बिहार : क्या ओवैसी बदल देंगे बिहार का मुस्लिम सियासी नक्शा?

बिहार 2025 के विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस और सीपीआई जैसी पुरानी पार्टी अपने अस्तित्व को बचाते नजर आई और राजद जैसी बड़ी पार्टी की सीटें 25 तक आकर सिमट गई, वहीं एक नाम बिहार की राजनीति में सुर्खियों में आ रहा है..असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का। एआईएमआईएम ने बिहार में 25 सीटों पर इस बार चुनाव लड़ा, उनमें से पांच अपने नाम कर ली हैं।

इनमें जोकिहाट, बहादुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी सीटें शामिल हैं। एआईएमआईएम ने कई अन्य सीटों के नतीजों को भी प्रभावित किया है। पार्टी किशनगंज के ठाकुरगंज और कटिहार के बलरामपुर में भी बेहद कम वोटों के अंतर से हारी है। प्राणपुर, अररिया, कस्बा और केवटी जैसी कम से कम चार सीटों पर एआईएमआईएम तीसरे नंबर पर रही हालांकि यहां उसके उम्मीदवारों को मिले वोट हार-जीत के मार्जिन से ज़्यादा हैं।

बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में भी सीमांचल में एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीती थी। हालांकि 2020 में जीते पांच विधायकों से अख्तरुल ईमान को छोड़कर बाकी सभी चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे। 

ओवैसी बिहार में एआईएमआईएम की पांच सीटें कैसे बचा ले गए?

सीमांचल इलाका….बांग्लादेश की सीमा के पास स्थित मुस्लिम बाहुल्य इलाका। बिहार का सीमांचल इलाके को मुस्लिम सियासत का केंद्र माना जाता है। बिहार की आबादी में मुसलमानों की संख्या करीब 17 फीसदी है और कुल मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा सीमांचल में बसता है। माइनॉरिटी कमीशन ऑफ़ बिहार के मुताबिक, सीमांचल के किशनगंज में 67%, कटिहार में 42%, अररिया में 41% और पूर्णिया में 37% मुस्लिम आबादी है। 

सीमांचल में इस बार के चुनाव की बात करें तो कांग्रेस 12 सीट, आरजेडी 9 सीट, वीआईपी 2 सीट और सीपीआई एमएल एक सीट पर लड़ी वहीं एआईएमआईएम ने पूरे बिहार में 25 उम्मीदवार उतारे,जिसमें सीमांचल की 15 सीट शामिल थीं। एनडीए ने इस चुनाव में यहां 14 सीटें जीती हैं। वहीं कांग्रेस के खाते में चार सीटें गई हैं और राजद महज एक सीट पर जीती है।

अधिकांश सीटें एनडीए की झोली में जाने से ये स्पष्ट है कि अल्पसंख्यक समुदाय की बड़ी आबादी वाला ये इलाक़ा बिहार में विपक्षी पार्टी के विजन से खुश नहीं है। राजद और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगी, जिसका फायदा भाजपा और उसकी सहयोगी जेडीयू को मिला। 

शोधकर्ता पंकज लिखते हैं कि,”इस बार बिहार में अशराफ मुसलमानों की तुलना में पसमांदा जाति–बिरादरी के अधिक लोग विधायक चुनकर आए हैं। यह पसमांदा विमर्श की एक महत्वपूर्ण सफलता है। कांग्रेस ने अपने नज़दीकी अशराफ मुसलमानों को अधिक महत्व दिया, जबकि जदयू और एआईएमआईएम ने पसमांदा जाति-बिरादरी पर दांव लगाया। अंततः पसमांदा विमर्श लगभग 70 प्रतिशत सफल रहा। सबसे अधिक पसमांदा विधायक चुनकर गए। जिसमें सुरजापुरी मुस्लिम हैं।

हैदराबाद से आये ओवैसी को बिहार में मुसलमानों के कास्ट स्ट्रक्चर के बारे में बारीकी से पता था लेकिन बिहार की राजनीति को ठीक से नहीं पता था। जीत के बाद शाम में ओवैसी ने बाकायदा कुल्हैया, शेरशाहबादी, सुरजापुरी मुस्लिम को धन्यवाद दिया। 

सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद सैफी लिखते हैं कि,”मैं एआईएमआईएम का सदस्य नहीं हूं, और ना ही मैं किसी के खिलाफ हूं, मैं सिर्फ उस एजेंडे के खिलाफ हूं जिसमें एआईएमआईएम के बारे में गलत जानकारी प्रकाशित की गई है , जैसे कि वो भाजपा की बी टीम है या उनकी आरएसएस से जुड़े होने की झूठी खबरें फैलाई गई हैं। मैं असदुद्दीन ओवैसी की जज्बाती तकरीरों से नहीं बल्कि उनकी शिक्षा नीति से बहुत ज्यादा प्रभावित हूं शायद ही कोई और नेता देश में हो जो 14–15 हजार बच्चों को अपने स्कूलों में फ्री पढ़ाते हो, सरकार किसी की भी क्यों ना हो वो उससे अपना काम करा ही लेते है। , वो मुसलमानों के सभी मुद्दों पर खुलकर बोलते हैं, आज तक उन्होंने भाजपा सरकार द्वारा लाए गए किसी भी बिल का समर्थन नहीं किया।

मुस्लिम कम्युनिटी का मुद्दा नौकरी, आरक्षण, सड़क आदि से इतर है

असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में नीतीश कुमार सरकार को समर्थन देने के संकेत दिए हैं, हालांकि इसके लिए उनकी एक शर्त है कि सीमांचल क्षेत्र को उसके हक का न्याय मिले। अमौर में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि “सीमांचल दशकों से उपेक्षा का शिकार रहा है और अब यह स्थिति बदलनी चाहिए।

पत्रकार मुजम्मिल इमाम बताते हैं कि,”एनडीए की सरकार को किसी भी शर्त पर समर्थन देने का क्या मतलब है? अगर मुस्लिम कम्युनिटी की एनडीए से दिक्कत सिर्फ़ नौकरी, बिजली और सड़क तक ही महदूद है तो फिर मुख्तार अब्बास नकवी, शाहनवाज हुसैन, जमा ख़ान आदि की राजनीति को वैचारिक रूप से गलत नहीं कहा जा सकता। असल में मुस्लिम कम्युनिटी का मुद्दा नौकरी, आरक्षण, सड़क आदि से इतर है, आज मुस्लिम कम्युनिटी मुल्क़ में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

मुसलमान मुल्क़ में एक इज़्ज़तदार शहरी की तरह जीने को लड़ रहा है। मुसलमान हर लम्हा इस डर में जी रहा है कि कल उनकी नागरिकता रहेगी या नहीं, इबादत करने को उनकी मस्जिद बचेगी या नहीं, उनके खाने-पीने, पहनने के लिए उनको जेल में तो नहीं डाल दिया जाएगा। कहीं किसी भीड़ में उनको मुसलमान कह कर लिंच तो नहीं कर दिया जाएगा। मुसलमान हर दिन इस डर के खिलाफ लड़ रहा है और जी रहा है।”

मूकनायक की पत्रकार हुमनाज लिखती है कि, “असदुद्दीन ओवैसी का अधिकार है कि वो देश के किसी भी कोने से चुनाव लड़े , ये उनका संवैधानिक हक़ है, इस पर कोई बहस नहीं। लेकिन असली समस्या वहाँ शुरू होती है जहाँ राजनीति के नाम पर ‘मसीहाई’ बेची जाने लगती है।

खुद को मुसलमानों का रहनुमा बताने वाले असदुद्दीन ओवैसी और उनके कुछ समर्थक हिन्दुस्तान के बाकी सभी मुस्लिम नेताओं को नीचा दिखाने में, गाली देने में, और उनकी सोच से अलग सोच रखने वाले मुसलमानों को ‘जुम्मन’ कहकर घटिया तमाशा बनाने में माहिर हैं। गजब की हिपोक्रेसी है। भाजपा मुसलमान को ‘अब्दुल’ कहे तो गलत, और ओवैसी के समर्थक मुसलमान को ‘जुम्मन’ कहें तो सही?” 

एआईएमआईएम पार्टी ने मुस्लिम प्रतिनिधि के अलावा ढाका से राणा रणजीत सिंह और सिकंदरा से मनोज कुमार दास को भी टिकट दिया था। इसके माध्यम से वह यह संकेत दिए कि उसकी राजनीति अब मुस्लिम प्रतिनिधित्व से आगे, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के मंच की ओर बढ़ रही है।

हालांकि चुनौती यह भी कम नहीं कि सीमांचल से बाहर पार्टी कितनी पकड़ बना पाती है। मधुबनी, मुंगेर, नवादा जैसी सीटों पर एआईएमआईएम ने नए चेहरे उतारे थे, इन इलाकों में संगठनात्मक जड़ें अभी कमजोर हैं। महागठबंधन के नेता आरोप लगाते रहते हैं कि एआईएमआईएम अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की बी-टीम की तरह काम करती है, क्योंकि मुस्लिम वोटों के बिखराव का सीधा फायदा एनडीए को मिलता है। एआईएमआईएम इस आरोप पर कहता है  कि हम किसी के एजेंट नहीं हैं, हम सिर्फ उस तबके की आवाज है जिसे दशकों से अनदेखा किया गया है।

Leave a Reply