उनकी लाश राज्य के लिए बहुत भारी साबित हुई… मेरे पिता ने 1995 से सिस्टम को हाँट किया है और अब भी कर रहे हैं : नवकिरण कौर खालड़ा इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में

6 सितंबर 1995 की सुबह जब अपने पिता मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को आख़िरी बार देखा तो नवकिरण कौर 10 साल की थीं और उनका भाई जन्मित आठ साल का था। जब दोनों बच्चे स्कूल से लौटे तो खालड़ा को घर के बाहर से (अमृतसर) पंजाब पुलिस ने उठा लिया था।

तीन दशक बाद, खालड़ा, जो पुलिस हिरासत में हफ्तों यातना दिए जाने के बाद मारे जा चुके थे, बायोपिक ‘सतलुज’ ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाये जाने के कारण चर्चा में हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की दिव्या गोयल गोपाल ने नवकिरण से बात की, जो इंजीनियर हैं और अमेरिका में रहती हैं। बातचीत के अंश:

आप उस समय 10 साल की थीं जब आपके पिता का अपहरण हुआ था। क्या आपको उन दिनों की याद है?

मैं छोटी थी पर मेरे पिता ने कभी नहीं छिपाया कि वह क्या कर रहे हैं। मुझे याद है मैं उनके साथ थी जब राम नारायण कुमार डाक्यूमेंट्री ‘डिसअपरेंसेस इन पंजाब’ बना रहे थे। उन्होंने मुझे लाशों को जलाने के लिए ट्रकों से निकाले जाने की तस्वीरें दिखायीं थीं। विदेशी पत्रकार, शोधकर्ता और एक्टिविस्ट हमारे घर आते रहते थे। बच्चे होने के नाते हमें, वे जो दस्तावेज़ीकरण कर रहे थे उसके स्केल का अंदाज़ा नहीं था पर हमें इतना पता था कि यह उन लोगों के बारे में है जो लोग ग़ायब हो गए हैं और उनके परिवार जवाब ढूँढ रहे हैं।

जब भी हम गांवों में जाते थे लोग उन्हें रोककर अपने बेटों या भाइयों के साथ क्या हुआ, बताते थे। हम भले पूरी तरह समझ न पाते हों पर हम उनका दुख देख सकते थे।

किसी भी बच्चे की तरह, मुझे भी लगता था कि पुलिस अपराधियों को पकड़ने के लिए होती है। वह विश्वास 6 सितंबर 1995 को टूट गया। हम स्कूल से घर आए तो हमें बताया गया कि पापा को पुलिस ले गयी है। उसके बाद पुलिसवाले बार-बार हमारे घर आने लगे, मेरी मम्मी पर दबाव डालने कि वह केस वापस ले लें और संलिप्त पुलिसकर्मियों के नाम ना उजागर करें।

अमृतसर के घर में हमने 1994 में शिफ्ट किया था तो पापा ने ऐसा कुछ कहा था जो उस समय अजीब लग रहा था। पड़ोसियों के छोटे जमावड़े में उन्होंने कहा, “मैं खालड़ा गाँव से एक साधारण व्यक्ति हूँ। यदि कोई पुलिसवाला यह पूछते हुए आए कि खालड़ा कहाँ रहता है, तो उसे मेरा घर दिखा दें।”

उनके अपहरण के बाद सैकड़ों लोग हमारे घर आने लगे। कइयों ने अपने ग़ायब हो चुके रिश्तेदारों को ढूँढने के लिए मेरे पिता की सलाह पर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था। तब हमें महसूस हुआ कि उनका काम हमारे अपने परिवार से बहुत बड़ा था।

तीन दिन में ही मेरी माँ ने तय किया कि घर पर बैठकर इंतज़ार नहीं किया जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। महत्त्वपूर्ण है, कि उन्होंने केवल मेरे पिता की गुमशुदगी के मामले में ही राहत नहीं माँगी। उन्होंने अदालत के सामने कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर और ग़ैर क़ानूनी दाह संस्कारों के मामले में उनकी समूची जाँच रख दी। वही सीबीआई की जाँच का आधार बनी। उनके मामले ने आख़िरकार कइयों के लिए न्याय पाने का दरवाज़ा खोला।

आपके पिता के मामले ने पंजाब और सिस्टम को कैसे बदला?

