बिहार में हाल ही में हुए एक सर्वे वोट वाइब के ओपिनियन पोल के अनुसार कांटे की टक्कर में बिहार में महागठबंधन को बढ़त है। सर्वे के अनुसार 48.5% लोगों का रुझान नीतीश सरकार के खिलाफ है,18.3% का रुझान सरकार के पक्ष में है और 22% उदासीन हैं। ये रुझान पुरुषों और महिलाओं दोनों में समान रूप से हैं। इसी तरह सभी उम्र के लोगों में यह नाराजगी है। कम उम्र के लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा ज्यादा है।
दरअसल इसका कारण यह है कि बेरोजगारी आज बिहार में सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इन नतीजों को समझने में मदद मिलती है जब जम याद रखते हैं कि पिछले 2020के चुनाव में भी दोनों गठबंधनों के बीच मात्र 12 हजार मतों का अंतर था। जबकि उसके ठीक पहले लोकसभा चुनाव में NDA ने 40में से 39 सीटें जीती थीं। अबकी बार तो उसे 30 सीटें ही मिली हैं। इस बार सरकार के खिलाफ 20 साल की जबरदस्त एंटी इनकंबेंसी है इसलिए ओपिनियन पोल में आ रहे रुझान बहुत स्वाभाविक हैं।
एक अन्य सवाल के जवाब में 55% लोगों ने कहा कि वे अपने वर्तमान विधायक से नाराज हैं, जबकि मात्र 29.7% लोगों ने मौजूदा विधायक के प्रति विश्वास व्यक्त किया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टियां अगर अपने वर्तमान विधायकों को ही चुनाव में उतरती हैं तो उसके क्या नतीजे हो सकते हैं। बेशक वे अपने प्रत्याशी बदलती हैं तो नतीजे बदल सकते हैं। इस प्रश्न के जवाब में कि उनके अनुसार किस पार्टी की सरकार में बिहार विकास कर सकता है, सर्वाधिक 36.1%लोगों ने माना कि महागठबंधन के राज में ऐसा होगा जबकि उससे कम 35.4% लोगों ने माना कि NDA के शासन में यह संभव होगा।
देखा जाय तो यह जनता के परसेप्शन में भारी उलटफेर है क्योंकि नीतीश कुमार को पहले विकास पुरुष माना जाता था और राजद की छवि कमोबेस विकास विरोधी छवि थी। इसमें एक रोचक बात यह भी सामने आई कि 10% लोग मानते हैं कि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी सबसे अच्छा विकास कर सकती है 18 से 24 के आयु वर्ग में तो 21% का यह मानना है।
दरअसल उपचुनावों में भी जन सुराज को 10% के आसपास वोट मिला था। विश्लेषकों का मानना है कि जनसुराज फिलहाल दुधारी तलवार जैसी है जो एक ओर एंटी इनकंबेंसी में अपना हिस्सा बंटाते हुए महागठबंधन के वोट काट रही है।वहीं लगातार नीतीश कुमार पर हमले करती हुई वह सरकार विरोधी भावना को बढ़ा रही है।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि जब लोगोंसे पूछा गया कि वे सबसे बड़ा मुद्दा किसे मानते हैं तो 48.5% की विराट बहुसंख्या में लोगों ने कहा कि वे बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं। पुरुषों में यह संख्या 54% थी। वहीं 11% लोग महंगाई को तो 12% ने कानून व्यवस्था को सबसे बड़ा मुद्दा बताया। यह बड़ा ही स्वाभाविक नतीजा है।
बिहार में रोजगार के अवसर ही नहीं है। सरकारी नौकरियों में जगहें खाली पड़ी हैं लेकिन भर्ती नहीं हो रही है। औद्योगिकरण के अभाव में उद्योग के क्षेत्र में कोई अवसर है नहीं। यहां तक कि बंद पड़ी चीनी मिलें तक नहीं खुल सकी, जिसका आश्वासन स्वयं प्रधानमंत्री देकर गए थे। सुनते हैं महिलाएं वहां प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप बिना चीनी की चाय बना रही हैं। ले दे कर मनरेगा ही रोजगार का ग्रामीण मजदूरों के लिए एकमात्र साधन है।
