गोबर ज्ञान का निरंतर होता विस्तार 

कल की ही बात है जब देश के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मुख्यमंत्रियों की जानकारी एक एंकर दे रहा था उसने बताया कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी सबसे ज़्यादा पढ़े लिखे हैं या यूं कहें डिग्री धारी हैं। वे पीएचडी धारी हैं। दूसरे नंबर पर आसाम के मुख्यमंत्री हेमंता हैं उनके पास भी डिग्रियों की कमी नहीं। तीसरी हैं दिल्ली विधानसभा की छात्र नेता कई डिग्री धारी रेखा गुप्ता जी जो इस वक्त दिल्ली राज्य की मुख्यमंत्री हैं। ये तीनों भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। जिसके शिखर पुरुष की डिग्री पर भले बवाल हो लेकिन वे इतिहास के धुरंधर विद्वान हैं। जिसका लोहा दुनिया मानती है। ऐसा वो मानते हैं।

बहरहाल, जब आला कमान की बातें उनके मन-मस्तिष्क की उपज होती हैं वे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अद्भुत ज्ञानधारी हैं। वे सामने बैठी जनता को ऐसा सम्मोहित कर पूर्ण विश्वास में ले लेते हैं यकीन नहीं होता है यह सौ फीसदी सच है। भले ही विपक्ष, लेखक और सुधीजन उनकी आलोचना करते रहें। लेकिन वे सनातन सत्य से परे एक गंभीर गोबर ज्ञानी है।

पुरातन लोग एक मुहावरा इस्तेमाल करते थे भैंस के आगे बीन बजाना। आज यही स्थिति उनके आलोचकों की हो जाती है। वे ज्ञान बघारने लगते हैं हाल ही में असम में वे कह दिए कांग्रेस के प्रधानमंत्री नेहरू जी असम को पाकिस्तान को देना चाहते थे। अब लोग लगे हैं लट्ठम बाजी करने में। कोई कह रहा है उनको रोका किसने नाम बताओ। अरे भाई वे नाम भी बता देंगे अब ढूंढते फिरो उन्हें। वे तो असम की जनता को समझा दिए। अब उन्हें समझाने से क्या फायदा? वे फेंक रहे हैं तुम भी फेंको।असम के मुख्यमंत्री को मुद्दा मिल गया। ये गोबर संस्कृति है और गोबर ज्ञान आज का तकाज़ा है।

जब मुखिया महामानव, महाज्ञानी हो तो अनुयायी को ऐसा बनना ही पड़ता है। सबसे ज़्यादा पढ़े लिखे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तालीम कोई नहीं पूछता कीमत उनकी गोबर बात की ही होती है। वे एक कार्यक्रम में बोल दिए गुड़ के पेड़ लगाओ।लोग पेड़ मांगने लग गए। यदि गलती हो गई थी तो सुधार कर लेते या माफ़ी मांग लेते पर गोबर युग में माफ़ी मांगना, इस्तीफा देना वर्जित है। जितना अज्ञान होगा उतनी पकड़ मजबूत होगी।

इन सबमें अव्वल दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं आजकल रेखा जी। जिन्होंने अपने गोबर ज्ञान से लोगों को हिलाकर रख दिया वे कह रहीं थीं कि भगत सिंह ने कांग्रेस सरकार की असेंबली पर बम फेंका था। लेकिन भक्त खुश हैं जो कहा गया वही सच है। इतिहास गलत है। धन्य है ये महान लोग जो गोबर ज्ञान का नया इतिहास प्रस्तुत कर रहे हैं। अमित शाह जी भी बताते हैं कि वीर सावरकर की बदौलत 1857 का संग्राम हुआ। जबकि वे उस समय मात्र चार वर्ष के थे। इन नव इतिहास अन्वेषी गोबर ज्ञानियों को प्रणाम।

ये सब वही लोग हैं जो जानबूझकर अपने ज्ञान को गोबराच्छादित कर कुछ नया दिखने की चेष्टा में रत हैं और प्रफुल्लित हैं। इससे उनका भविष्य सुरक्षित होता है।खैरियत है अभी कुछ विचारक, पढ़ने लिखने वाली पीढ़ी मौजूद है। 2047 तक यदि गोबर भक्तों की सल्तनत कायम रहती है तो गोबर बाबाओं, नशेबाजों और अंधश्रद्धा की देश में ऐसी फौज खड़ी कर देगी जिसे ना तो अपनी अहमियत का पता होगा और ना ही वे किसी के विरुद्ध बोलने की स्थिति में होंगे। राम भरोसे पड़े रहेंगे। अपने भाग्य को कोसेंगे।

दूसरी ओर तानाशाह पेट भरने के लिए पांच किलो अनाज और कुछ कुछ दान देकर अपनी मौजूदगी दर्शाता रहेगा। चंद लोगों को छोड़कर सब गुलाम होंगे। सदियों पुरानी दास्तानें फिर शुरू हो जाएंगी। इसे घूमता जीवन चक्र मानकर लोग इसी में फंसे रहेंगे।

सोचिए, इस गोबर ज्ञान के पीछे की मंशाएं। इसका विस्तार जीवन को नरक बना दे।इसे समझें, जो नहीं समझते हैं उन्हें समझाएं और नि: शुल्क शिक्षा के मौलिक अधिकार वापस लाने प्रतिकार करें। शिक्षा को हथियार बनाएं। बंद हो रहे विद्यालयों को खुलवाएं। गोबर ज्ञान परोसने वाले नेताओं और बाबाओं से दूरी रखें। लोभ और लालच की जकड़न से बचने के वास्ते हाथों के लिए काम मांगे। गुलामी से सौ फीसदी बेहतर है अपने तरीके से श्रेष्ठ जीवन जीना।

याद रखें, ये गोबर ज्ञानी आपके लिए बनते हैं उन्होंने अपने जीवन को खूबसूरत बनाने के सारे इंतजाम कर रखे हैं। इसे नज़र अंदाज़ ना करें।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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