन्याय के द्वंद्व विकार और सामाजिक लोकतंत्र की व्यथा कथा

अभी-अभी अयोध्या के भव्य और दिव्य मंदिर में रामलला की प्रण-प्रतिष्ठा का आयोजन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ है। और अब किसान आंदोलन चल रहा है। कुरुक्षेत्र दहाड़ रहा है। ‘सुंदर कांड’ के बाहर अशांति की आशंकाओं के बीच महाभारत के...

गिरोही चरित, छल-छलावा-छर्रा का खन-खन और छम-छम के माहौल में लोकतंत्र बेदम

अभी-अभी देश में इतने धूमधाम से धीर, उदात्त ललितचरित के आदर्श- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है और इधर पूरे देश में जैसे कोलाहल मचा हुआ है। एक तरफ औद्धत्य है तो एक तरफ आंदोलन है! प्रतिष्ठित (अच्छे से...

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