अमेरिका व्यापार समझौता : संयुक्त किसान मोर्चा ने पीयूष गोयल के इस्तीफे की माँग की

नई दिल्ली। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के इस बयान का कड़ा विरोध किया है कि “अगर हम अमेरिका से कच्चा माल खरीदेंगे, तो अंतरिम समझौते के अंतिम रूप लेने पर भारत को भी शून्य शुल्क पर निर्यात की सुविधा मिलेगी।”

एसकेएम के यहाँ जारी बयान के अनुसार यह बयान मोदी सरकार द्वारा भारत की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता को अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण करने की सच्चाई को उजागर करता है। यह घोषणा इस बात को साबित करती है कि ‘अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि को बाहर रखा गया है’ का दावा झूठा और जनता को गुमराह करने वाला है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार द्वारा किए गए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भारत के आर्थिक उपनिवेशीकरण की रूपरेखा हैं।

एसकेएम ने आरोप लगाया कि भाजपा भारत को अमेरिकी उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का लूट बाज़ार बनाना चाहती है।

बयान के अनुसार शून्य शुल्क पर कच्चे कपास का आयात भारत के कपास किसानों को तबाह कर देगा, क्योंकि इससे घरेलू कीमतें गिरेंगी। वर्ष 2025 के खरीफ फसलों के लिए सी2+50% के अनुसार कपास का एमएसपी ₹10,075 प्रति क्विंटल होना चाहिए। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने ए2+ एफएल के आधार पर ₹7,710 प्रति क्विंटल की घोषणा की, जो सी2 फार्मूले की तुलना में ₹2,365 प्रति क्विंटल कम है।

मोदी सरकार किसानों को ए2+ एफएल मूल्य भी प्रभावी खरीद व्यवस्था के माध्यम से सुनिश्चित नहीं कर सकी, जिसके कारण किसानों को ₹5,500 से ₹6,500 प्रति क्विंटल की संकटग्रस्त कीमत पर अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। 19 अगस्त 2025 को केंद्र सरकार ने कपास पर 11% आयात शुल्क हटाने की अनुमति दी, जिससे लाखों कपास किसान परिवारों की आजीविका सुरक्षा और कमजोर हुई।

अमेरिका से कपास आयात जनवरी–नवंबर 2024 में 199.30 मिलियन डॉलर से बढ़कर जनवरी–नवंबर 2025 में 377.90 मिलियन डॉलर हो गया, जो 95.5% की वृद्धि है।

अब केंद्र सरकार ने “घरेलू बाजार को स्थिर करने के किसान-हितैषी कदम” का दावा करते हुए 25 लाख मीट्रिक टन गेहूं के निर्यात का आदेश दिया है। कच्चे कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात बिना किसी घरेलू औद्योगीकरण रणनीति के, खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालते हुए और अमेरिकी किसानों को भारत में बड़ा बाजार उपलब्ध कराते हुए, भारतीय किसानों को बाजार से बाहर कर देगा।

इससे किसान और खेत मजदूर नव-उपनिवेशवादी हस्तक्षेप के सबसे बड़े शिकार बनेंगे।

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत सेब, कपास, वृक्षीय मेवे, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट, तथा मक्का और लाल ज्वार आधारित डीडीजी सहित पशु आहार के आयात को खोल दिया गया है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार में लगभग एकाधिकार की स्थिति मिल जाएगी। डेयरी उत्पादों को यूरोपीय संघ, न्यूज़ीलैंड और यूनाइटेड किंगडम के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों में शामिल किया गया है।

इस प्रकार मोदी सरकार ने किसानों, मजदूरों और प्राकृतिक संसाधनों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर देश की स्वतंत्रता से विश्वासघात किया है।

30% से 150% तक के आयात शुल्क को घटाकर शून्य करना और 0%-3% के निर्यात शुल्क को बढ़ाकर 18% तक करने जैसे गंभीर नीतिगत निर्णय संसद को अंधेरे में रखकर किए गए हैं। मोदी सरकार ने सभी फसलों के लिए सी2+50% पर गारंटीकृत खरीद के साथ एमएसपी कानून लागू न करके पहले ही किसानों के साथ विश्वासघात किया है।

अब कृषि और डेयरी क्षेत्र की रक्षा करने वाली पूरी शुल्क प्रणाली को समाप्त कर किसानों को वैश्विक बाजार की अनिश्चितता और असुरक्षा में धकेलना देश की जनता को स्वीकार नहीं है।

एसकेएम के बयान के अनुसार 12 फरवरी की अखिल भारतीय आम हड़ताल की व्यापक सफलता के बावजूद प्रधानमंत्री ने जनाक्रोश को समझने और सुधारात्मक कदम उठाने से इनकार कर दिया है।

एसकेएम ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए किसानों से अपील की है कि वे लंबी लड़ाई के लिए तैयार हों। गांवों में प्रदर्शन, जनसभाएं और घर-घर अभियान चलाकर मोदी सरकार के अमेरिका के प्रति आत्मसमर्पण को उजागर करें तथा कृषि, डेयरी और संपूर्ण अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए सभी देशभक्त ताकतों को संगठित करें।

बताया गया है कि एसकेएम की राष्ट्रीय परिषद की बैठक 24 फरवरी को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में आयोजित होगी, जिसमें संघर्ष को तेज करने के ठोस कार्यक्रम तय किए जाएंगे।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

Leave a Reply