जाहिर है न पढ़े लिखे लोगों के लिए काम के अवसर हैं,न कम पढ़े लिखे या अनपढ़ों के लिए। नतीजतन करोड़ों की संख्या में प्रवासी बिहारी देश के तमाम राज्यों में दर दर भटकने को अभिशप्त हैं। साथ ही बड़े पैमाने पर बिहार से ब्रेन ड्रेन हो रहा है,जो उसके पिछड़ेपन को और बढ़ा रहा है। जब लोगों से पूछा गया कि रोजगार के लिए किस दल पर उन्हें भरोसा है तो सबसे ज्यादा 40% लोगों ने महागठबंधन पर विश्वास जताया और NDA पर 32.3% लोगों ने, अच्छी खासी संख्या में विशेषकर युवाओं को प्रशांत किशोर से भी उम्मीद है।
महागठबंधन पर विश्वास का कारण स्पष्ट है, जिस तरह तेजस्वी ने पिछले चुनाव के समय नौकरियों को लोकप्रिय मुद्दा बना दिया था और बाद में नीतीश कुमार के साथ सरकार बनने पर करीब 5लाख नौकरियां युवाओं को मिलीं, उसका श्रेय तेजस्वी और महागठबंधन को मिला।
सबसे बड़ा उलटफेर परसेप्शन के स्तर पर कानून व्यवस्था के मुद्दे को लेकर होने जा रहा है। जहां मात्र 28% लोग मानते हैं कि कानून व्यवस्था में सुधार हुआ है,वहीं 34% लोग मानते हैं कि हालात पहले से खराब हुए हैं जबकि 28% लोग मानते हैं कि कानून व्यवस्था जस की तस हैं। यह आंकड़ा बहुत महत्वपूर्ण है।
दरअसल महागठबंधन के खिलाफ नीतीश कुमार का यही सबसे बड़ा USP था कि लालू राज जंगल राज था और नीतीश कुमार का राज सुशासन हैं जहां अपराध खत्म हो गया है या कम हो गया है। लेकिन हाल में दो ऐसी बड़ी घटनाएं हुईं जिन्होंने मीडिया की मदद से गढ़े गए इस मिथ को चकनाचूर कर दिया। दरअसल आम तौर पर तो तमाम अपराधिक घटनाएं पहले से घट ही रही थीं लेकिन हाल में राजधानी पटना में DM SSP के घर और थाने से थोड़ी दूर पर स्थित एक बड़े व्यापारी डॉक्टर की हत्या उनके घर के ठीक बाहर कर दी गई। उसी के कुछ दिनों के अंदर एकदम फिल्मी स्टाइल में 5 अपराधियों ने अस्पताल के अंदर जेल से आए एक गैंगस्टर को मार डाला। इससे नीतीश भाजपा राज में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ गईं।
महागठबंधन के खिलाफ NDA के जो सबसे बड़ा मुद्दा था वह उनसे छिन गया। जंगल राज की बात करते ही अब उक्त घटनाएं उन्हें मुंह चिढ़ाने लगती हैं। इसीलिए NDA के बड़े नेता अब उसकी चर्चा करने से बच रहे हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी बिहार की अपनी रैलियों में जंगल राज की चर्चा अब बंद कर दी है। यहां तक कि चिराग पासवान जैसे सरकार के सहयोगी दल के नेता भी इस पर सवाल उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
नीतीश कुमार को बीजेपी मुख्यमंत्री बनाएगी इसके पक्ष में केवल 24%लोग हैं, वहीं जमकर विरोध करने वाले 33%हैं। इससे पता लगता है कि बीजेपी के वोट पूरी तरह जेडीयू को ट्रांसफर नहीं होंगे। इसी तरह पिछले चुनाव में भी मात्र 55% भाजपा के मत जेडीयू को ट्रांसफर हुए थे। प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री के रूप में जहां 25% लोग नीतीश कुमार को देखना चाहते हैं, वहीं 32%लोग तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। युवाओं में यह फासला और बढ़ जाता है। नीतीश और तेजस्वी को क्रमशः 22%और 40%लोग मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। पिछली बार सीएसडीएस के अनुसार यह आंकड़ा क्रमशः 37% और 38% था।
लाख टके का सवाल आज यह है कि वोट चोरी के SIR जैसे तमाम तिकड़मों की काट करते हुए क्या महागठबंधन अपने प्रति जनसमर्थन को जनता के निर्णायक जनादेश में तब्दील कर सकता है ?
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)