मेरे पिता कभी सिस्टम से भागे नहीं। उन्होंने इसे क़ानून के ज़रिए चुनौती देने को चुना। एक बार जब मेरे दादा ने चिंता व्यक्त की कि उनका एक्टिविज्म परिवार को अंतहीन अदालती मामलों में उलझा सकता है मेरे पिता ने जवाब दिया, “मैं कहीं नहीं भाग रहा।”

जब 1995 में मेरे पिता का अपहरण हुआ और उनकी हत्या हुई, ऐसे मामले पंजाब में हर कहीं हो रहे थे। किसी ने राज्य या पुलिस से कोई सवाल नहीं किया। लेकिन मेरे पिता के मामले ने सब बदल दिया। उन्हें शायद पता नहीं था कि इतने सारे अन्य लोगों को मारने के बाद एक लाश उन पर इतनी भारी पड़ेगी। अमेरिका से कनाडा तक हर किसी ने भारतीय अधिकारियों से खालड़ा के बारे में पूछा।

चेतावनियों के बावजूद मेरी माँ ने सुरक्षा लेने या रूटीन में कोई बदलाव करने से मना किया। हम उसी घर में रहे और उसी स्कूल में पढ़ाई करते रहे। उनका मानना था कि भय ज़िंदगी जीने का तरीका नहीं हो सकता।

तीन साल तक हमें पता नहीं चला कि हमारे पिता के साथ क्या हुआ। हमें संदेह था कि कुछ बुरा हुआ होगा पर कोई प्रमाण नहीं था। 1998 में पूर्व पुलिसकर्मी कुलदीप सिंह बछड़ा के बताने पर कि हमारे पिता को कैसे मारा गया, हमने मान लिया कि वे जा चुके हैं।

मेरे पिता की दर्दनाक मौत ने शायद कई अन्य को बचा लिया।

तीन दशक के बाद सतलुज आपके पिता की कहानी को फिर लोगों के बीच ले आई लेकिन फ़िल्म को ओटीटी से हटा दिया गया, आप इस विवाद को कैसे देखती हैं?

हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। हमें पहले से आशंका थी। हमने निर्देशक हनी त्रेहान को भी कहा था कि यह फ़िल्म बनाना आसान नहीं होगा।

एक लाश इतनी भारी साबित हुई कि राज्य भुला नहीं सकता। मेरे पिता सिस्टम को 1995 से हॉण्ट कर रहे हैं।

लेकिन फ़िल्म को रोकने के प्रयास ने उसके प्रति और ध्यान खिंचवाया है। लोग अब उस समय के बारे में पढ़ रहे हैं, बात कर रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं। यह अपने आप में महत्त्वपूर्ण है।

हनी त्रेहान ने फ़िल्म कोर्ट रिकॉर्ड और दस्तावेज़ी प्रमाणों को बनाया है। फ़िल्म में कुछ भी काल्पनिक नहीं है। वास्तव में हमने अपना रूख स्पष्ट किया था : यदि फ़िल्म को प्रदर्शित होना है तो पूरी फ़िल्म हो, काटी-छाँटी हुई फ़िल्म नहीं।

लोग अक्सर मेरे पिता के 25000 गुमशुदा लोगों के अनुमान पर सवाल उठाते हैं। हम इस आंकड़े पर कायम हैं जब तक कि कोई इसे ग़लत न साबित कर दे।

कुछ राजनीतिज्ञ और आलोचक आपके पिता को खालिस्तान मूवमेंट के प्रति सहानुभूति रखने वाला बताते हैं। केंद्र ने बैन को सुरक्षा कारणों और उग्र भावनाओं को उकसाने की संभावना के हवाले से सही बताया है। आप क्या कहना चाहेंगी?

मेरे पिता क़ानून मानने वाले नागरिक थे। यहाँ तक कि पंजाब पुलिस ने भी कभी ऐसा दावा नहीं किया कि उन्होंने कोई अपराध किया था। मुकदमे के दौरान उनका रूख यही था कि उनके ख़िलाफ़ कोई अपराध दर्ज नहीं था। तो स्वाभाविक सवाल है : यदि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था, तो उनका अपहरण और हत्या क्यों की गई?

