पर्यावरण केंद्रित फिल्मोत्सव : जलवायु संकट, दिल्ली–एनसीआर के भविष्य पर दो दिनों तक चला मंथन

नई दिल्ली। दो दिवसीय फिल्मोत्सव में दिल्ली–एनसीआर के बिगड़ते पर्यावरणीय और पारिस्थितिक संकट पर फिल्मों के प्रदर्शन के साथ चर्चा भी हुई जिसमें विद्यार्थियों, शिक्षकों, पर्यावरणविदों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और फ़िल्मकारों ने हिस्सा लिया। 

पर्यावरण जलवायु केंद्रित फिल्मोत्सव ऑल लिविंग थिंग्स एनवायरनमेंटल फिल्म फेस्टिवल (आल्ट ईएफएफ), जो छह साल पहले शुरू हुआ था और 39 देशों के कई शहरों में अलग अलग संस्थाओं द्वारा आयोजित किया जाता है, का आयोजन एसएसीएसी और न्यू दिल्ली फ़िल्म फ़ाउंडेशन (एनडीएफएफ) ने संयुक्त रूप से किया था। उत्सव की शुरुआत में आयोजकों को दलजीत वाधवा (एसएसीएसी) और आशीष सिंह (एनडीएफएफ ) ने पर्यावरण-संवेदनशील सिनेमा और रचनात्मक जागरूकता के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया। 

फिल्मोत्सव में दोनों दिन लॉन्ग और शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री और एनीमेशन फिल्में प्रदर्शित की गईं, जिनमें सामाजिक अन्याय, विस्थापन, जंगलों का विनाश, शहरी सीवेज प्रणाली और मानव–पर्यावरण संबंध जैसे मुद्दों को गहराई से दिखाया गया। सीनियर पत्रकार, फ़िल्मकार और शिक्षाविद रमेश मेनन ने भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों और जलवायु आपातकाल की गंभीरता पर अपने विचार साझा किए।

प्रदर्शित फिल्मों में फ़्यूचर काउंसिल (ऑस्ट्रेलियाई फ़िल्मकार डेमन गेम्यू की डॉक्यूमेंट्री), हाउ मल्लाह वीमेन फॉट, (बिहार की 5,000 से अधिक मल्लाह महिलाओं के संघर्ष की कहानी जो जातिगत हिंसा, यौन शोषण और पितृसत्ता के खिलाफ उनके अधिकारों की लड़ाई को प्रस्तुत करती है), ब्लड वुड (रोमानिया की फिल्म) शामिल थीं।

इसके अलावा, बिनीथ द पैनल: द हिडन लॉसेज़ ऑफ़ इंडिया’ज़ सोलर पार्क्स-(डॉक्यूमेंट्री जो तमिलनाडु के रामनाथपुरम में बड़े सोलर पार्कों के कारण हुए सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को सामने लाती है — ज़मीन का नुकसान, पानी का संकट और समुदायों का पलायन इसकी मुख्य धुरी है), घुघुती की माला (उत्तराखंड की मकर संक्रांति पर आधारित एनिमेशन फिल्म), देसी ऊन- (दक्कनी ऊन और चरवाही परंपरा की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक औरपर्यावरणीय विरासत को प्रस्तुत करती फिल्म) आदि भी दिखाई गईं।  

एक पैनल डिस्कशन में “‘हमारा पर्यावरण, हमारा भविष्य: स्थानीय चुनौतियाँ और समाधान” विषय पर चर्चा आयोजित की गई जिसमें डॉ. अपूर्व ग्रोवर, मीनू घोष और लेखक पत्रकार संजय कबीर शामिल थे। इस सत्र में डॉ. ग्रोवर ने कहा कि दिल्ली की हवा इतनी विषाक्त हो गई है कि छोटे बच्चों और शिशुओं को बाहर ले जाना भी खतरनाक हो गया है। उन्होंने अरावली पर्वतमाला के जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण योगदान को भी रेखांकित किया और सवाल खड़ा किया कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसी दुनिया सौंप कर जाएंगे…।

संजय कबीर ने याद दिलाया कि 14 अक्टूबर से 53 दिनों तक दिल्ली–एनसीआर की एक्यूआई “खराब” या “बहुत खराब” श्रेणी में रही, जो कि एक बेहद खतरनाक स्थिति है।

मीनू घई ने चेताया कि सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय अरावली के विनाश का रास्ता खोलता है, जिसकी कीमत दिल्ली-एनसीआर को बड़े पैमाने पर चुकनी पड़ सकती है। उन्होने कहा कि हमारी संस्कृति में पर्वतों को देवतुल्य माना जाता रहा है और अब उसकी तबाही का रास्ता खोलना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होने लोगों से इस बारे में ऑनलाइन याचिका साइन करने की अपील भी की।

संगोष्ठी का संचालन कर रहे आशीष के सिंह ने महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए कहा: “धरती पर सभी की ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं।”

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