उनका मानना था कि न्याय क़ानून की बनायी संस्थाओं के ज़रिए हासिल किया जा सकता है। यही मेरी माँ ने उनके अपहरण के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाकर किया।

मेरे पिता श्रद्धालु सिख थे। वह उस अवधि के दौरान सिखों के संघर्ष और पीड़ा समझते और सहानुभूति रखते थे। इससे इनकार नहीं है लेकिन उन्होंने कभी अपने कार्य को धर्म तक सीमित नहीं किया। उनके सामने जो आया, उन्होंने हर पीड़ित का दस्तावेज़ीकरण किया। उनके रिकॉर्डों से कभी हिंदू नाम नहीं हटाए गए। उनकी चिंता का केंद्र मानवाधिकार थे, पीड़ित का धर्म नहीं।

उनका मानना था कि हर आंदोलन न्याय में होना चाहिए और किसी निर्दोष को नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहिए चाहे उसकी जाति या धर्म कोई भी हो। उनके कई करीबी दोस्त हिंदू थे जो उनकी मौत के बाद हमारे परिवार के साथ खड़े रहे।

मुझे यह अच्छा लग रहा है कि जिन्होंने फ़िल्म देखी है वह लोगों के ग़ायब होने, गैरकानूनी दाह संस्कारों और मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं। खालिस्तानी विमर्श को ज़्यादातर वह लोग हवा दे रहे हैं जो इन असुविधाजनक सवालों से ध्यान भटकाना चाहते हैं।

हिंदू सिख बाइनरी को पुनर्जीवित करने का प्रयास केंद्रीय विषय से ध्यान भटकाने के लिए है।

पंजाब में चुनाव होने जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों ने फ़िल्म को लेकर अपना रूख ज़ाहिर किया है। क्या आप उनसे किसी समर्थन की अपेक्षा करती हैं?

हमने राजनीतिक पार्टियों से बहुत अपेक्षा न रखना सीख लिया है। हमारे लिए सभी पार्टियां – भाजपा, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल या अब आम आदमी पार्टी – एक जैसी हैं। भाजपा ने फ़िल्म को बैन कर यह साबित कर दिया है।

मेरे पिता शिरोमणि अकाली दल के साथ काम करते थे, इसके बावजूद उनके अपहरण के बाद मेरी माँ को पार्टी नेतृत्व ने यह सब भूल जाने और अपने बच्चों की परवरिश पर फोकस करने की सलाह दी। इसलिए हमने कभी इसे एक पार्टी या दूसरी की लड़ाई के रूप में नहीं देखा।

हमारे लिए यह हमेश राज्य के बारे में था और यह कि वह अपनी ताक़त का इस्तेमाल कैसे करता है। सरकारें बदलती रहीं, पार्टियां बदलती रहीं लेकिन हमारी क़ानूनी लड़ाई सोलह साल तक जारी रही जब मेरे पिता के मामले में दोषसिद्धि हुई।

यदि राजनीतिक नेता वास्तव में आज चिंतित हैं तो उन्हें उन वर्षों में पंजाब में मारे गए लोगों की ईमानदार गणना करनी चाहिए। क्यों नहीं उस दौर के मृतकों की वास्तविक संख्या का पता लगाया जाए? सच प्रमाण के आधार पर स्थापित होना चाहिए न कि विरोधाभासी नैरेटिव के आधार पर। 

आलोचक कहते हैं कि फ़िल्म पंजाब त्रासदी का केवल एक पक्ष पेश करती है और उग्रवादियों द्वारा मारे गए हिंदुओं या उग्रवाद के दौर में पीड़ा झेलने वाले अन्य पीड़ितों को नहीं दर्शाती है?

लगभग चालीस वर्षों तक घटनाओं के प्रति लोगों के बीच राज्य का वर्जन छाया रहा। अब जाकर सिख और पंजाबी अपनी कहानियाँ ख़ुद बताने लगे हैं। इसे दूसरे के दुख दर्द को मिटाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

हर निर्दोष जान महत्वपूर्ण है। हिंदू, सिख, अन्य समुदायों के लोगों ने उन वर्षों में काफ़ी कुछ झेला। मेरे पिता ने अपने दस्तावेज़ीकरण से कभी हिंदुओं को अलग नहीं किया। पर हमें यह भी मानना पड़ेगा कि कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए और मारने के बाद जिनका ग़ैर क़ानूनी तरीकों से दाह संस्कार किया गया, उनमें बड़ी संख्या सिखों की थी।

पीड़ितों के एक वर्ग की पहचान दूसरे को मिटाती नहीं है। वास्तविक चुनौती एक संपूर्ण और ईमानदार ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाना है।

खालड़ा ने तीन दशक तक सिस्टम को हॉण्ट है क्योंकि उन्होंने जो मुद्दे उठाए अब तक उन्हें सुलझाया नहीं गया। जब तक सच का सामना ईमानदारी से नहीं किया जाएगा, यह कहानी लौटती रहेगी।

(इंडियन एक्सप्रेस से साभार)

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